बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए राजद ने जब डॉ. सुनील कुमार सिंह को उम्मीदवार बनाया, तब इसे एक सामान्य राजनीतिक और रणनीतिक फैसला माना गया. लेकिन कुछ ही घंटों में यह निर्णय पार्टी और लालू परिवार के भीतर चर्चा का विषय बन गया. परिवार के भीतर से असहमति की आवाज सामने आईं, सोशल मीडिया पर नाराजगी दिखी, लेकिन इसके बावजूद उम्मीदवार नहीं बदला गया. यहीं से एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा हुआ कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम का असली संदेश क्या है?
दरअसल, चर्चा सिर्फ इस बात की नहीं है कि सुनील सिंह को टिकट क्यों मिला. राजनीतिक हलकों में इससे भी बड़ी चर्चा इस बात की है कि इस फैसले ने राजद के भीतर बदलते शक्ति संतुलन की ओर इशारा किया है. यही वजह है कि इस चुनाव से ज्यादा चर्चा उस संदेश की हो रही है, जो इस फैसले के जरिए गया है. क्या यह संकेत है कि अब पार्टी में राजनीतिक फैसलों का केंद्र पूरी तरह तेजस्वी यादव बन चुके हैं?
सुनील सिंह की उम्मीदवारी पर इतना शोर क्यों?
बता दें कि सुनील कुमार सिंह राजद के पुराने और भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं. वे लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े रहे हैं और लालू परिवार के करीबी माने जाते हैं. राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई के रूप में भी उनकी पहचान रही है. राजनीतिक संकट के कई मौकों पर वे पार्टी के लिए मुखरता से खड़े दिखे हैं. ऐसे नेता को टिकट मिलना सामान्य बात हो सकती थी, लेकिन मामला तब चर्चा में आ गया जब लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर की. उनके सोशल मीडिया पोस्ट को सीधे तौर पर इसी फैसले से जोड़कर देखा गया. इसके बाद पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा शुरू हो गई.
विरोध दिखा, लेकिन फैसला नहीं बदला
राजद की राजनीति में लंबे समय तक यह धारणा रही है कि परिवार की राय और लालू प्रसाद यादव की इच्छा का विशेष महत्व होता है. ऐसे में जब परिवार के भीतर से असहमति की झलक सामने आई तो राजनीति के जानकारों को भी लगा कि शायद फैसले पर पुनर्विचार की गुंजाइश हो. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उम्मीदवार वही रहे और नामंकन भी हो गया. खास बात यह कि पार्टी नेतृत्व की ओर से भी किसी तरह की नरमी नहीं दिखाई गई.

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क्या बदल चुका है राजद का शक्ति केंद्र?
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी सामने आया है. दरअसल, राजद की स्थापना से लेकर अब तक पार्टी का चेहरा और अंतिम निर्णय लेने वाला केंद्र लालू प्रसाद यादव को माना जाता रहा है. टिकट वितरण हो, संगठनात्मक नियुक्तियां हों या बड़े राजनीतिक फैसले, अंतिम मुहर लालू यादव की समझी जाती थी. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्थितियां बदली हैं. चुनावी अभियान से लेकर विधानसभा में विपक्ष की राजनीति तक, पार्टी का चेहरा तेजस्वी यादव बन चुके हैं.
तेज प्रताप और रोहिणी को क्या संदेश गया?
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि बीते वर्षों में संगठन के भीतर भी तेजस्वी यादव की भूमिका लगातार मजबूत हुई है. अब तो वह कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और खुद लालू यादव ने ही उन्हें अपनी विरासत सौंपी है. ऐसे में सुनील सिंह की उम्मीदवारी को इसी बदलाव की एक और कड़ी कहा जा सकता है. इस फैसले का एक संदेश परिवार के भीतर भी देखा जा रहा है. रोहिणी आचार्य की सार्वजनिक नाराजगी और बदली राजनीतिक और पारिवारिक परिस्थितियों में तेज प्रताप यादव की सीमित भूमिका के बीच लिया गया यह निर्णय बताता है कि राजनीतिक फैसले अब पारिवारिक पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं चलेंगे. अशोक कुमार शर्मा का मानना है कि इस घटनाक्रम ने परिवार के अन्य सदस्यों को भी यह संदेश दिया है कि संगठनात्मक निर्णयों में अंतिम अधिकार किसके पास है.

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राजपूत राजनीति का भी जुड़ा है समीकरण
वहीं, अशोक कुमार शर्मा इस फैसले के पीछे एक चुनावी पहलू भी देखते हैं. दरअसल, भाजपा ने पवन सिंह जैसे चर्चित सवर्ण (राजपूत) चेहरे को विधान परिषद भेजने का फैसला किया है. ऐसे में राजद के सामने भी इस समाज को संदेश देने की चुनौती थी. सुनील सिंह राजपूत समुदाय से आते हैं और लंबे समय से पार्टी में सक्रिय हैं. इसलिए उनकी उम्मीदवारी को राजपूत समाज तक पहुंच बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है. इससे राजद ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी केवल अपने पारंपरिक सामाजिक आधार तक सीमित नहीं रहना चाहती.
सबसे बड़ा संदेश क्या है?
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि सुनील सिंह की उम्मीदवारी से कई संदेश निकले हैं. पुराने और भरोसेमंद नेताओं को सम्मान देने का संदेश, राजपूत समाज को साधने का संदेश और संगठनात्मक अनुशासन का संदेश. लेकिन इन सबके बीच जो संदेश सबसे ज्यादा चर्चा में है, वह राजद के भीतर नेतृत्व को लेकर है. यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक गलियारों में इसे उस खास संकेत के तौर पर पढ़ा जा रहा है, जिसमें यह धारणा और मजबूत हुई है कि राजद में अब राजनीतिक फैसलों की धुरी तेजस्वी यादव हैं.







