पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद जो कुछ हो रहा है, उसके गहरे अर्थ हैं। सत्ता से जैसे ही तृणमूल कांग्रेस बेदखल हुई, उसके नेताओं को जहां-तहां लोग आड़े हाथ लेने लगे। यह तृणमूल नेताओं के प्रति लोगों का दबा हुआ असंतोष और आक्रोश है, जो अब सामने आ रहा है। वास्तव में, लोग अब राहत का अनुभव कर रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि इस चुनाव में एक ऐसे शासन की विदाई हुई है, जो उनकी हितैषी कतई नहीं थी। कहने का अर्थ यह है कि तृणमूल नेता अपनी कथनी का फल भोग रहे हैं। हालांकि, हिंसा को किसी भी स्थिति में जायज नहीं कहा जा सकता, लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि आखिर लोग नाराज क्यों हैं? आखिर क्यों वे नेताओं से हाथापाई कर रहे हैं? बेहतर यही होगा कि तृणमूल के नेतागण अपने गिरेबां में झांके और जनता का भरोसा फिर से जीतने का प्रयास करें। इसके लिए उन्हें एक अच्छे विपक्ष की भूमिका निभानी होगी। यह नहीं कि सरकार के हर कदम का विरोध ही किया जाए, बल्कि सच्चे विपक्ष की तरह तृणमूल सत्ता के गलत कदमों का विरोध करे और उसे जनहितकारी कामों को करने के लिए बाध्य करे। इसी से लोग फिर से उस पर भरोसा कर सकेंगे और उसके नेताओं के साथ जिस तरह की हाथापाई हो रही है, वह रुक सकेगी। एक आदर्श विपक्ष की भूमिका ही तृणमूल को जनता की नाराजगी से बचा सकती है। इसके लिए पार्टी खुद को जितनी जल्दी तैयार कर ले, उसके लिए उतना बेहतर होगा।
पश्चिम बंगाल शक्ति की पूजा करने वाला समाज है और मुंह तोड़ जवाब देना अच्छी तरह जानता है। लगता है, तृणमूल नेतागण इस सूबे का मूल चरित्र ही भूल गए थे, इसलिए उन्होंने जनता पर एक तरह से जुल्म ढाए। अब जनता अपने ऊपर किए गए जुल्मों का बदला ले रही है। तृणमूल नेताओं के साथ मारपीट को ‘लोकतांत्रिक आदर्शों’ से न जोड़ें। यह वास्तव में लोगों की नाराजगी है, जो तृणमूल सरकार के दमनकारी शासन के खिलाफ उभरी है। हिसाब चुकाने में माहिर बांग्ला समाज तृणमूल का पुराना हिसाब ही चुकता कर रहा है, इसलिए पश्चिम बंगाल को गलत न समझें, बल्कि उसने गलत को सही करने का एक तरीका ईजाद कर लिया है। अब तृणमूल नेतागण समझ सकेंगे कि जनता के दमन का क्या नतीजा होता है। जब रावण का अहंकार भी खत्म हो गया, तो फिर तृणमूल नेताओं का कैसे बचता? हालांकि, हिंसा अब बंद हो जानी चाहिए, क्योंकि अहंकारियों को उचित सबक मिल गया है।
पश्चिम बंगाल का घटनाक्रम निंदनीय है। इस तरह की घटनाएं जंगलराज का संकेत देती हैं। यह माना गया था कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद बदलाव की बयार बहने लगेगी। किंतु ऐसा नहीं हो रहा। उल्टे, तृणमूल नेताओं के साथ मारपीट की जा रही है। अगर आपको किसी पार्टी से नाराजगी है, तो विचारों से विरोध जताइए, न कि लाठी-डंडों से। सभ्य समाज हिंसा को कभी स्वीकार नहीं करता। कुछ ही असामाजिक तत्व हैं, जो पश्चिम बंगाल की छवि खराब कर रहे हैं। ऐसे तत्वों पर राज्य सरकार को तुरंत लगाम लगाना चाहिए, अन्यथा ऐसी घटनाएं राज्य की छवि को नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिनसे विकास के कार्य भी प्रभावित हो सकते हैं।







