RLM (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश बिहार सरकार में पंचायती राज विभाग के मंत्री बने रहेंगे। उनके पद पर मंडरा रहा खतरा भाजपा MLC रहे देवेश कुमार के इस्तीफा के साथ टल गया है।
उपेंद्र कुशवाहा की दबाव की राजनीति काम आई। सुप्रीम कोर्ट ने दीपक के मंत्री बने रहने पर सवाल उठाए तो भाजपा ने बड़ा फैसला लिया। सूत्रों के अनुसार दिल्ली आलाकमान से सीधे मैसेज आया कि देवेश इस्तीफा देंगे। उनकी जगह दीपक विधान परिषद जाएंगे। इस फैसले के पीछे स्टेट लीडरशिप का दबाव भी था।
MLC देवेश कुमार का इस्तीफा किन परिस्थितियों में हुआ? भाजपा के लिए दीपक का मंत्री पद बचाना क्यों जरूरी था? अब देवेश कुमार का क्या होगा?
1- उपेंद्र कुशवाहा के प्रेशर पॉलिटिक्स ने दिखाया असर
- कुशवाहा जानते थे कि किसी भी सदन का सदस्य नहीं होने के चलते उनके बेटे का मंत्री पद जा सकता है। इसके बाद भी बेटे से इस्तीफा नहीं दिलाया।
- उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि दीपक प्रकाश दो-चार महीने के लिए नहीं, बल्कि 2030 तक पूरे कार्यकाल के लिए मंत्री बने हैं। वह सिर्फ हमारी पार्टी की मर्जी से नहीं NDA की सहमति से बने हैं।
- बिना किसी सदन का सदस्य बने मंत्री रहने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो दीपक प्रकाश ने कहा, ‘सरकार जवाब देगी। संविधान के प्रावधानों और NDA के नेताओं के आशीर्वाद से मंत्री पद पर हूं।’
- सीनियर जर्नलिस्ट इंद्रभूषण बताते हैं कि कुशवाहा जानते हैं कि बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए लव-कुश (कुर्मी-कोइरी/कुशवाहा) समीकरण भाजपा के लिए कितना अहम है।
- इस प्रेशर पॉलिटिक्स का असर दिखा कि भाजपा आला कमान ने अपने एक MLC से इस्तीफा दिलाकर दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने और उनका मंत्री पद बचाने का रास्ता साफ किया। दिल्ली से फोन आने के बाद देवेश ने शुक्रवार को सभापति अवधेश नारायण सिंह को इस्तीफा सौंप दिया। इस फैसले के लिए बिहार भाजपा के बड़े नेताओं का दबाव भी था।
2. अब देवेश कुमार का क्या होगा?
इस्तीफा क्यों दे रहे हैं? आगे क्या जिम्मेदारी मिलेगी? इन सवालों पर देवेश कुमार ने मीडिया से कहा कि मैं पार्टी का सच्चा सिपाही हूं। पार्टी नेतृत्व का हर फैसला मंजूर है। पार्टी आगे जो जिम्मेदारी देगी उसे निभाऊंगा।
भाजपा सूत्रों के अनुसार देवेश कुमार को संगठन में अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।
3. क्या देवेश कुमार का कद छोटा हुआ है?
देवेश कुमार ने अभी MLC पद से इस्तीफा दिया है। उनका कद वर्तमान से छोटा हुआ है या नहीं, यह पक्के तौर पर अगली जिम्मेदारी मिलने के बाद कह सकते हैं।
- एक सच्चाई यह है कि जब से बिहार भाजपा संगठन की जिम्मेदारी सम्राट चौधरी के हाथ में आई उनका कद घटा है। संजय जायसवाल के प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान वह प्रदेश महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर थे।
- देवेश केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय के गुट के माने जाते हैं। वह पत्रकार रहे हैं। राजनीति में उनकी एंट्री भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने कराई थी। जेटली ने उन्हें बिहार भेजा था।
- जनवरी 2024 में नीतीश कुमार दूसरी बार महागठबंधन छोड़कर NDA में आए और सरकार बनाई तब देवेश कुमार भूमिहार कोटे से मंत्री पद की रेस में थे। मार्च 2023 में सम्राट चौधरी बिहार भाजपा अध्यक्ष बने। उन्होंने अपनी नई टीम बनाई तो संगठन के पद से देवेश कुमार की छुट्टी कर दी थी।
- दिल्ली भाजपा में देवेश कुमार की अच्छी पकड़ है। वह समस्तीपुर के पूसा प्रखंड के मोहम्मदपुर देवपाट गांव के जमींदार परिवार से आते हैं। उनके दादा यमुना कारजी स्वतंत्रता सेनानी, प्रमुख किसान नेता और पत्रकार थे। पटना में इनकी काफी अचल संपत्ति है।
4. क्या अब 5 साल मंत्री बने रह पाएंगे दीपक प्रकाश?
भाजपा ने देवेश कुमार से इस्तीफा दिलाकर दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर आए संकट को फिलहाल टाल दिया है, लेकिन वह पूरे 5 साल पद पर बने रहेंगे, यह अभी भी तय नहीं।
देवेश कुमार 17 मार्च 2021 को राज्यपाल मनोनीत कोटे से MLC बने थे। अगले साल मार्च तक उनका कार्यकाल था। अब उनकी जगह दीपक प्रकाश विधान परिषद जाते हैं तो उनका कार्यकाल भी मार्च 2027 तक ही रहेगा। मतलब, 8 महीने बाद एक बार फिर उन्हें विधानसभा या विधान परिषद जाने की व्यवस्था देखनी होगी या मंत्री पद खतरे में पड़ जाएगा।
5- भाजपा के लिए क्यों अहम हैं उपेंद्र कुशवाहा?
2023 में बिहार में हुए जातीय गणना के अनुसार राज्य में कुशवाहा समाज के लोगों की संख्या 4.2 फीसदी है। भाजपा की कोशिश इस समुदाय के वोटर को अपने साथ रखने की है। सीएम सम्राट चौधरी कुशवाहा बिरादरी से आते हैं।
उपेंद्र कुशवाहा की छवि बिहार के बड़े कुशवाहा नेता की है। उनकी पार्टी की पकड़ वैसे करीब 50 विधानसभा सीटों पर है, जहां कुशवाहा के निर्णायक वोटर हैं। लोकसभा के 9 सीट ऐसे हैं, जहां कुशवाहा कास्ट स्ट्रांग है। इन सीटों पर उपेंद्र कुशवाहा की पकड़ मजबूत मानी जाती है।
बिहार में 1 से 2 फीसदी वोट इधर-उधर खिसक जाने पर रिजल्ट में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व की कोशिश उपेंद्र कुशवाहा को अपने साथ बनाए रखने की है। यही वजह है कि भाजपा ने 5 महीने पहले अपने विधायकों की मदद से उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा था।
अब जानिए, दीपक प्रकाश के मंत्री पद को सुप्रीम कोर्ट में किसने चुनौती दी?
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर संविधान के ऑर्टिकल 164(4) के तहत बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री बनाए जाने को अवैध बताया है।
उनका तर्क है कि एक ही विधानसभा के कार्यकाल के भीतर सिर्फ सरकार बदलने या मुख्यमंत्री बदलने का बहाना बनाकर किसी गैर-विधायक को दोबारा 6 महीने की छूट देकर मंत्री नहीं बनाया जा सकता।
याचिका में कहा गया है कि पहली बार मंत्री बनने के बाद से बिना चुनाव जीते मंत्री रहने की जो 6 महीने की तय अवधि होती है, वह 20 मई, 2026 को ही समाप्त हो चुकी है।
याचिका के मुताबिक, सरकार बदलने, इस्तीफा देने या मंत्रिमंडल के पुनर्गठन का सहारा लेकर इस 6 महीने की समय-सीमा को ‘रीसेट’ (शुरू से शुरू) नहीं किया जा सकता।
दरअसल…
- दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बनाया गया था। उस समय वह न तो विधानसभा (MLA) के सदस्य थे और न ही विधान परिषद (MLC) के।
- बिना चुनाव जीते मंत्री रहने की उनकी 6 महीने की अवधि समाप्त होने से पहले ही 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार सरकार गिर गई और मंत्रिपरिषद भंग हो गई।
- इसके बाद 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार में नई सरकार बनी। इस नई सरकार में दीपक प्रकाश को दोबारा (बिना चुनाव जीते) पंचायती राज मंत्री पद की शपथ दिला दी गई।
संविधान के ऑर्टिकल 164(4) के मुताबिक…
- किसी भी व्यक्ति को (भले वह राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है) मंत्री बनाया जा सकता है।
- लेकिन शर्त है कि उसे नियुक्ति की तारीख से लगातार 6 महीने के भीतर किसी भी एक सदन की सदस्यता (चुनाव जीतकर या मनोनीत होकर) हासिल करनी होगी।
- यदि वह ऐसा नहीं कर सका तो उसे 6 महीना पूरा होते ही मंत्री छोड़ना होगा। या उसका मंत्री पद स्वतः समाप्त हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?
इस मामले पर 30 जुलाई को सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बिहार सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि बिना चुनाव जीते 6 महीने की अनिवार्य अवधि बीत जाने के बाद भी कोई मंत्री अपने पद पर कैसे बना रह सकता है।
CJI सूर्यकांत ने कहा, ‘यह पूरी तरह से कानून से जुड़ा सवाल है। राज्य सरकार को यह समझाना होगा कि बिना निर्वाचित हुए कोई मंत्री 6 महीने से ज्यादा समय तक पद पर कैसे बना रह सकता है।’ अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी।







