तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की सरकार हैदराबाद विश्वविद्यालय से सटे रंगारेड्डी जिले के कांचा गाचीबोवली में 400 एकड़ विवादित भूमि की नीलामी के अपने फैसले के कारण न्यायपालिका, केंद्र सरकार, पर्यावरणविदों, छात्रों, शिक्षाविदों, विपक्षी दलों और यहां तक कि फिल्म बिरादरी, सभी तरफ से आलोचनाओं का सामना कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि पर बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया। वहां भारी मशीनरी तैनात करके वन्यजीव और जल निकायों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना की मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि जब तक उचित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन नहीं हो जाता और आवश्यक मंजूरी नहीं मिल जाती, तब तक क्षेत्र में सभी गतिविधियां तुरंत रोक दी जाएं।
दूसरी ओर, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एक गैर-सरकारी संगठन और हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद विवादित भूमि पर सभी प्रकार की गतिविधियों पर रोक बढ़ा दी। चार सौ एकड़ में फैले जंगल को विकास के नाम पर काटा जाए, इसे कोई न्यायोचित नहीं ठहरा सकता। एक्सपर्टस का कहना है कि इस जंगल में पेड़ पौधों की 75 किस्में हैं, पशु-पक्षियों की 233 प्रजातियां हैं। ये जंगल पूरे हैदराबाद को सांस लेने लायक ऑक्सीजन देता है। अगर ये जंगल नष्ट हो गया तो हैदराबाद और उसके आस पास के इलाके में गर्मी बढ़ जाएगी, तामपान तीन डिग्री तक बढ़ जाएगा। शायद ये सब बातें देखकर ही सुप्रीम कोर्ट ने इस जंगल को काटने पर रोक लगाई थी। अब रेवंत रेड्डी इस सवाल का जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि आखिर उन्होंने रात के अंधेरे में बुलडोजर क्यों चलवाए? अगर विकास के लिए ये काम इतना जरूरी था, तो दिन के उजाले में ये काम करते।







