पिछले कुछ हफ्तों में भारत की राजनीति में एक साफ पैटर्न दिखा है. एक के बाद एक आंदोलन और एक के बाद एक सरकार की ओर से रियायतें. पहले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के छात्र आंदोलन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवा दिया. फिर मध्य प्रदेश में किसानों के आंदोलन के सामने मोहन यादव सरकार ने घुटने टेक दिए और 3 मांगें मांग लीं. तो क्या बीजेपी सरकार अब आंदोलनों से डरने लगी है या फिर यह कोई नई स्ट्रैटजी है…
क्या बीजेपी सरकार सच में आंदोलनों से डर गई है?
एक्सपर्ट्स सूरत-ए-हाल देखकर 5 वजहें बताते हैं…
1. ‘डर चला गया’: Gen Z का वो मंत्र जिसने सरकार हिला दी
CJP आंदोलन के दौरान सबसे बड़ा बदलाव 20 जुलाई के ‘चलो संसद’ मार्च के बाद आया. पुलिस की कार्रवाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. फिर जो हुआ, वह इतिहास में दर्ज हो गया. प्रदर्शनकारियों ने एक के बाद एक ही बात दोहराई कि डर खत्म हो गया. पोस्टर्स और नारों में अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आने लगा. यह आंदोलन अब सिर्फ NEET पेपर लीक से बड़ा हो गया था.
यह बदलाव केंद्रीय दिल्ली में हो रहा था, जो देश की राजनीतिक ताकत का केंद्र है. एक ऐसा इलाका जहां PM मोदी ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के जरिए अपनी छाप छोड़ी थी. वहां पुलिस को चुनौती देना, सीधे प्रधानमंत्री को चुनौती देना था.
2. 25 साल की ‘ब्रांड मोदी’ को सबसे बड़ा झटका
PM मोदी की जीवनी लिखने वाले एनालिस्ट निलांजन मुखोपाध्याय ने साफ कहा है कि इस इस्तीफे पर यकीन करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि मोदी के स्वभाव में पीछे हटना नहीं है.’ मुखोपाध्याय ने इसे ‘ब्रांड मोदी’ को सबसे बड़ा संभावित झटका बताते हुए कहा, ’25 साल की ब्रांड बिल्डिंग में से बहुत कुछ बुरी तरह टूट गया है.’
3. जब विपक्ष को मिला ‘दुर्लभ अवसर’
CJP आंदोलन ने भारत के बिखरे हुए विपक्ष को सरकार पर दबाव बनाने का एक शानदार मौका दिया. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को संसद में जमकर उठाया. राहुल गांधी ने सदन में कहा, ‘गृह मंत्री ने छात्रों पर गोली चलाने का आदेश दिया.’ एक ऐसा आरोप जिसने सरकार को डिफेंस में ला दिया.
4. सोशल मीडिया का ‘उलटा असर’
बीजेपी एक समय सोशल मीडिया पर सबसे मजबूत पार्टी हुआ करती थी, लेकिन इस बार पीछे रह गई। CJP का इंस्टाग्राम पर करीब 3 करोड़ फॉलोअर्स हो गए, जबकि बीजेपी के 96 लाख हैं. यानी महज कुछ महीों में CJP ने बीजेपी के सोशल मीडिया पर पीछे छोड़ दिया. मीम्स, रील्स और वायरल वीडियोज के जरिए Gen Z ने वह नैरेटिव बना दिया, जिसे सरकार कंट्रोल नहीं कर पाई.
5. 2027 के चुनाव का बढ़ता डर
2027 में पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्यों में चुनाव हैं. CJP आंदोलन की सफलता ने युवाओं में एक संदेश दिया, ‘अगर एकजुट होकर आवाज उठाएं तो सरकार को झुकना पड़ता है.’ यह संदेश बीजेपी के लिए खतरनाक है, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां युवा वोटर्स की संख्या करोड़ों में है.
राजनीतिक विश्लेषक अजय बोस के मुताबिक, ‘इन युवाओं ने दिखा दिया कि अगर आप खड़े होते हैं तो आपके, सफल होने की संभावना है. उन्होंने डर की उस दीवार को तोड़ दिया है.’
‘रणनीति’: यह सरकार की नई प्लेबुक है?
तीन बड़ी वजहों से लगता है कि यह सरकार की नई रणनीति है…
1. ‘सुनो, समझो, सुधारो’ वाला PM मोदी का Gen Z कॉम्पैक्ट
बीजेपी सरकार के रिएक्शन ने दिखाया कि सही और जिम्मेदार शासन एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं. PM मोदी ने चार दिनों में एक साफ डेमोक्रेटिक एक्शन प्लान पेश किया:
| तारीख | कदम |
| 23 जुलाई | NEET पेपर लीक के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट का वादा |
| 24 जुलाई | सोनम वांगचुक ने 26 दिन की भूख हड़ताल खत्म की |
| 25 जुलाई | धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा |
| 26 जुलाई | नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में 6 सदस्यीय टास्क फोर्स |
| 27 जुलाई | लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षा विधेयक पेश |
यह एक बेहतर रणनीति थी यानी डायलॉग से एक्शन तक का सफर. सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत की, उनकी मांगों को सुना और फिर तेजी से कानूनी और संस्थागत सुधारों की ओर बढ़ी.
2. PM मोदी की नई छवि ‘राजनीतिक उदारता’?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एक बेहतर नेता आलोचना को पी जाता है, चिंता को मान लेता है और संस्थागत हित को अपनी प्रतिष्ठा से ऊपर रख सकता है. यानी PM मोदी ने अपने मंत्री का इस्तीफा ले लिया, डायलॉग खुला रखकर और सुनने से कार्रवाई की ओर बढ़कर टकराव के बजाय सुलह का रास्ता चुना.
3. पुराने आंदोलनों से सीख मिली बड़ी सीख
2020-21 के किसान आंदोलन में सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने में लगभग 18 महीने लगे. NRC और CAA के खिलाफ आंदोलन भी महीनों और सालों तक चले. CJP आंदोलन सिर्फ 36 दिनों में अपनी मांगें मनवाने में कामयाब रहा.
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, ‘यह रणनीति में बदलाव को दिखाता है कि अब सरकार लंबी लड़ाई के बजाय जल्दी समाधान चुन रही है, ताकि आंदोलन को और बड़ा होने से रोका जा सके. CJP के नेताओं ने खुद भीमा कोरेगांव और CAA विरोधी आंदोलनों का उदाहरण दिया. यहां हिंसा भड़कने के बाद पुलिस ने आंदोलनकारियों को निशाना बनाया था. इस वजह से उन्होंने जल्द से जल्द जीत हासिल करना चाहा और सरकार ने जीत दे दी.
यह फौरन फैसला लेने की स्ट्रैटजी बताती है कि सरकार इस मुद्दे को लंबा नहीं खींचना चाहती थी.
तो आखिर यह क्या है डर या रणनीति?
एक्सपर्ट्स इसे डर और रणनीति का मिक्सचर मानते हैं…
1. ‘डर’ वाले पहलू:
- Gen Z के ‘डर चला गया’ मंत्र ने सरकार की अजेयता की छवि को चुनौती दी.
- पहली बार किसी आंदोलन ने इतनी जल्दी एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा करवाया.
- सोशल मीडिया पर बीजेपी पीछे पड़ गई.
- 2027 के चुनावों से पहले युवा वोट को एलियनेट करने का जोखिम.
2. ‘रणनीति’ वाला पहलू:
- सुनो-समझो-सुधारो की स्पष्ट नीति.
- चार दिनों में ठोस कार्रवाई.
- टकराव के बजाय सुलह का रास्ता.
- आंदोलन को लंबा न खींचना ताकि हिंसा और उग्रता न बढ़े.
जैसा कि एक्सपर्ट्स कहते हैं कि सरकार ने पीछे हटकर नुकसान को कंट्रोल करना चुना. यानी सरकार ने यह तौल लिया कि आंदोलन को और बढ़ने देने की तुलना में झुक जाना ज्यादा फायदेमंद है…
- यह ‘डर’ है, क्योंकि CJP ने सरकार की कमजोरी उजागर कर दी. ‘ब्रांड मोदी’ को चोट पहुंची और अब हर आंदोलन को लगता है कि वह जीत सकता है.
- यह ‘रणनीति’ भी है, क्योंकि सरकार ने CJP से सीख ली और मध्य प्रदेश में महज 3 दिन में आंदोलन खत्म कर दिया. राज्य जल्दी रियायत देकर बड़े नुकसान से बचा और केंद्र-राज्य का खेल खेलकर खुद को बचा लिया.
सच्चाई यह है कि ‘डर’ ने ‘रणनीति’ को जन्म दिया है. CJP की सफलता ने सरकार को डरा दिया और उसी डर से उसने नई रणनीति बनाई, यानी जल्दी रियायत, जल्दी आंदोलन खत्म. हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यही है कि रणनीति कब तक काम करेगी, क्योंकि जब हर आंदोलन को पता चल जाएगा कि सरकार कैसे झुकती है, तो आंदोलनों की बाढ़ आ जाएगी. तब सरकार के पास न तो डर बचेगा और न ही रणनीति.







