सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के चर्चित कथित कोल ब्लॉक आवंटन मामले में पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज मामले को बंद कर दिया है. अदालत ने कहा कि सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने और उनके खिलाफ संज्ञान लेने का कोई ठोस आधार नहीं था. हालांकि इस फैसले ने एक बार फिर उस घोटाले की चर्चा छेड़ दी है, जिसे कभी देश का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला बताया गया था. शुरुआत में कैग ने अनुमान लगाया था कि कोयला ब्लॉकों के आवंटन में कथित अनियमितताओं से सरकारी खजाने को करीब 10 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. बाद में अंतिम रिपोर्ट में यह अनुमान घटाकर 1.86 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया. आखिर यह पूरा मामला क्या था, इसमें मनमोहन सिंह की भूमिका क्यों सवालों में आई और आज इसकी कानूनी स्थिति क्या है? आइए पूरी कहानी समझते हैं.
क्या था कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला उत्पादक देशों में शामिल है. बिजली उत्पादन से लेकर इस्पात और सीमेंट उद्योग तक देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कोयले पर निर्भर है. ऐसे में कोयला खदानों का आवंटन हमेशा से बेहद अहम विषय रहा है. 1993 से लेकर 2010 तक केंद्र सरकार निजी और सरकारी कंपनियों को कोयला ब्लॉक आवंटित करती रही. उस समय आवंटन की प्रक्रिया नीलामी के बजाय स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों के आधार पर होती थी. सरकार का तर्क था कि इससे कोयला उत्पादन तेजी से बढ़ेगा और उद्योगों को ईंधन मिलेगा. लेकिन, बाद में इसी प्रक्रिया पर सवाल उठे. आरोप लगा कि जिन कंपनियों को ब्लॉक दिए गए, उनके चयन के लिए कोई पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी व्यवस्था नहीं थी. कई कंपनियों को बिना किसी बोली प्रक्रिया के बेहद कीमती प्राकृतिक संसाधन सौंप दिए गए.
कैग की रिपोर्ट ने मचा मचाया राजनीतिक भूचाल
साल 2012 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट सामने आई. इसमें कहा गया कि सरकार ने प्रतिस्पर्धी बोली के बजाय मनमाने तरीके से कोयला ब्लॉक आवंटित किए. रिपोर्ट का सबसे चर्चित हिस्सा संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान था. शुरुआती आकलन में यह आंकड़ा करीब 10 लाख करोड़ रुपये तक बताया गया. हालांकि बाद में अंतिम रिपोर्ट में कैग ने संभावित नुकसान का संशोधित अनुमान 1.86 लाख करोड़ रुपये रखा. यही आंकड़ा देशभर में कोलगेट के नाम से चर्चित हुआ और संसद से लेकर सड़क तक बड़ा राजनीतिक विवाद छिड़ गया.
सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के चर्चित कथित कोल ब्लॉक आवंटन मामले में पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज मामले को बंद कर दिया है. अदालत ने कहा कि सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने और उनके खिलाफ संज्ञान लेने का कोई ठोस आधार नहीं था. हालांकि इस फैसले ने एक बार फिर उस घोटाले की चर्चा छेड़ दी है, जिसे कभी देश का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला बताया गया था. शुरुआत में कैग ने अनुमान लगाया था कि कोयला ब्लॉकों के आवंटन में कथित अनियमितताओं से सरकारी खजाने को करीब 10 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. बाद में अंतिम रिपोर्ट में यह अनुमान घटाकर 1.86 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया. आखिर यह पूरा मामला क्या था, इसमें मनमोहन सिंह की भूमिका क्यों सवालों में आई और आज इसकी कानूनी स्थिति क्या है? आइए पूरी कहानी समझते हैं.
क्या था कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला उत्पादक देशों में शामिल है. बिजली उत्पादन से लेकर इस्पात और सीमेंट उद्योग तक देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कोयले पर निर्भर है. ऐसे में कोयला खदानों का आवंटन हमेशा से बेहद अहम विषय रहा है. 1993 से लेकर 2010 तक केंद्र सरकार निजी और सरकारी कंपनियों को कोयला ब्लॉक आवंटित करती रही. उस समय आवंटन की प्रक्रिया नीलामी के बजाय स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों के आधार पर होती थी. सरकार का तर्क था कि इससे कोयला उत्पादन तेजी से बढ़ेगा और उद्योगों को ईंधन मिलेगा. लेकिन, बाद में इसी प्रक्रिया पर सवाल उठे. आरोप लगा कि जिन कंपनियों को ब्लॉक दिए गए, उनके चयन के लिए कोई पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी व्यवस्था नहीं थी. कई कंपनियों को बिना किसी बोली प्रक्रिया के बेहद कीमती प्राकृतिक संसाधन सौंप दिए गए.
कैग की रिपोर्ट ने मचा मचाया राजनीतिक भूचाल
साल 2012 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट सामने आई. इसमें कहा गया कि सरकार ने प्रतिस्पर्धी बोली के बजाय मनमाने तरीके से कोयला ब्लॉक आवंटित किए. रिपोर्ट का सबसे चर्चित हिस्सा संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान था. शुरुआती आकलन में यह आंकड़ा करीब 10 लाख करोड़ रुपये तक बताया गया. हालांकि बाद में अंतिम रिपोर्ट में कैग ने संभावित नुकसान का संशोधित अनुमान 1.86 लाख करोड़ रुपये रखा. यही आंकड़ा देशभर में कोलगेट के नाम से चर्चित हुआ और संसद से लेकर सड़क तक बड़ा राजनीतिक विवाद छिड़ गया.







