एक ऐसे समय में, जब यह सवाल मजबूती से और कुछ हंसी उड़ाने वाले अंदाज में पूछा जाता है कि क्या ‘इंडिया’ नाम का गठबंधन जिंदा भी है, तब सोमवार को इंडिया ब्लॉक की बैठक दिल्ली में हुई। इस बैठक में लगभग 25 दलों ने हिस्सा लिया। हालांकि, इसमें कोई क्रांतिकारी पहल नहीं हुई, लेकिन यह समझ बनी कि साथ मिलकर लड़ना होगा, हर दो महीने में एक बार मिलेंगे। वोट चोरी पर सुप्रीम कोर्ट को साझी चिट्ठी लिखी जाएगी। साथ ही, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा गया। सबसे बड़ी बात यह है कि पांच बिंदुओं- संविधान की रक्षा, लोकतंत्र का बचाव, बेरोजगारी पर वार, महंगाई पर सरकार का घेराव और ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के विरोध पर सहमति बनाकर भविष्य के संघर्ष का खाका खींचा गया।
इसमें कोई दोराय नहीं है कि पहली बैठक के हिसाब से खाका सही खींचा गया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या गठबंधन इस लड़ाई को उसकी तार्किक परिणति तक ले जा पाएगा? यह प्रश्न अहम है, क्योंकि यह बैठक तब हुई है, जब ममता बनर्जी बंगाल के चुनाव में खेत रहीं और पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ चुका है। तृणमूल का विधायक दल टूट चुका है और संसदीय दल पर टूट के बादल सघनता से मंडरा रहे हैं। ये बादल कभी भी बरस सकते हैं। ऐसे में, ममता का इस बैठक के लिए आह्वान करना अपने को राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश भी है।
इंडिया ब्लॉक के लिहाज से कहें, तो ये घाव गहरे हैं, पर अच्छे हैं। कम से कम क्षेत्रीय दलों व नेताओं को यह अक्ल तो आई कि भाजपा और नरेंद्र मोदी का सामना ‘इगो’ से नहीं, मजबूत रणनीति बनाकर ही किया जा सकता है। अगर अहंकार से काम लिया गया, तो 2029 तक आधे क्षेत्रीय दल के नेता जेल में होंगे और बाकी भाजपा की गोद में बैठे मिलेंगेे। इंडिया ब्लॉक के लिए यह वक्त अपने अस्तित्व को बचाने का है।
साल 2024 के आम चुनाव के पहले जब नीतीश कुमार की पहल पर विपक्षी दल एकजुट हुए थे, तब भी विपक्ष से लोगों को कोई ज्यादा उम्मीद नहीं थी। गठबंधन बनने के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा विधानसभा के चुनाव में जीती थी। अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन हुआ था और ‘अबकी बार, चार सौ पार’ का नारा इतना जबरदस्त था कि कई पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे थे कि भाजपा को रोकना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। परिणाम सामने है। भाजपा 240 पर अटक गई। अखिल भारतीय स्तर पर विपक्ष की एकजुटता के प्रदर्शन ने भाजपा को बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंचने दिया।
लोकसभा चुनाव के बाद नजारा पूरी तरह से बदल गया। हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार, जहां विपक्षी दल यह मानकर चल रहे थे कि उनकी जीत होगी, वे हार गए। इसका सबसे बड़ा कारण था इंडिया ब्लॉक में एकजुटता का अभाव। आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के बाद ही गठबंधन से अलग होने का एलान कर दिया था। यह कहा जाने लगा कि गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए था। विपक्ष को यह समझ नहीं आया कि भाजपा वह पार्टी है, जिसे अपनी गलती सुधारने में महारत हासिल है।
इस पूरी लड़ाई में एसआईआर की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, पर विपक्षी नेताओं की ‘इगो’ इतनी बड़ी थी कि एसआईआर तो छोड़िए, किसी अन्य मुद्दे पर भी भाजपा को जिस मजबूती से घेरना था, वे नहीं घेर पाए। ममता बनर्जी ने इस गठबंधन और विपक्षी एकता को कमजोर करने का कोई भी मौका नहीं गंवाया। राहुल गांधी भी ममता के खिलाफ बोले और मौजूदा विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह से कांग्रेस ने द्रमुक का साथ छोड़कर विजय का हाथ पकड़ा, वह विपक्षी अवसरवादिता का ही उदाहरण है।
विपक्ष के वे सारे सूरमा, जिन्हें यह मुगालता था कि वे भाजपा को अपने बूते हरा सकते हैं, एक-एक कर अपना किला गंवा चुके हैं। ममता और स्टालिन ने न केवल सरकारें गंवाईं, बल्कि वे अपनी विधानसभा सीट भी हार बैठे। यही हाल केजरीवाल का रहा। वे भी दिल्ली हारे और अपनी सीट भी। अब पंजाब में सरकार बचाने में जुटे हैं। कांग्रेस असम हारी, लेकिन केरल जीतकर उसने अपनी इज्जत बचा ली। कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन और तमिलनाडु में त्वरित गति से फैसले करके उसने अपने भीतर बदलाव के संकेत दिए हैं। आज इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस का पलड़ा भारी है और क्षेत्रीय दल बचाव की मुद्रा में हैं।
कांग्रेस की चार राज्यों में सरकारें हैं, तो जम्मू-कश्मीर, झारखंड और तमिलनाडु में वह सत्ता पक्ष के साथ है। वहीं ममता, केजरीवाल अपनी सरकारें गंवा चुके हैं। उद्धव ठाकरे और शरद पवार अपनी बची-खुची पार्टी को बचाने में लगे हैं। लेफ्ट किसी भी राज्य में सरकार में नहीं है। उमर अब्दुल्ला और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं। उमर व महबूबा मुफ्ती के पास ज्यादा ताकत नहीं है। हेमंत सोरेन के बारे में रह-रहकर अफवाहें फैलती रहती हैं कि वह भाजपा से हाथ मिला सकते हैं। तेजस्वी यादव की भी राजनीतिक हालत खराब है। अखिलेश यादव अलबत्ता मजबूत स्थिति में दिखते हैं। लोकसभा में उनके 37 सांसद हैं, पर वह भी जानते हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव उनकी सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा है। उन्हें पता है, मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव राहुल गांधी की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में, कांग्रेस उनकी मजबूरी बन गई है।
साफ है, कांग्रेस को विपक्षी एकता की धुरी बनना होगा। उसे ही पहल करनी होगी। विपक्षी दलों में यह भरोसा पैदा करना होगा कि बड़ी पार्टी होने के बावजूद वह साथियों के लिए त्याग करने को तैयार है। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि विधानसभा चुनावों में भाजपा की धुंआधार जीत के बाद 2024 की तुलना में उनकी चुनौती कई गुना बढ़ गई है। ऐसे में, इंडिया ब्लॉक को एक आवाज में बात करनी होगी। एक-दूसरे पर टीका-टिप्पणी से बचना होगा। गठबंधन को संस्थागत रूप देना होगा और बेहतर भारत का नया सपना देश के सामने पेश करना होगा।
इंडिया ब्लॉक के लिए सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। अवसर है। देश में बेचैनी बढ़ रही है। ऐसे अनेक मुद्दे हैं, जिन पर सरकार कठघरे में है। ऐसे में, अगर विपक्ष एकजुट होकर काम करे, तो अपनी कमजोरियों के बावजूद वह लड़ाई लड़ सकता है। ऐसा तब होगा, जब वह खुद में सुधार करे और वातानुकूलित कमरे से निकलकर सड़क पर लड़ने-पिटने को तैयार हो।







