जनवरी में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन की राजकीय यात्रा की तारीखें तय हुई थीं, जो मार्च की थीं, तब वह खुद को दुनिया का शहंशाह समझ रहे थे। यूं भी, अपनी शेखी बघारना उन्हें खूब पसंद है, यहां तक कि वह खुद को चमत्कारी इंसान समझते हैं, जो प्रभु यीशु की तरह बीमारों को ठीक कर सकता है। बहरहाल, फरवरी में उन्हें लग रहा था कि बीजिंग में उन्हें बड़ी जीत मिलेगी, क्योंकि उनकी एक जेब में वेनेजुएला है और दूसरी में ईरान। ट्रंप के लिए युद्ध ‘स्थायी शांति’ हासिल करने का जरिया था। वह सोचते थे- बमबारी से ईरान का नेतृत्व खत्म हो जाएगा और ईरानी लोग अमेरिकी संरक्षण में लोकतंत्र की मांग करते हुए बगावत कर देंगे। सबसे अहम बात- तेल की कीमतें इतनी गिर जाएंगी कि हर अमेरिकी खुशी से झूम उठेगा।
अफसोस! अमेरिकी सदर को कोई यह बताना भूल गया कि जंग की एक सबसे खतरनाक बात है, उसकी अनिश्चितता। बीजिंग पहुंचने से पहले ही ट्रंप चीन के आगे गिड़गिड़ाना शुरू कर चुके थे और ईरान युद्ध को रोकने के लिए उससे मदद की गुहार लगा रहे थे। उधर, मेजबान राष्ट्रपति शी जिनपिंग ताइवान पर अपना पुराना रुख दोहराते रहे। हमेशा की तरह बदली परिस्थितियों को स्वीकार करने में असमर्थ ट्रंप ने बीजिंग रवाना होने से पहले कहा- उन्हें ईरान के मामले में चीनी मदद की कोई दरकार नहीं है। हालांकि, उनके विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने अधिक साफगोई बरती। उन्होंने कहा, युद्ध खत्म करवाने में चीन को हमारी मदद करनी चाहिए। नतीजतन, ट्रंप ने फिर अपना बयान बदला और कहा- चीन शायद अधिक ‘सक्रिय’ होना चाहता है।
जाहिर है, फरवरी की खुशफहमी मई आते-आते निराशा में तब्दील हो चुकी है। शिखर सम्मेलन में चीन ने सहमति जताते हुए अपनी शर्तें रखीं। अमेरिका और चीन, दोनों इस बात पर राजी हुए कि होर्मुज जलमार्ग का सैन्यीकरण नहीं होना चाहिए और इसको सबके लिए खुला होना चाहिए, मगर चीन-अमेरिका साझा बयान में ईरान के यूरेनियम भंडार का कोई जिक्र नहीं है, जिसका मतलब है कि वे मानते हैं, तेहरान से बातचीत के बिना इस मसले का हल नहीं हो सकता।
चीनी राष्ट्रपति ने ताइवान को लेकर अमेरिका पर सीधा हमला बोला और दोटूक कहा कि ताइवान के मुद्दे पर वाशिंगटन यदि बीजिंग से सहमत नहीं हुआ, तो ‘दोनों देशों के बीच टकराव, यहां तक कि संघर्ष हो सकते हैं, जिससे पूरा रिश्ता गंभीर खतरे में पड़ जाए’। कूटनीतिक जुबान में इससे साफ कुछ और नहीं कहा जा सकता। यह चीन द्वारा भारत को मानो यह कहने के बराबर है कि अगर नई दिल्ली हिमालयी सीमा की चीनी परिभाषा नहीं मानती, तो झड़पें होंगी और रिश्ता पूरी तरह खत्म हो जाएगा। मुमकिन है, ईरान में अमेरिका की हालत देखकर शी जिनपिंग को यह लगा हो कि उन्हें स्थिति स्पष्ट कर देनी चाहिए।
हालांकि, ट्रंप के साथ अभी और बुरा होना बाकी था। चीन ने अमेरिका को ‘कमजोर होती ताकत’ बताकर ट्रंप को अपमानित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया ट्रुथ की अपनी पोस्ट में इसकी पुष्टि की है और लिखा है, चीन ने ‘शालीनता से अमेरिका को शायद एक कमजोर होती महाशक्ति’ बताया है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि यह टिप्पणी बाइडन शासन के समय के अमेरिका के लिए की गई थी, उनके (ट्रंप के) दौर के लिए नहीं। उन्होंने आगे यह भी लिखा- लेकिन अब अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। हालांकि, ट्रंप प्रशासन के लोग ही शायद ट्रंप की इस बात से सहमत होंगे।
ईरान पर ट्रंप के हमले का सबसे अनपेक्षित नतीजा यह निकला है कि सैन्य अभियान में साझेदार रहे इजरायल को सभी शांति-वार्ता से बाहर कर दिया गया है, चाहे वह वार्ता पाकिस्तान में हुई हो या फिर अब बीजिंग की ओर रुख करती दिख रही हो। बेंजामिन नेतन्याहू शायद राष्ट्रपति ट्रंप को यह विश्वास दिलाने की सार्वजनिक कीमत चुका रहे हैं कि सैन्य कार्रवाई केे जरिये तेहरान को शिकस्त देना बहुत मुश्किल नहीं। जबकि, यह साफ हो चुका है कि ईरान की क्षमताओं का सटीक आकलन करने में तेल अवीव और वाशिंगटन, दोनों बुरी तरह मात खा गए। इजरायली प्रधानमंत्री के उस इंटरव्यू से मुझे घोर आश्चर्य हुआ था, जिसमें उन्होंने यह कहा कि उन्हें इस बात का दूर-दूर तक अंदेशा न था कि ईरान अपनी युद्ध-रणनीति में होर्मुज जलमार्ग का भी इस्तेमाल कर सकता है। इस लापरवाही की भारी कीमत दुनिया को चुकानी पड़ी है और इसका असर वैश्विक स्तर पर अमेरिका की छवि पर पड़ रहा है।
शिखर बैठक में चीनी सदर मुस्कराते रहे और उन्होंने इशारों-इशारों में यह बता दिया कि बदले समीकरण में चीन एक महाशक्ति बन गया है। सम्मेलन को कवर करने वाले यूरोपीय पत्रकारों ने बताया है कि राजकीय भोज के समय अपने भाषण में ट्रंप ‘विनम्र’ दिखे और उन्होंने मंदारिन में रूबियो के नाम की स्पेलिंग यूं बदल दी, जिसका अर्थ ‘मूर्ख’ या ‘लापरवाह’ होता है। बेशक इस भोज में राष्ट्रपति ट्रंप का पसंदीदा चीनी व्यंजन परोसा गया था, लेकिन फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों ने निश्चय ही इस बात पर गौर किया होगा कि बीजिंग में ट्रंप की भाषा कितनी नरम पड़ गई है, जबकि बैठकों के दौरान उन्हें व्यक्तिगत कटाक्ष और अपमान भी सहना पड़ा है।
रही बात दिल्ली की, तो हाथी दिलचस्पी से यह देख रहा है कि पुनर्जीवित ड्रैगन किस तरह सकुचाते अमेरिकी ईगल से बातचीत कर रहा है। चीनी राष्ट्रपति ने बेहद शांत भाव से कहा है कि वाशिंगटन ताइवान पर चीन के रुख को यदि नहीं मानता है, तो टकराव या संघर्ष हो सकते हैं। हालांकि, वहां कोई तात्कालिक खतरा नहीं है, मगर तनाव के अन्य मुद्दों के साथ जुड़कर यह संघर्ष की वजह बन सकता है।
इससे अधिक चिंताजनक बात यह है कि दोनों देश दुनिया के कुछ हिस्सों को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांटने की कोशिश कर सकते हैं, क्योंकि अमेरिका जिस तरह से चीन के हितों का पोषण कर रहा है, उससे महाशक्ति बनने का उसका रास्ता साफ होता है। हालांकि, शी जिनपिंग ने साफ कर दिया है कि बीजिंग पहले से ही खुद को महाशक्ति मानता है। बहरहाल, अमेरिका और चीन ने भले इस बात का जिक्र नहीं किया हाे, लेकिन एक नई दो-ध्रुवीय दुनिया में चीन अब रूस की जगह ले चुका है। लिहाजा, भारत को अपने विकल्पों का सावधानीपूर्वक और तार्किक आकलन करना होगा।







