बांकीपुर को भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है यही कारण है कि वर्ष 1995 से लगातार BJP इस सीट पर जीत दर्ज करती रही है. बीते 2025 के विधानसभा चुनाव में भी नितिन नवीन यहां से विधायक चुने गए थे. लेकिन, उनके राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई और उपचुनाव कराया गया. इस बार बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा. आरजेडी ने रेखा गुप्ता पर भरोसा जताया, जबकि जन सुराज से प्रशांत किशोर खुद चुनाव मैदान में उतरे. इसलिए मुकाबला सीधे BJP बनाम RJD नहीं रहा, बल्कि प्रशांत किशोर की मौजूदगी ने इसे त्रिकोणीय बना दिया. लेकिन इस त्रिकोणीय मुकाबले में सिर्फ 34.31 प्रतिशत मतदाताओं का वोट डालने निकलना अब सबसे बड़ा चुनावी संकेत बन गया है.
वहीं, जानकारों की नजर में बीजेपी के लिए यह कम वोटिंग अपने मजबूत कोर वोट बैंक के कारण राहत का संकेत हो सकती है, जबकि राजद और प्रशांत किशोर के जन सुराज के लिए सवाल यह है कि क्या उनके पक्ष में बदलाव चाहने वाले मतदाता बड़ी संख्या में घर से निकले या नहीं. आइए इसको विस्तार से समझते हैं.
BJP के लिए कम वोटिंग राहत क्यों?
कम मतदान का सबसे पहला राजनीतिक अर्थ बीजेपी के लिए निकाला जा रहा है. दरअसल, बांकीपुर में बीजेपी का संगठन लंबे समय से मजबूत रहा है और पार्टी का अपना एक स्थायी कोर वोट बैंक माना जाता है. ऐसे में अगर सामान्य मतदाता और कम उत्साह वाले वोटर मतदान से दूर रहते हैं, लेकिन भाजपा के प्रतिबद्ध समर्थक बूथ तक पहुंचते हैं तो कम मतदान का फायदा मजबूत संगठन वाले दल को मिल सकता है. यही कारण है कि बीजेपी खेमे में 34.30 प्रतिशत वोटिंग को पूरी तरह नकारात्मक संकेत के तौर पर देखने की जरूरत नहीं है. पार्टी के लिए असली सवाल यह है कि उसके पारंपरिक मतदाताओं की वोटिंग कितनी रही. अगर भाजपा का कोर वोट बड़े पैमाने पर मतदान करने निकला है तो कम टर्नआउट के बावजूद पार्टी अपनी बढ़त को लेकर आश्वस्त हो सकती है.
RJD के लिए चिंता या उम्मीद?
राजद के सामने तस्वीर थोड़ी अलग है. पार्टी को सिर्फ अपने पारंपरिक वोट बैंक को सक्रिय करने के साथ-साथ उन मतदाताओं को भी मतदान केंद्र तक लाना था जो बदलाव के पक्ष में हो सकते हैं. लेकिन, कम मतदान आरजेडी के लिए इसलिए चिंता पैदा कर सकता है कि अगर उसके समर्थन में रहने वाले सामान्य और फ्लोटिंग वोटर घर से नहीं निकले तो मजबूत संगठन वाले भाजपा को फायदा मिल सकता है. हालांकि, इसका दूसरा पहलू भी है. अगर आरजेडी का कोर वोट पूरी तरह उसके साथ रहा और बीजेपी के खिलाफ वोटों का ध्रुवीकरण हुआ तो कम मतदान के बावजूद मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है. इसलिए आरजेडी के लिए 34.31 प्रतिशत वोटिंग को सीधे नुकसान का संकेत मानना भी जल्दबाजी होगी.
प्रशांत किशोर के लिए सबसे बड़ा टेस्ट
बांकीपुर में सबसे ज्यादा दिलचस्पी प्रशांत किशोर के प्रदर्शन को लेकर है. जन सुराज के संस्थापक पहली बार खुद चुनाव मैदान में हैं और उन्होंने युवाओं तथा बदलाव चाहने वाले मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की. अब सवाल यह है कि जिन मतदाताओं के बीच प्रशांत किशोर की अपील दिखाई दे रही थी, क्या वे मतदान केंद्र तक भी पहुंचे? अगर कम मतदान के बावजूद प्रशांत किशोर को अच्छा वोट मिलता है तो इसका मतलब होगा कि उनकी अपील सीमित लेकिन प्रभावी मतदाता वर्ग तक पहुंची. लेकिन अगर उन्हें अपेक्षा से कम वोट मिले तो यह संकेत होगा कि चुनावी प्रचार की चर्चा वोट में पूरी तरह तब्दील नहीं हो पाई.
यानी 34.31 प्रतिशत मतदान प्रशांत किशोर के लिए सिर्फ कम वोटिंग नहीं, बल्कि उनकी चुनावी राजनीति की पहली बड़ी परीक्षा का हिस्सा है.
यानी 34.31 प्रतिशत मतदान प्रशांत किशोर के लिए सिर्फ कम वोटिंग नहीं, बल्कि उनकी चुनावी राजनीति की पहली बड़ी परीक्षा का हिस्सा है.
BJP के मजबूत वोट बैंक बनाम बदलाव का वोट
बांकीपुर में सवर्ण और वैश्य मतदाताओं का एक हिस्सा बीजेपी का पारंपरिक समर्थन आधार माना जाता है. ऐसे में कम मतदान के बीच भाजपा के पास संगठन और कोर वोट का फायदा उठाने की संभावना बनी रहती है. दूसरी तरफ प्रशांत किशोर और आरजेडी दोनों के लिए चुनौती यह रही होगी कि वे बीजेपी के इस मजबूत आधार के बाहर के मतदाताओं को कितना सक्रिय कर पाए. यही वजह है कि कम मतदान में सिर्फ प्रतिशत देखना पर्याप्त नहीं है. असली सवाल यह है कि किसका वोट पड़ा और किसका वोट घर में रह गया.
कम वोटिंग में सबसे बड़ा सवाल- कौन घर में बैठा?
बांकीपुर जैसे शहरी इलाके में उपचुनाव के दौरान मतदाताओं में आम चुनाव जैसी दिलचस्पी नहीं दिखना असामान्य नहीं माना जाता. नौकरीपेशा, मध्यम वर्ग और सामान्य मतदाता का एक हिस्सा उपचुनाव में मतदान के लिए उतना उत्साहित नहीं होता. लेकिन, राजनीतिक दलों के कोर समर्थक और बूथ स्तर के कार्यकर्ता आमतौर पर ज्यादा सक्रिय रहते हैं. यही वजह है कि 34.31 प्रतिशत मतदान का असली अर्थ 3 अगस्त को सामने आएगा. अगर बीजेपी के परंपरागत मतदाता बड़ी संख्या में निकले तो पार्टी के लिए कम मतदान राहत की खबर साबित हो सकता है. अगर राजद का समर्थक वर्ग अपेक्षाकृत ज्यादा सक्रिय रहा तो कम मतदान का गणित बदल सकता है. अगर प्रशांत किशोर अपने समर्थकों को बूथ तक लाने में सफल रहे तो त्रिकोणीय मुकाबले का नतीजा अनुमान से अलग भी हो सकता है.







