यों अंग्रेजी की एक फिल्म समीक्षक ने ‘द केरल स्टोरी’ को पांच में से ‘एक’ स्टार दिया है‚ इसका मतलब यह कि समीक्षक की नजर में यह फिल्म सिर्फ नाम की फिल्म है। यह मूल्यांकन उस मूल्यांकन से मिलता–जुलता है‚ जो कहता है कि यह प्रोपेगेंडा फिल्म है‚ जो केरल को बदनाम करने के लिए बनाई गई है‚ और कि यह ‘संघ’ का प्रोपेगेंडा मात्र है। कई लोग इस पर बैन लगाने के लिए कोर्ट तक गए‚ लेकिन कोर्ट ने इनके तर्क नहीं माने। फिर भी फिल्म का विरोध जारी है मगर यह भी साफ है कि विरोध का कारण फिल्मी उतना नहीं है जितना कि राजनीतिक और विचारधारात्मक है।
विवादित फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ का विरोध करने वाले भी कई तरह के हैं। कुछ हैं जो ‘फिल्म कला’ की दृष्टि से इसे ‘घटिया’ और ‘कोरी प्रचारात्मक’ फिल्म मानते हैं‚ लेकिन बहुत से विरोधी ऐसे भी हैं‚ जो इस फिल्म द्वारा एक्सपोज की जाती ‘धर्मांतरण की राजनीति’ की सचाई के खुलने से डरते हैं। ऐसे लोग फिल्म में दिखाए जाते इस ‘सत्य’ को स्वीकार नहीं कर पा रहे कि केरल में ‘धर्मांतरण’ किया या करवाया जाता है‚ जिसके लिए हिंदू और ईसाई लडÃकियों को बहलाया–फुसलाया जाता है‚ उनका ‘ब्रेन वॉश’ किया जाता है‚ उनको पैसों का लालच दिया जाता है। फिर उनको आतंकवादी जिहादी संगठन ‘आईसिस’ में भरती कर सीरिया या अफगानिस्तान आदि में भेज दिया जाता है। वे ‘जिहाद’ का हिस्सा बना दी जाती हैं‚ या जिहादियों के बच्चों को पैदा करने वाली मशीन बना दी जाती हैं। जो ऐसा नहीं करतीं उनको सताया जाता है‚ मार तक डाला जाता है।
कहने की जरूरत नहीं कि टीवी चैनलों की बहसों में भी ‘विरोधियों’ द्वारा बार–बार यही सिद्ध करने की कोशिश की गई है कि फिल्म मनगढंत कहानी है। झूठ का पुलिंदा है‚ और इस्लाम के खिलाफ घिनौना प्रचार है। यह ‘इस्लामोफोबिया’ फैलाती है और अब जब फिल्म रिलीज हो गई है‚ और पहले दिन सिनेमा हॉलों में ९५ प्रतिशत दर्शक खींच चुकी है‚ तब भी उसका विरोध जारी है‚ और यही आरोप लगाया जा रहा है कि यह केरल विरोधी ‘हिन्दुत्ववादी प्रोपेगेंडा’ की फिल्म है। ऐसे आरोपों का खंडन करते हुए फिल्म बनाने वालों का और फिल्म की ‘ तीन नायिकाओं’ (तीन भुक्तभोगी लडकियों) का कहना है कि यह फिल्म उनके जीवन के ‘धर्मांतरण’ के उस ‘भयावह सच’ को दिखाती है‚ जो अब तक नहीं दिखाया गया और जिस पर अक्सर परदा डाला जाता रहा है। यह फिल्म इस तरह से केरल की उन तीन लडकियों की ‘आप बीती’ कहती है‚ जिनको इस्लाम की तरफ आकर्षित करने के लिए तरह–तरह के प्रलोभन दिए गए और फिर ‘आतंकी–जिहादी’ संगठन ‘आइसिस’ में भरती करके ‘जिहादी’ बनाया गया। इनमें से ये तीन किसी तरह बचकर निकल आइ जिनकी ‘आप बीती’ को फिल्म बताती है। फिल्म बनाने वाले बताते हैं कि फिल्म उन्होंने लंबी रिसर्च के बाद बनाई है। यह रिसर्च कहती है कि ऐसी बहुत सी लडकियों का ‘धमाÈतरण’ किया जाता रहा है। उनमें से अनेक अपने मुल्क नहीं लौट सकी हैं। ऐसी गायब हुइ लडकियों की संख्या ३२००० के आसपास हो सकती है। ‘द केरल स्टोरी’ पर प्रतिबंध लगवाने के लिए जब फिल्म के विरोधी अदालत गए तो उन्होंने इन आंकडों पर आपत्ति की। टीवी की बहसों में वे कहते रहे कि ये आंकडे ‘झूठे’ हैं। इसके जवाब में फिल्म बनाने वालों का कहना रहा कि यह सब किसी एक लडकी के साथ भी गुजरा है‚ तो क्या इसे भी न दिखाया–बताया जाएॽ
फिल्म के विरोधियों के बरक्स फिल्म के पक्षधरों के तर्क कुछ इस तरह से सामने आते रहे कि ३२००० हजार की जगह अगर एक केस भी ऐसा हो तो क्या उससे आख मंूदी जा सकती हैं। कुछ विशेषज्ञों ने तो यह तक बताया कि अरसे से केरल में इस तरह की ‘कनवर्जन फैक्ट्री’ चलती है‚ जो धर्मांतरण कराती है‚ और इस ‘कनवर्जन फैक्ट्री’ को चलाने वालों का खुला ऐलान भी है कि केरल को जल्द ही ‘इस्लामिक राज्य’ बनाना है। ऐसी ही बातें कुछ बरस पहले केरल के एक पुराने कम्युनिस्ट सीएम ने कही थी। उनका कहना था कि यह ‘लव जिहाद’ ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन केरल ‘इस्लामिक स्टेट’ बन जाएगा। ईसाइयों को मुसलमान बनाने की ऐसी ही मुहिम की शिकायत केरल के एक कैथॉलिक बिशप भी कर चुके हैं। कोर्ट तक ने इसे ‘सच’ को माना है। इससे साफ है कि फिल्म चाहे ‘तीन भुक्तभोगी लडकियों की कहानी’ कहती हो‚ केरल के उस सच के बारे में जरूर कहती है‚ जिस पर अब तक परदा डाला जाता रहा है।
रेडियो ‘सुनने बात’ का अध्ययन बताता है फिल्म के विरोधियों के बरक्स फिल्म के पक्षधरों के तर्क कुछ इस तरह से सामने आते रहे कि ३२००० हजार की जगह अगर एक केस भी ऐसा हो तो क्या उससे आख मंूदी जा सकती हैं। कुछ विशेषज्ञों ने तो यह तक बताया कि अरसे से केरल में ‘कनवर्जन फैक्ट्री’ चलती है‚ जो धर्मांतरण कराती है ………







