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शुद्ध दूध की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती…………..

UB India News by UB India News
June 1, 2026
in कृषि, खास खबर, स्वास्थ
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शुद्ध दूध की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती…………..
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हर वर्ष 1 जून को पूरी दुनिया ‘विश्व दुग्ध दिवस’ मनाती है। इसका उद्देश्य लोगों को दूध के पोषण, महत्व, डेयरी उद्योग की उपयोगिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसके योगदान के प्रति जागरूक करना है। वर्ष 2026 की थीम ‘महिला किसानों का सम्मान’ रखी गई है, जो डेयरी क्षेत्र में महिलाओं के योगदान को पहचान देने का प्रयास है। वास्तव में, भारत सहित कई देशों में दुग्ध उत्पादन की रीढ़ ग्रामीण महिलाएं ही हैं, जो पशुपालन से लेकर दुग्ध संग्रह तक की जिम्मेदारी निभाती हैं।

दूध को सदियों से संपूर्ण आहार माना गया है। इसमें कई आवश्यक पोषक तत्व होते हैं, जो बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए लाभकारी माने जाते हैं। डॉक्टरों की मानें, तो दूध का नियमित सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। बावजूद इसके अपने देश में दुग्ध की शुद्धता एक बड़ा सवाल है, जबकि भारत की गिनती दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश में होती है। यहां लाखों परिवारों की आजीविका डेयरी व्यवसाय पर ही निर्भर है। देखा जाए, तो बढ़ती मांग और मुनाफे की होड़ ने दूध की शुद्धता पर सवाल खड़े किए हैं। आज बाजार में शुद्ध दूध मिलना कठिन होता जा रहा है। दूध में पानी, यूरिया, स्टार्च, डिटर्जेंट और सिंथेटिक रसायनों की मिलावट की खबरें सामने आती हैं। इस मिलावट से पेट, किडनी और लीवर संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं।

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आज आलम यह है कि दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ पशुपालक ऑक्सीटोसिन जैसे इंजेक्शन का उपयोग करते हैं। ऐसे दूध का लगातार सेवन हार्मोन असंतुलन, कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। पशुओं की उम्र और स्वास्थ्य पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ता है। इसलिए सरकार और प्रशासन को इस प्रकार के इंजेक्शनों के उपयोग पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए। हालांकि, शुद्ध दूध सुनिश्चित करने के लिए केवल सरकार नहीं, समाज को भी आगे आना होगा। उपभोक्ताओं को प्रमाणित डेयरी उत्पादों का उपयोग करना चाहिए और मिलावट की शिकायत मिलने पर संबंधित विभाग को तत्काल सूचना देनी चाहिए। गांवों में जैविक और प्राकृतिक पशुपालन को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। कहने का यही अर्थ है कि विश्व दुग्ध दिवस केवल दूध पीने का संदेश नहीं देता, बल्कि यह हमें शुद्धता, पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्व को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। यदि हम आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ बनाना चाहते हैं, तो शुद्ध दूध और ईमानदार दुग्ध उत्पादन पर हमें जोर देना ही होगा।

दुग्ध क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा भारत

आज पूरी दुनिया में विश्व दुग्ध दिवस का आयोजन हो रहा है। वर्ष 2001 से इसकी शुरुआत की गई है, ताकि दूध को वैश्विक खाद्य की मान्यता मिल सके। इसी मकसद के साथ हर वर्ष अलग-अलग थीम पर यह दिवस मनाया जाता है। इसका हमें खूब लाभ भी मिला है। स्थिति यह है कि भारत में मवेशियों की संख्या काफी बढ़ी है। आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में 30.37 करोड़ से अधिक मवेशी हैं, जिनमें गाय, भैंस, मिथुन और याक जैसे मवेशी शामिल हैं। ये तो डेयरी उत्पादन की रीढ़ बन गए हैं। दुग्ध उत्पादन के लिहाज से 7.42 करोड़ से अधिक भेड़ें व 14.88 करोड़ बकरियां भी महत्वपूर्ण है।

भारत में दूध उत्पादन में इसलिए भी बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि यहां मवेशियों की उत्पादकता बढ़ी है। 2014 और 2022 के बीच भारत में मवेशियों (गाय, भैंस आदि) की उत्पादकता (किलोग्राम प्रतिवर्ष) में 27 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई, जो चीन, जर्मनी और डेनमार्क से भी आगे, दुनिया में सबसे अधिक है। यह वृद्धि 13.97 प्रतिशत के वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है। जाहिर है, गोकुल मिशन जैसी योजनाओं के कारण मवेशियों की संख्या इतनी बढ़ी है। इस तरह की योजनाएं मवेशियों के प्रजनन, आनुवंशिक सुधार और नस्लों की उत्पादकता बढ़ाने में मददगार साबित हुई हैं। इसके अलावा, पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत, किसानों के दरवाजे पर ही पशुओं के इलाज के लिए पशु चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसके तहत टीकाकरण, छोटी-मोटी सर्जरी आदि भी की जाती है। देश में डेयरी क्षेत्र सुव्यवस्थित है। यहां के दुग्ध महासंघ, जिला सहकारी संघ, मार्केटिंग डेयरियां या दुग्ध उत्पादक संगठन मिलकर करीब सवा दो लाख गांवों को कवर करते हैं। इनसे पौने दो करोड़ से अधिक किसान जुड़े हुए हैं।

इस बार विश्व दुग्ध दिवस की थीम है- महिला किसानों का सम्मान और भारत के डेयरी क्षेत्र में स्त्रियों की भूमिका सशक्त है। डेयरी फार्मिंग में 70 फीसदी महिलाएं हैं और लगभग 35 सहकारी डेयरी सक्रिय हैं। पूरे देश में, 48 हजार से अधिक महिला नेतृत्व वाली दुग्ध सहकारी समितियां गांव स्तर पर काम कर रही हैं, जिनसे ग्रामीण समुदायों का न सिर्फ समावेशी विकास हो रहा है, बल्कि उनमें सशक्त होने की भावना जगने लगी है। साफ है, भारत में जिस तरह से दूध का उत्पादन बढ़ रहा है, वह दिन दूर नहीं, जब भारत को फिर से ‘दूध की नदियों वाला देश’ कहा जाएगा।

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