कभी बिहार की पहचान उसकी चीनी और पेपर मिलों से होती थी. इन फैक्ट्रियों की चिमनियों से उठता धुआं सिर्फ उद्योगों के चलने का संकेत नहीं था, बल्कि लाखों लोगों के रोजगार, किसानों की खुशहाली और राज्य की आर्थिक मजबूती का प्रतीक था. समय के साथ एक-एक कर ये मिलें बंद होती गईं, जिससे हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई और बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ा. अब बिहार सरकार ने वर्षों से बंद पड़ी इन मिलों को दोबारा शुरू करने की तैयारी की है. ऐसे में सभी की नजर इस बात पर है कि क्या यह पहल राज्य में औद्योगिक विकास और रोजगार के नए दौर की शुरुआत कर पाएगी.
सरकार ने अधिग्रहण किया, लेकिन नहीं बचा सकी उद्योग
साल 1977 से 1985 के बीच तत्कालीन सरकारों ने कई चीनी मिलों का अधिग्रहण किया. कर्पूरी ठाकुर सरकार के समय लोगों को उम्मीद जगी कि सरकारी नियंत्रण में मिलें दोबारा चमकेंगी. इसी दौरान सकरी (मधुबनी), रैयाम और लोहट (दरभंगा), बनमनखी (पूर्णिया), मोतीपुर (मुजफ्फरपुर), पूर्वी चंपारण और समस्तीपुर समेत कई मिलें सरकार के अधीन आ गईं. लेकिन सरकारी प्रबंधन भी इन्हें बचा नहीं सका. धीरे-धीरे घाटा बढ़ता गया और 1997-98 के बाद एक-एक कर अधिकांश मिलों पर ताले लगने लगे.
साल 2005 में बिहार स्टेट शुगर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को बंद मिलों को पुनर्जीवित करने की जिम्मेदारी दी गई. विशेषज्ञों की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि कुछ मिलों को छोड़कर बाकी को कृषि आधारित उद्योगों में बदला जाए. सकरी चीनी मिल को डिस्टिलरी बनाने का भी प्रस्ताव सामने आया. इसके बाद 2008 में अधिकांश बंद मिलों की नीलामी हुई. रैयाम और सकरी मिल समेत कई इकाइयां निजी कंपनियों के हाथ चली गईं. उम्मीद थी कि निवेश होगा और उत्पादन फिर शुरू होगा, लेकिन अधिकांश निवेशकों ने मिलों में अपेक्षित पूंजी नहीं लगाई. नतीजा यह हुआ कि करोड़ों की संपत्ति वर्षों तक बंद पड़ी रही.
पेपर मिल से जूट मिल तक… हर उद्योग की एक जैसी कहानी
सिर्फ चीनी मिलें ही नहीं, बिहार की पेपर मिल, जूट मिल और कई अन्य बड़े उद्योग भी राजनीतिक उपेक्षा, कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और तकनीकी पिछड़ेपन का शिकार हुए. दरभंगा की प्रसिद्ध अशोक पेपर मिल इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. वर्ष 1958 में इसकी स्थापना हुई. किसानों से जमीन लेकर उन्हें रोजगार और विकास का सपना दिखाया गया था. लेकिन समय के साथ यह उद्योग भी बंद हो गया और हजारों लोग बेरोजगार हो गए.
उद्योग बंद हुए तो किसानों और मजदूरों का भी भविष्य उजड़ा
चीनी मिलें बंद होने का सबसे बड़ा असर गन्ना किसानों और मजदूरों पर पड़ा. किसानों को अपनी फसल का बाजार नहीं मिला, मजदूरों का रोजगार खत्म हो गया और बड़ी संख्या में लोगों ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की ओर पलायन किया.
बिहार विधानसभा चुनावों में रोजगार हमेशा सबसे बड़ा मुद्दा रहा. लगभग सभी राजनीतिक दल रोजगार देने का वादा करते रहे, लेकिन सवाल यह भी उठता रहा कि जिन सरकारों के कार्यकाल में उद्योग धीरे-धीरे खत्म होते गए, वे उन्हें बचा क्यों नहीं सकीं. आज भी बिहार में होने वाले चुनाव में चीनी मिल खोलने के वायदे सभी पार्टी के मेनिफेस्टो में रहता है.
अब बिहार सरकार ने “समृद्ध उद्योग, सशक्त बिहार” विजन के तहत बंद पड़े उद्योगों को दोबारा शुरू करने की बड़ी रणनीति बनाई है.
नई औद्योगिक नीति के तहत सरकार ने कई बड़े फैसले लिए हैं—
- राज्य में 25 नई चीनी मिलों की स्थापना का लक्ष्य.
- सरकारी जमीन निवेशकों को ₹1 की प्रतीकात्मक दर पर उपलब्ध कराने की योजना.
- निवेशकों को भारी सब्सिडी और प्रोत्साहन.
- आधुनिक तकनीक आधारित मिलें, जहां सिर्फ चीनी ही नहीं बल्कि एथेनॉल और बिजली का भी उत्पादन होगा.
- कानून में संशोधन कर बंद मिलों की जमीन पर नए निवेश का रास्ता आसान बनाया गया है.
नवंबर 2026 से शुरू होगी नई शुरुआत
सरकार के मुताबिक पहले चरण में नवंबर 2026 के पेराई सत्र से सकरी (मधुबनी), रैयाम (दरभंगा) और सासामूसा (गोपालगंज) चीनी मिलों को दोबारा चालू करने की तैयारी तेज कर दी गई है. पीएम मोदी खुद 20 नवंबर को सकरी (मधुबनी), रैयाम (दरभंगा) चीनी मिल की आधारशिला रखेंगे. इसके अलावा पूर्णिया की बनमनखी चीनी मिल समेत कई अन्य बंद मिलों को भी पुनर्जीवित करने और नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने के लिए निवेशकों से प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं. बिहार सरकार ने अगले 5 साल में 25 नई चीनी मिलें स्थापित करने का लक्ष्य तय किया है.
क्या इस बार बदलेगी बिहार की किस्मत?
बिहार का औद्योगिक इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, उतना ही दर्दनाक उसका पतन भी रहा है. बंद मिलों ने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी, किसानों को बाजार से वंचित कर दिया और युवाओं को रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर धकेल दिया.







