बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान राजद के मौजूदा कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव जितने सक्रिय दिखे, अब उसमें कमी दिख रही है. आलम यह कि उन्हें बांकीपुर उपचनाव की कोई परवाह नहीं. वे जरूरी काम छोड़कर अपने निजी कामों को प्राथमिकता देते रहे हैं. उनके लिए विधानसभा सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष की भूमिका का स्मरण भी नहीं रहा. 2015 के चुनाव के पहले जिस उपचुनाव के नतीजों ने उन्हें बड़ा फलक 2015 में दिया, वे उसे भूल गए हैं.
बांकीपुर विधानसभा के उपचुनाव के लिए नामांकन का आखिरी दिन काफी रोचक रहा. नामांकन के बहाने 3 दलों के उम्मीदवारों ने शक्ति परीक्षण किया तो चौथे उम्मीदवार की गिरफ्तारी ने सबको चौंका दिया. नामांकन के आखिरी दिन 3 उम्मीदवार अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए पर्चा दाखिल करने पहुंचे. भाजपा के परिवर्तित उम्मीदवार नीरज सिन्हा और जन सुराज के प्रशांत किशोर के समर्थन में उमड़े जनसैलाब को देख दोनों में किसी को कमतर आंकना बड़ी भूल होगी. फर्क यही रहा कि प्रशांत किशोर की पार्टी ने राज्य भर के अपने कार्यकर्ताओं-समर्थकों को नामांकन के दिन हाजिर रहने की खुली अपील की थी, जबकि भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा के समर्थन में बड़े नेताओं के साथ सिर्फ पटना के समर्थक ही थे. रेखा गुप्ता भी अपनी पार्टी की क्षमता के हिसाब से समर्थकों की भीड़ लेकर पहुंची थीं. नामांकन को दिलचस्प बनाने वाली जनशक्ति जनता दल की प्रत्याशी वीणा मानवी रहीं, जिन्हें नामांकन के तुरंत बाद पुलिस ने फर्जीवाड़े के किसी मामले में अरेस्ट कर लिया. हर काम में आगे रहने की होड़ वाले राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव की कमी जरूर उनकी उम्मीदवार रेखा गुप्ता को खली होगी.
चुनाव में सबसे पहले लुभावने वादों की बरसात
लोककसभा चुनाव 2024 के नतीजे आने के बाद से ही तेजस्वी यादव हमेशा आगे रहने की कोशिश करते रहे हैं. उनका यह उत्साह शायद लोकसभा में 4 सदस्यों के साथ राजद के सूखे की समाप्ति के कारण था. यह अलग बात है कि उन्हें उस अनुरूप 2025 के विधानसभा चुनाव में जनता ने कामयाब नहीं होने दिया. लोकसभा का चुनाव बीतते ही तेजस्वी बिहार के जिलों का दौरा करने लगे थे. जनता के सेवक और मुख्यमंत्री का चेहरा बनने वाले के लिए यह जरूरी भी था. एक-एक कर वे अपनी संभावित सरकार की योजनाओं की घोषणा करने लगे थे, महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए देने की उन्होंने घोषणा की. असेंबली चुनाव जब सिर पर आया तो महिलाओं को साल भर की रकम एकमुश्त 30 हजार रुपए देने का उन्होंने संशोधित ऐलान किया. इतना ही नहीं, हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी की बात भी कही. ओल्ड एज पेंशन बढ़ाने से लेकर 200 यूनिट तक फ्री बिजली देने की भी उन्होंने घोषणा की. उन्होंने ये सारी घोषणाएं तब कीं, जब सरकार निश्चिंत बैठी थी. पर, समय आने पर नीतीश कुमार की योजनाओं-घोषणाओं ने उनके तमाम वादों पर पानी फेर दिया. नतीजा सबने देखा. राजद पिछली बार (2020) की 75 सीटों से खिसक कर 25 पर सिमट गया. बाद में जब नीतीश कुमार ने अपने अंदाज में ऐसी ही घोषणाएं कीं तो तेजस्वी ने कहा कि सरकार नकलची है.
शपथ ग्रहण से पहले ही नेता प्रतिपक्ष का चुनाव
चुनाव में जीत-हार या सफलता—विफलता स्वाभाविक संभावनाएं हैं. राजद और उसके नेतृत्व वाले महागठबंधन को जब महज 35 सीटों पर सिमटना पड़ा तो तेजस्वी की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि कम से कम उन्हें नेता प्रतिपक्ष का ओहदा हासिल हो जाए. उनके अधैर्य को आप इस बात से समझ सकते हैं कि विधायकों ने अभी शपथ तक नही ली और उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनने की हड़बड़ी होने लगी. आनन-फानन उन्होंने राजद विधायक दल की बैठक बुलाई और सरकार गठन के पहले ही नेता प्रतिपक्ष के लिए अपने नाम पर सहमति का प्रस्ताव पारित करा लिया. उनके नेता प्रतिपक्ष बनने में एक सहूलियत यह थी कि उनकी पार्टी के 25 सदस्य चुन कर आए थे और यह संख्या इसके लिए पर्याप्त थी. यहां भी उन्होंने औरों से आगे निकलने की अपनी हड़बड़ी दिखाई. यह अलग बात है कि बाद में नेता प्रतिपक्ष की उनकी कुर्सी को खतरे में डालने का बंदोबस्त भी एनडीए ने कर लिया है. राज्यसभा चुनाव में राजद के विधायक फैसल रहमान ने वोट नहीं किया. इससे एनडीए को लाभ हुआ. यह जानने के बावजूद तेजस्वी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक एक्शन से इसलिए बचते रहे हैं कि इससे उनकी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है.
फाउंडेशन डे से पहले ही कार्यक्रम का आयोजन
राजद के लिए 5 जुलाई का दिन सबसे अहम माना जाता है. इसी दिन राजद की स्थापना हुई थी. पार्टी की परंपरा रही है कि हर साल इस दिन बड़ा आयोजन होता है और राजद आगे की अपनी योजनाओं-तैयारियों से समर्थकों को अवगत कराता है. यह परंपरा तब भी बरकरार रही है, जब राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले के आरोप में जेल में थे. इस बार यह परंपरा तेजस्वी ने तोड़ दी है. परंपरा तोड़ने की वजह संगठन की कोई मजबूरी नहीं, बल्कि तेजस्वी यादव के विदेश भ्रमण की बेचैनी रही है. उन्होंने परंपरा तोड़ते हुए स्थापना दिवस की औपचारिकता 4 दिन पहले ही पूरी कर ली. फिर वे विदेश के सैर-सपाटे पर निकल गए. उन्हें यह भी ख्याल नहीं आया कि बांकीपुर में उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है. 2025 के चुनाव में राजद यहां सेकेंड रनर रहा है. अब सूचना यह आ रही है कि वे विदेश यात्रा से 24 जुलाई को लौटेंगे. उसके बाद उनके पास बमुश्किल 2-3 दिनों का समय बचेगा. इतने कम समय में वे चुनाव प्रचार के लिए जा सके तो ठीक, वर्ना रेखा गुप्ता राम भरोसे.
तेजस्वी यादव को इतनी हड़बड़ी क्यों रहती है?
तेजस्वी यादव हमेशा हड़बड़ी में दिखते हैं. इसकी वाजिब वजह भी है. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के साथ आरजेडी ने चुनाव लड़ा. आरजेडी को सर्वाधिक 80 सीटें मिलीं. यह वही चुनाव था, जब तेजस्वी यादव की अपने बड़े भाई तेज प्रताप यादव के साथ राजनीति में एंट्री हुई थी. अगली बार यानी 2020 में तेजस्वी के नेतृत्व में राजद ने चुनाव लड़ा और 2015 से सिर्फ 5 कम यानी 75 सीटें राजद को मिलीं. महागठबंधन की सीटें सरकार बनाने की जरूरी संख्या से सिर्फ 12 कम रह गईं. तेजस्वी को उत्साह से यह लग रहा था कि एक धक्का और दो, नीतीश की गद्दी छीन लो. उसे ही ध्यान में रखते हुए उन्होंने 2025 के चुनाव में किस्मत आजमाई. सुनिश्चित सफलता की उम्मीद में उन्होंने लोकलुभावन वादों का सहारा लिया, पर, नतीजे उसके उलट आए. अति उत्साह में उन्होंने जो घोषणाएं कीं. उसी आधार पर नीतीश ने बाद में या यूं कहें कि सही समय पर अपने अंदाज में ऐसी योजनाओं के ऐलान कर दिए, जिनसे तेजस्वी का सारा खेल बिगड़ गया. हड़बड़ में गड़बड़ का यह ज्वलंत उदाहरण साबित हुआ.
तेजस्वी यादव की सक्रियता सिर्फ चुनाव के वक्त
विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान तेजस्वी यादव जितने सक्रिय दिखे, अब उसमें कमी आ गई है. उन्हें उपचुनाव की कोई परवाह नहीं. वे जरूरी काम छोड़कर अपने निजी कामों को प्राथमिकता देते रहे हैं. उनके लिए विधानसभा सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष की भूमिका का स्मरण नहीं रहा. 2015 के चुनाव के पहले जिस उपचुनाव ने उन्हें बड़ा फलक 2015 में दिया, वे उसे भी भूल गए. वे अभी विदेश दौरे पर हैं. उनके आने या जाने की जानकारी भी सार्वजनिक नहीं है. करीबी ही जानते हैं कि वे 24 जुलाई को आएंगे. नेता प्रतिपक्ष सामान्य समझ के अनुसार विपक्ष का सीएम ही होता है. तेजस्वी को यह भी ध्यान नहीं. बहरहाल, बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम राजद की सेहत के लिए मायने रखता है. विपक्ष के लिए भी यह बड़ा संकेत है. सत्ता की सेहत पर इस एक सीट का चुनाव भले कोई असर न डाले, लेकिन प्रतिकूल परिणाम सत्ता पक्ष के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है.






