क दौर था जब बिहार में कांग्रेस का एकछत्र राज था। आजादी के बाद, 1967 से पहले हुए चुनाव तक उसे किसी दल की ओर से चुनौती नहीं मिली। बाद के दिनों में आपातकाल और जेपी आंदोलन से छात्रों-युवाओं का आक्रोश उसपर भारी पड़ा। पार्टी नेतृत्व बिहार में प्रयोग के तौर पर मुख्यमंत्री बदलते रहा, और कांग्रेस में गुटों की दरार चौड़ी होती गई। रही सही कसर 1990 के दशक में मंडल-कमंडल के दौर में भाजपा और क्षेत्रीय दलों ने पूरी कर दी।
सोशल इंजीनियरिंग, जातीय राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उभार ने कांग्रेस की बची-खुची जमीन छीन ली। पार्टी अर्श से फर्श पर आ गिरी। तब से आज तक वह सत्ता से दूर ही है। 1967 के चुनाव में पहली बार कांग्रेस बिहार की सत्ता से दूर हुई। तब वह 318 सीट पर चुनाव लड़कर 128 सीट ही जीत पाई थी। 1972 में पार्टी 167 सीट जीतकर पुन: सत्ता में लौटी। लेकिन, 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन ने कांग्रेस की नींव हिला दी। छात्र आंदोलन से बिहार में नए राजनीतिक क्षत्रपों का उदय हुआ। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस के 286 में से सिर्फ 57 उम्मीदवार ही सफल हो पाए।
हालांकि, जनता पार्टी सरकार की आपसी खींचतान ने तीन साल बाद 1980 में ही विधानसभा चुनाव का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इस चुनाव में उसे स्पष्ट बहुमत मिला। पार्टी ने 311 सीटों पर चुनाव लड़कर 169 पर कब्जा किया। इंदिरा गांधी की मृत्यु से उपजी सहानुभूति लहर 1985 के चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में रही। जनता ने 196 सीटें देकर उसे फिर सत्ता पर बैठाया। 1980 से 90 के बीच का काल कांग्रेस के लिए स्वर्णकाल रहा। हालांकि इस दौरान कांग्रेस आलाकमान ने बिहार में छह मुख्यमंत्री बनाए। ऐसे में सभी अपनी कुर्सी बचाने में ही लगे रहे। पार्टी के अंदर गुटबाजी बढ़ती गई। इसका परिणाम पार्टी को भुगतना पड़ा।
1989 में भागलपुर में हुए दंगों से मुसलमानों ने भी कांग्रेस का दामन छोड़ दिया। पार्टी से पिछड़ा और दलित वोट बैंक पहले ही खिसक चुका था।
अगड़ों को भाजपा ने अपने पक्ष में कर लिया था। फलस्वरूप 1990 आते-आते पार्टी के पास कोई ठोस जनाधार नहीं बचा। कांग्रेस का आधार वोट बैंक खिसकर क्षेत्रीय दलों के पास चला गया। इसी बीच मंडल की राजनीति हावी हो गई। नतीजन 1990 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी 71 सीटों पर सिमट गई, जबकि उसने 323 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। जनता दल के नेतृत्व में लालू यादव की सरकार बनी। पिछड़ों की गोलबंदी के चलते इसके बाद हुए सात चुनाव में कांग्रेस सीटों को तरसती रही। 1995 में उसके 320 में से 29 और 2000 में 324 में से 23 उम्मीदवार ही सफल हुए। अविभाजित बिहार का यह अंतिम चुनाव था।
1990 के बाद बिहार में कांग्रेस गठबंधन के सहारे भले ही राज्य की सत्ता में भागीदार भी बनी, लेकिन खुद की स्थिति कमजोर होती गई। 1998 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पहली बार राजद के साथ गठबंधन किया। तब भी उसे खास सफलता नहीं मिली। तब 2000 विधानसभा चुनाव में वह अकेले दम पर मैदान में उतरी। किसी को बहुमत नहीं मिलने पर कांग्रेस ने लालू का समर्थन कर दिया और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं।
फरवरी 2005 में लोजपा के साथ मिलकर उसने चुनाव लड़ा। 84 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिसमें 10 जीत पाए। अक्टूबर 2005 में फिर राजद के साथ गठबंधन में आ गई। अपने खाते की 51 सीटों में से 9 पर कब्जा जमाया। 2010 में पार्टी ने एक बार फिर अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला लिया। 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन सिर्फ चार ही सफल हो सके। तब मजबूरन उसे फिर गठबंधन की शरण में जाना पड़ा। 2015 में उसने गठबंधन के तहत अपने हिस्से के 41 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। इस चुनाव में जदयू-राजद के साथ का उसे फायदा मिला। पार्टी का स्ट्राइक रेट सुधरा। पार्टी ने 41 में से 27 सीटों पर जीत हासिल की। 2020 में भी कांग्रेस ने महागठबंधन में चुनाव लड़ी। 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिसमें 19 सफल हुए।
पार्टी 2025 चुनाव से पहले अतिपिछड़ों, दलितों, महिलाओं और युवाओं के लिए लोकलुभावन वादे कर रही है। संगठन में बदलाव कर उसने गोलबंदी के प्रयास शुरू किए हैं। पहली बार दलित को प्रदेश अध्यक्ष की कमान दी है। राहुल गांधी सहित राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के ताबड़तोड़ दौरे हो रहे हैं। प्रभारी कृष्णा अल्लावारू अपनी टीम के साथ दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। पार्टी अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए पुरजोर प्रयास करती दिख रही है, पर देखना होगा कि वह इसमें कितना सफल होती है।
1967
वर्ष सीटें लड़े जीते मत प्रतिशत
1951 322 239 41.38 फीसदी
1957 312 210 42.09 फीसदी
1962 318 185 41.35 फीसदी
1967 318 128 33.09 फीसदी
1969 318 118 30.46 फीसदी
1972 259 167 33.12 फीसदी
1977 286 57 23.58 फीसदी
1980 311 169 34.20 फीसदी
1985 323 196 39.30 फीसदी
1990 323 71 24.78 फीसदी
1995 320 29 16.27 फीसदी
2000 324 23 11.06 फीसदी
2005 फरवरी 84 10 5 फीसदी
2005 अक्टूबर 51 09 6.09 फीसदी
2010 243 04 8.37 फीसदी
2015 41 27 6.66 फीसदी
2020 70 19 9.48 फीसदी
के चुनाव में पहली बार कांग्रेस बिहार की सत्ता से दूर हुई







