सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की एक आहत करने वाली टिप्पणी की प्रतिक्रिया से उपजी काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संसद मार्च के समय दिल्ली में जिस तरह हंगामा और हिंसा हुई, उसकी आशंका पहले से ही थी, क्योंकि इस कथित राजनीतिक दल का धरना-प्रदर्शन पूरी तरह दिशाहीन था। सच तो यह है कि इस समूह का गठन ही हास-परिहास का परिणाम था। उसे खुद के एक राजनीतिक ताकत बन जाने का भ्रम इसलिए हो गया, क्योंकि इंटरनेट मीडिया पर उसके करोड़ों फालोअर्स हो गए थे। इस भ्रम ने ही एक दिशाहीन आंदोलन की नींव रखी। सीजेपी इसका उदाहरण है कि आनलाइन प्रसिद्धि धरातल पर कोई असर नहीं दिखाती।
सीजेपी का धरना-प्रदर्शन न केवल मोदी सरकार के हर किस्म के विरोधियों और खासकर आंदोलनजीवियों का आसान मंच बन गया था, बल्कि हर कोई उसे अपनी तरह से भुनाने में लगा हुआ था। विपक्षी दलों ने भी उसके मंच का उपयोग बहती गंगा में हाथ धोने वाले अंदाज में ही किया। यह किसी से छिपा नहीं कि उसके मंच से किस तरह नीट पेपर लीक के साथ देश-दुनिया के अनगिनत मसलों को उठाया जा रहा था। सीजेपी का आयोजन विश्वसनीयता इसलिए नहीं हासिल कर पाया, क्योंकि इस समूह के जो कर्ता-धर्ता इसके लिए व्यग्र दिख रहे थे कि उनके साथ आ गए लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अपनी जान जोखिम में डालकर भी भूख हड़ताल जारी रखें, वे स्वयं अनशन करने और यहां तक कि धरना स्थल पर निरंतर उपस्थित रहने के लिए भी तैयार नहीं थे।
सीजेपी के संसद मार्च में भीड़ इसलिए जुट गई, क्योंकि उच्च न्यायालय के आदेश पर सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था, लेकिन यह भीड़ इसलिए पूरी तरह अनियंत्रित थी, क्योंकि कोई भी उसे दिशा देने वाला नहीं था। क्या यह विचित्र नहीं कि जब सीजेपी नेता अपना अनशन खत्म करने की घोषणा कर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात करने की तैयारी कर रहे थे तो संसद मार्च में शामिल भीड़ संसद में घुसने की चेष्टा कर रही थी। आखिर इससे क्या हासिल होने वाला था? इस चेष्टा के बाद वह सब कुछ होना ही था, जो दिल्ली की सड़कों पर देखने को मिला।
इसे रोका जा सकता था, यदि सीजेपी नेता किसी सुविचारित रणनीति के तहत अपना धरना-प्रदर्शन कर रहे होते। उन्हें यह आभास होना चाहिए था कि उनका अपने समर्थकों पर कोई नियंत्रण नहीं। चूंकि संसद के प्रत्येक सत्र के पहले ऐसा कुछ होता है, जिससे विपक्ष को पहले ही दिन सदन में हंगामा करने का अवसर मिल जाता है, इसलिए सरकार को भी चाहिए था कि वह संसद मार्च के पहले ही सीजेपी के नेताओं से संवाद-संपर्क की पहल करती। आखिर जो बातचीत अब हुई, वह पहले क्यों नहीं हो सकती थी?







