यह जगजाहिर है कि जब हिंदुत्व की राजनीति की बात आती है, तो तमिलनाडु इसके हाशिये पर खड़ा दिखता है, मगर भारतीय जनता पार्टी से के अन्नामलाई की रंगारंग विदाई ने इस प्रदेश की सियासत को एक नया रंग दे दिया है। पश्चिम बंगाल में विजयी झंडा लहराने के साथ भगवा पार्टी देश के 80 प्रतिशत हिस्से पर काबिज हो चुकी है, लेकिन तमिलनाडु में उसका ध्वज अब भी गर्दिश में है, क्योंकि पिछले पांच वर्षों में वह वहां केवल 0.35 प्रतिशत वोट ही बढ़ा पाई है।
पड़ोसी राज्य कर्नाटक में युवा आईपीएस अधिकारी के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले अन्नामलाई ने छह साल पहले राजनीति में प्रवेश किया और महज 37 साल की उम्र में भाजपा की तमिलनाडु इकाई के मुखिया बन गए। राज्य भाजपा में सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले सबसे कम उम्र के इस नेता को अपनी ही पार्टी के खुर्राट नेताओं से कड़ी चुनौती मिलने लगी। खुद को स्थापित करने के लिए बेसब्र के अन्नामलाई ने उन सभी को नाराज कर दिया। बड़े द्रविड़ नेताओं के खिलाफ जाने की हिमाकत के कारण वह मध्यवर्ग के युवाओं (खासकर उच्च जाति और प्रभुत्व वाली मध्यवर्ती जातियों) के प्रिय बन गए। वह डीएमके सरकार से भिड़ गए और प्रदेश की राजनीति में उन्होंने ऐसे-ऐसे मुहावरों और ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया, जो अब तक सुनी नहीं गई थी। हालांकि, उनकी भाषा चिर-परिचित हिंदुत्व वाली लाइन से भिन्न थी। अन्नामलाई ने खुले तौर पर सांप्रदायिक बयानबाजी से परहेज किया।
दूसरी तरफ, भाजपा उन राज्यों में अनुकूल रणनीति बनाने की कोशिश कर रही थी, जहां उसकी अपील कम है। अर्थात, एक शक्तिशाली क्षेत्रीय संगठन को अपने पाले में करके उस पर सवारी गांठना और धीरे से उसके समर्थन आधार को हड़प लेना। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र और बिहार को देखा जा सकता है। साल 2016 में जे जयललिता के निधन के बाद से ही भाजपा अन्नाद्रमुक पर कब्जा करने की कोशिश करती रही है, लेकिन यह योजना विफल हो गई, क्योंकि अन्नाद्रमुक के भीतर विभिन्न सामाजिक गठजोड़ अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े। इधर, द्रमुक ने कांग्रेस, वामदलों, दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ गठबंधन करके राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी। अन्नामलाई की द्रमुक विरोधी बयानबाजी द्रविड़ विरोधी मानी जाने लगी। चूंकि अन्नामलाई और पलानीसामी गौंडर समुदाय से ही हैं, इसलिए प्रतिस्पर्द्धा तीव्र हो गई। परिणामस्वरूप, साल 2024 के संसदीय चुनाव में अन्नाद्रमुक पार्टी एनडीए से बाहर हो गई। भाजपा को वोट में फायदा हुआ, पर कोई सीट नहीं मिली।
पिछले अनुभवों को देखते हुए इस बार गृह मंत्री अमित शाह ने खुद कमान संभाली और नए सिरे से एनडीए गठबंधन बनाया। उन्होंने अन्नामलाई को पार्टी के राज्य प्रमुख से हटाकर अन्नाद्रमुक के एक पूर्व नेता नयनार नागेंद्रन को राज्य प्रमुख बनाया। यह योजना भी नाकाम रही। पहली बार राजनीति में आए अभिनेता विजय जोसेफ ने ईसाइयों और दलितों का गठबंधन बनाकर सबको चौंका दिया। चुनाव के बाद कांग्रेस, वाम, वीसीके और आईयूएमएल ने उनका समर्थन कर दिया। राज्य की नई कैबिनेट में एक ईसाई मुख्यमंत्री, एक ईसाई वित्त मंत्री, आठ दलित और एक मुस्लिम मंत्री के साथ प्रभावशाली समुदायों के नेता शामिल हैं। 1967 के बाद पहली बार कैबिनेट में दो ब्राह्मण मंत्री भी हैं।
चुनाव परिणाम आने के बाद से भाजपा खामोश है, क्योंकि विजय ने जीत हासिल की और अन्नाद्रमुक विधायक दल में बड़ी फूट पड़ गई। ऐसे में, अन्नामलाई एक क्षेत्रीय पार्टी शुरू करने जा रहे हैं, जिसका मकसद टीवीके का विकल्प बनना होगा। यहां एक सवाल उठता है कि आखिर भाजपा ने अन्नामलाई को आसानी से पार्टी छोड़ने में मदद क्यों की? मुमकिन है कि भाजपा अपनी सीमाओं को समझ गई हो और उसने पीछे हटकर अपने नेता को मुख्य भूमिका में लाने का फैसला किया हो। तो क्या अन्नामलाई भाजपा के प्रॉक्सी (छद्म) के तौर पर काम करेंगे? अभी इस सवाल का कोई पक्का जवाब नहीं है, लेकिन तमिलनाडु की राजनीति निश्चित रूप से और दिलचस्प हो गई है।







