आज से सावन महीने की शुरुआत हो रही है। ये भगवान शिव का प्रिय महीना है। आज गुरुवार को श्रवण नक्षत्र, आयुष्मान योग व सौभाग्य योग का संयोग रहेगा। ऐसे शुभ और उत्तम संयोग में उमा-महेश्वर की पूजा-आराधना, व्रत, जलार्पण करना बहुत की पुण्ययकारी होगा। हिन्दू धर्म में सावन महीने का खास महत्व है।इस महीने में भगवान शंकर की पूजा पुरे हर्षो-उल्लास से की जाती है। आज से प्रारंभ होकर से 28 अगस्त को सावन संपन्न होगा।
चार सोमवार का बना संयोग
सावन मास में चार सोमवार का अद्भुत संयोग बना है, जिसमें दो कृष्ण पक्ष और दो शुक्ल पक्ष में होंगे। सावन का पहला सोमवार 3 अगस्त इसके बाद दूसरी सोमवारी 10 अगस्त, तीसरी सोमवारी 17 अगस्त, चौथी व अंतिम सोमवारी 24 अगस्त को है।
शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व
पंडित झा ने पौराणिक कथाओं के हवाले से बताया कि सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मंथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने अपने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की, लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया।
इसी से उनका नाम ‘नीलकंठ महादेव’ पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। ‘शिवपुराण’ के अनुसार भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रूप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है।
आज से शुरू हुई पवित्र कांवड़ यात्रा
सावन के महीने की शुरुआत हो चुकी है. इस महीने में शिव जी की पूजा करने के साथ-साथ आपको चारों तरफ भगवा वस्त्र पहने शिव भक्त दिखाई देंगे. ये लोग नंगे पैर अपवे कंधे पर कांवड़ लेकर गंगातट पर जाते हैं. वहां से गंगाजल भरकर लाते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नंगे पैर जलभर कर पैदल चलने वाले इन भक्तों को कांवड़िया क्यों कहा जाता है. आखिर ये नाम उन्हें किसने दिया है? आज यानी 30 जुलाई 2026 से सावन महीने के साथ कांवड़ यात्रा का भी शुभारंभ हो गया है. देश के अलग-अलग हिस्सों से भक्त गंगाजल लेने के लिए हरिद्वार, बाबाधाम और गंगोत्री जाते हैं. सावन की शिवरात्रि 11 अगस्त को है. ऐसे में यह कांवड़ यात्रा का पर्व इस दिन तक मनाया जाने वाला है. आइए अब जानते हैं इन शिवभक्तों को कांवड़ियां क्यों कहते हैं.
क्या होती है कांवड़?
कांवड़ एक खास प्रकार की लकड़ी या मजबूत डंडे से बनी संरचना गोती है. इसके दोनों सिरों पल जल के लिए कलश बांधे जाते हैं. इन पात्रों में पवित्र नदी का जल भरकर लाया जाता है. इसके बाद भक्त इस कांवड़ को अपने कंधे पर रखते हैं और पैदल यात्रा करके आते हैं. कंधे पर जल से भरी कांवड़ रखने से भक्तों की यह यात्रा पवित्र हो जाती है. इस यात्रा को भगवान शिव के प्रति भक्तों की सच्ची श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है. कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िए आगे बढ़ते हुए हर-हर महादेव के जयकारे लगाते हैं. यात्रा पूरी होने पर शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं.
भक्तों का नाम कांवड़िया क्यों पड़ा?
बता दें कि कांवड़िया शब्द का सीधे तौर पर संबंध कांवड़ से ही होता है. जो भक्त कांवड़ उठाकर पवित्र जल लेकर यात्रा करते हैं, उन्हें कांवड़िया कहते हैं. कांवड़ धारण करने या कांवड़ लेकर यात्रा करने की वजह से ही इन्हें कांवड़िया कहा जाने लगा. सावन महीने के दौरान लाखों कांवड़िया हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख आदि जैसे पवित्र स्थलों से गंगाजल लेकर आते हैं. यात्रा के दौरान वे पैदल ही चलते हैं और नंगे पैर चलते हैं.
कांवड़ यात्रा में सिर्फ गंगाजल क्यों लाया जाता है?
हिंदू धर्म में गंगाजल का महत्व बहुत खास है. इस जल को सभी नदियों के जल से पवित्र माना जाता है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी गंगाजल शुद्ध होता है क्योंकि इसके जल को आप सालों-साल तक भरकर रख सकते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा नदी भगवान शिव की जटाओं में समाहित है और वहीं से निकलती है. इसलिए, गंगा और भगवान शिव का संबंध बहुत गहरा माना जाता है. कांवड़िए नदी के किनारे पहुंचते हैं. अपने कलश में गंगाजल भरते हैं और फिर वहां से अपने गंतव्य स्थान की ओर पैदल यात्रा करके पहुंचते हैं. यात्रा पूरी करने के बाद इस जल से ही भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है. भोलेनाथ को गंगाजल अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं.
कांवड़ से जुड़े नियम
- कांवड़ को भूमि से स्पर्श करवाना वर्जित माना जाता है. इसलिए, कांवड़ को भूलकर भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए. ऐसा होने पर कांवड़ खंडित हो जाती है.
- खान-पान- कांवड़ यात्रा के दौरान तामसिक भोजन और प्याज-लहसुन नहीं खाना चाहिए.
- बिना स्नान किए कांवड़ को स्पर्श नहीं करना चाहिए. शौच के बाद भी स्नान करना जरूरी होता है.
- कांवड़ियों को अपनी वेशभूषा में ही रहना चाहिए. उन्हें भगवा रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए.
- कांवड़ यात्रा के दौरान मन और वाणी को भी पवित्र रखना होता है.
असाध्य रोगों के मिलेगी मुक्ति
जातक या परिवार में किसी सदस्य को असाध्य बीमारी हो गई हो तो उसे सावन में सोमवार को जल में दूध व काले तिल डालकर शिवलिंग का अभिषेक करें। अभिषेक करते समय ‘ॐ जूं स:’ मंत्र का जाप करते रहें। इसके अलावा 11 हजार, 21 हजार या 1.25 लाख बार महामृत्युंजय का जाप करने या किसी योग्य ब्राह्मण को संकल्प देने से असाध्य बीमारी ,रोग, शोक, दु:ख, जरा व मृत्यु के बंधनों से मुक्ति मिलती है I







