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बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना………………

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June 1, 2026
in खास खबर, ब्लॉग, शिक्षा
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बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना………………
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एक ऐसे वक्त में, जब भारत सहित तमाम देशों में बच्चों पर सोशल मीडिया के बढ़ते दुष्प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग द्वारा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को किशोरों के लिए सुरक्षित बनाने संबंधी ‘मार्गदर्शिका’ जारी करना खासा महत्वपूर्ण रखता है। ‘बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना’ शीर्षक से ये दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जो इसलिए भी मायने रखते हैं, क्योंकि दुनिया भर में उम्र के आधार पर सोशल मीडिया पर प्रतिबंध बढ़ते जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में दिसंबर 2025 में ही 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पाबंदी लग चुकी है। इसके बाद यूनान, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, इंडोनेशिया और मलेशिया की संसद ने भी किशोरों के लिए कुछ इसी तरह के कदम उठाए हैं। यहां तक कि ब्रिटेन में भी अगले चंद हफ्तों में प्रतिबंधात्मक निर्देश अस्तित्व में आ सकते हैं। किंतु इस तरह के सख्त प्रतिबंध बच्चों को ऐसे चोर दरवाजे की ओर भी धकेल सकते हैं, जहां उनके लिए खतरे और अधिक हों। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के डिजाइन और संचालन के तरीकों को बदलने की वकालत कर रहा है, ताकि साइबर दुनिया में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा कहीं बेहतर ढंग से हो सके।

भारत भी इन सबसे गाफिल नहीं है। यहां भी बच्चों और किशोरों के रोजमर्रा के जीवन में सोशल मीडिया अच्छा-खासा दखल रखने लगा है। आंकड़े बताते हैं कि 40 करोड़ बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। कोरोना-काल के बाद से इसमें खासा वृद्धि हुई है और किशोर एक तरह से डिजिटल लत के शिकार हो गए हैं। नौ से 17 वर्ष के करीब 76 फीसदी बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल समय गुजारने के लिए करने लगे हैं। जाहिर है, यहां भी 16 साल से कम उम्र के किशारों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल की पाबंदी को लेकर बहस तेज है, खास तौर से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश या गोवा जैसे राज्यों में। यहां ऐसे किसी कदम की इसलिए भी पैरवी की जाती है, क्योंकि तमाम रिपोर्टें बताती हैं कि बच्चों का इंटरनेट या सोशल मीडिया पर समय बिताना उन्हें भावनात्मक रूप से कमजोर कर रहा है। यहां तक कि उनकी सोचने-समझने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटती जा रही है। इसलिए, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी साइबरबुलिंग और ऑनलाइन शोषण से जुड़ी सामग्रियों के संपर्क में बच्चों के आने के प्रति अपनी चिंताएं जता चुका है।

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साफ है, किसी मध्य-मार्ग की सख्त जरूरत है। इसकी दरकार इसलिए भी है, क्योंकि अब पठन-पाठन के लिए इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता के कारण बच्चों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से दूर रखना काफी मुश्किल है। ऑस्ट्रेलिया में ही एक तबका पाबंदियों की मुखालफत कर रहा है, क्योंकि उसके मुताबिक, उम्र सत्यापन तकनीक से बच्चों से जुड़ी निजता के खतरे बढ़ गए हैं, उनमें अकेलापन गहराने लगा है और वे अधिक जोखिम वाले ‘डार्क नेट’ की ओर बढ़ने लगे हैं। इसके निराकरण के लिए ‘ऑटोप्ले’ या अनियमित ‘स्क्रॉलिंग’ पर पाबंदी लगाने या सोशल मीडिया के रोजाना इस्तेमाल की सीमाएं तय करने जैसे उपाय सुझाए जा रहे हैं, जिनका विश्लेषण अभी शेष है। भारत समग्रता में विश्वास करता है और संतुलन को सफलता की कुंजी मानता है। कामना करनी चाहिए कि यहां भी किसी संतुलित राह की तलाश पूरी हो जाए, जो सोशल मीडिया के नकारात्मक असर से बच्चों को बचा सके।

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