बिहार छोड़ कर तो मैं गया नहीं हूं। जो लोग यहां विपक्ष की या दूसरे तरह की राजनीति कर रहे हैं, वो लोग यहां से गए होंगे घूमने। हम तो एक दिन भी नहीं जाते।’ दरअसल, बिहार की राजधानी पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव इस समय राज्य की सबसे चर्चित सियासी जंग बन चुका है। भाजपा के पूर्व विधायक और अब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने खुद मैदान में उतरकर मुकाबला बेहद दिलचस्प बना दिया है।
1995 से लगातार नौ बार भाजपा का कब्जा रही यह सीट पार्टी का अभेद्य किला मानी जाती है। हालांकि प्रशांत किशोर ने अपने हाई-टेक चुनाव प्रचार और बयानों से माहौल को गरमा दिया है, लेकिन बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक और मजबूत संगठन के बीच क्या पीके अपनी पहली चुनावी परीक्षा में कोई बड़ा उलटफेर कर पाएंगे?
भाजपा का 30 साल पुराना मजबूत किला
बांकीपुर विधानसभा सीट पर लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का दबदबा रहा है। 1995 के बाद से इस सीट पर कभी गैर-भाजपा उम्मीदवार नहीं जीत सका।
इस क्षेत्र में लगभग 65,000 कायस्थ मतदाता हैं, जिन्हें बीजेपी का पारंपरिक कोर वोट बैंक माना जाता है।
बिहार में मंत्री रहे नितिन नवीन लगातार जीतते रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर पदोन्नति के बाद ही ये सीट खाली हुई है।
बांकीपुर सीट पर 30 जुलाई को मतदान है, 3 अगस्त को नतीजे सामने आएंगे, 20 से ज्यादा उम्मीदवार हैं।
पुराने संघ परिवार के युवा चेहरे पर भरोसा
भाजपा ने इस उपचुनाव में अपनी रणनीति को बदलते हुए युवा उम्मीदवार पर दांव खेला है। शुरुआती दौर में अभिषेक बंटी का नाम चर्चा में आने के बाद पार्टी ने मंडल अध्यक्ष रहे नीरज कुमार सिन्हा को अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया। नीरज कुमार सिन्हा के चाचा पुराने जनसंघ से जुड़े रहे हैं, जिससे उनका परिवार पारंपरिक रूप से भाजपा की विचारधारा से जुड़ा हुआ है।
स्टार प्रचारकों की फौज से भाजपा की घेराबंदी
माहौल की बात करें तो प्रशांत किशोर अपने मीडिया बयानों और आक्रामक प्रचार शैली से छाए हुए हैं। लेकिन जमीन पर मुकाबला कड़ा करने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा ने 40 स्टार प्रचारकों की पूरी फौज मैदान में उतारी है। नितिन नवीन खुद हर वीकेंड पहुंचकर जनसंपर्क कर रहे हैं। जमीनी कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर एक्टिव किया गया। भाजपा नेताओं का दावा है कि उनका मुकाबला पीके से नहीं बल्कि आरजेडी से है, फिर भी संगठन कोई जोखिम नहीं उठा रहा है।
अगर हार भी गए तो देखा जाएगा। पत्रकारिता आप छोड़ नहीं रहे, तो हारने के बाद भी पूछने आ जाइएगा। विरोधी तो गालियां देते ही हैं, पर मैं बिहार में ही टिका हुआ हूं और आश्रम बनाकर यहीं काम करता रहूंगा।
प्रशांत किशोर
‘हार गए तो भी बिहार छोड़कर नहीं जाऊंगा’
चुनाव प्रचार के दौरान जब प्रशांत किशोर से हार की स्थिति को लेकर सवाल पूछे गए, तो उन्होंने बेहद सधे हुए और बेबाक अंदाज में जवाब दिया। उनका कहना था कि चुनावी नतीजे चाहे जो भी हों, वे बिहार छोड़कर कहीं नहीं जाने वाले हैं। ‘अगर हार भी गए तो देखा जाएगा। पत्रकारिता आप छोड़ नहीं रहे, तो हारने के बाद भी पूछने आ जाइएगा। विरोधी तो गालियां देते ही हैं, पर मैं बिहार में ही टिका हुआ हूं और आश्रम बनाकर यहीं काम करता रहूंगा।’
चुनावी डेब्यू में ही दांव पर लगी साख
ये उपचुनाव केवल एक विधायक चुनने का चुनाव नहीं, बल्कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक क्षमता का पहला बड़ा टेस्ट बन गया है। अगर बीजेपी अपने से कम उम्र के उम्मीदवार के जरिए प्रशांत किशोर को पटखनी दे देती है, तो यह जन सुराज के लिए बड़ा झटका होगा। वहीं दूसरी ओर, अगर पीके इस गढ़ में सेंध लगाते हैं, तो बिहार की राजनीति में एक नया समीकरण कायम हो जाएगा।







