एक कहावत है एक मयान में दो तलवार नहीं रखे जाते। बिहार की सियासी राजनीति में इन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उपेंद्र कुशवाहा की भी स्थिति कुछ इस प्रकार ही बनती दिख रही है। एक तरफ जहां सम्राट चौधरी की स्वीकार्यता दलीय चेतना से ऊपर उठ कर है, वहीं दूसरी ओर उपेंद्र कुशवाहा अपने ही दल में पूरी तरह स्वीकार्य होते नहीं दिख रहे हैं। जदयू/भाजपा को आज दीपक प्रकाश (कुशवाहा के मंत्री बेटे) की स्थितियों के बरक्स खड़ा किया जा रहा है। मगर, लोग भूल रहे है कि एनडीए नेतृत्व ने क्या कुछ कम मौके नहीं दिए। जानिए स्थितियां कैसे उपेंद्र कुशवाहा के विपरीत बनते गई।
उपेंद्र कुशवाहा कई बार हो चुके हैं एक्सपोज
पिछले कुछ वर्षों में उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति का आकलन करें तो एनडीए गठबंधन उनके लिए संजीवनी साबित हुई है। हाल के दिनों में जब अलग हुए तो सीधे बोल्ड आउट ही हुए हैं।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी- RLSP) ने एनडीए से अलग होकर अपनी ताकत को आजमाया।
महागठबंधन के साथ हाथ मिलाकर 2019 लोकसभा चुनाव में भी उतरे, बिहार में 5 सीटों पर चुनाव लड़े थे। इस चुनाव में उनकी पार्टी ने जिन 5 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, उनमें काराकाट, उजियारपुर, जमुई, जहानाबाद, पूर्वी चंपारण शामिल रहे। मगर, सभी सीटों पर रालोसपा के उम्मीदवारों की हार हुई। खुद उपेंद्र कुशवाहा काराकाट और उजियारपुर से लड़े और दोनों ही सीट हार गए।
साल 2020 विधानसभा की ही बात करें तो बसपा और एआईएमआईएम के साथ उपेंद्र कुशवाहा ने मोर्चा बनाया। लेकिन एक भी विधानसभा की सीट नहीं जीत सके।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार की काराकाट लोकसभा सीट से एनडीए की टिकट पर भाग्य आजमाया मगर वे भी चुनाव हार गए। हद तो तब हो गई कि वे तीसरे स्थान पर रहे थे।
बगावती तेवर वाले उपेंद्र कुशवाहा को क्या मिला?
बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को 2007 में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया। फिर भी, जेडीयू से बगावत की। उन्हें जेडीयू ने पार्टी से निकाल दिया। उसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी राष्ट्रीय समता पार्टी बनाई। 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने फिर पलटी मारी। नीतीश कुमार के साथ सट गए। इसका फायदा ये हुआ कि नीतीश ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया।
2013 में कुशवाहा ने नीतीश को झटका देने के लिए पार्टी छोड़ दी। इस बार उन्होंने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाई। 2014 में उन्होंने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लोकसभा में 4 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 3 सीटें जीत कर मोदी कैबिनेट में मंत्री बने। 2018 में उन्होंने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। वो राजद-कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन का हिस्सा बन गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कुशवाहा ने महागठबंधन का साथ भी छोड़ दिया।
रालोसपा की पराजय के बाद उपेंद्र कुशवाहा नए ठिकाने की तलाश में भटकते रहे। आखिरकार नीतीश कुमार से दोबारा हाथ मिलाने में उन्हें कामयाबी मिल गई। जेडीयू में उन्होंने अपनी पार्थिव रालोसपा का विलय कर दिया। नीतीश ने भी उन्हें जेडीयू पार्लियामंट्री बोर्ड का प्रमुख बना दिया। उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश कुमार ने विधान परिषद में भी जगह दी।
मगर, कहा जाता है कि मंत्री नहीं बनाया तो जदयू छोड़ दी और राष्ट्रीय लोक मोर्चा बना ली। बाद में लोकसभा चुनाव 2024 में मिली हार के बाबजूद बीजेपी ने राज्यसभा भेजा। उसके बाद जब दीपक प्रकाश को एमएलसी नहीं बनाया तो उपेंद्र कुशवाहा ने बगावती तेवर दिखाते कई बयान दे डाले हैं।
कुशवाहा के पार्टी के भीतर भी असंतोष
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने 4 सीटें जीती थीं। कुल 6 सीटों पर चुनाव लड़ा गया था, जिनमें उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी सासाराम से लड़ी और जीतीं।
मगर, जैसे ही उन्होंने मंत्री पद के लिए अपने बेटे दीपक प्रकाश का नाम लिया। पार्टी के भीतर बगावत शुरू हो गई। बीजेपी के रणनीतिकारों ने किसी तरह से बागी विधायकों को संभाला और उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति को ठीक भी किया।
टेस्टेड हो गए उपेंद्र कुशवाहा
उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए से मिलता ही रहा। मगर, वे कभी संतुष्ट नहीं रहे। नीतीश कुमार से नाराज हो-हो कर कितनी बार अपनी राजनीति को आजमाया, मगर असफल रहे। फिर भी नीतीश कुमार ने बार-बार उन्हें सम्मान दिया। इस सम्मान को उपेंद्र कुशवाहा ने ये मान लिया कि एनडीए की जरूरत हैं।
लेकिन, सम्राट चौधरी के एनडीए में आने के बाद कुशवाहा का एक बड़ा वर्ग जुड़ता चला गया और उपेंद्र कुशवाहा की जरूरत भी कमतर होती गई। सम्राट चौधरी परफॉर्मर साबित होते गए और उपेंद्र कुशवाहा का ग्राफ गिरता गया। बावजूद, बीजेपी की तरफ से सम्मान में कोई कमी नहीं। लेकिन, असंतुष्ट होना उनके स्वभाव में है। ये दीगर की बीजेपी अब सम्राट चौधरी के रहते उस तरफ ध्यान ही नहीं दे रही है।







