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भाजपा बंगाल-बिहार में यूपी-एमपी की तरह अपनी जमीन क्यों नहीं मजबूत कर पाई?

UB India News by UB India News
January 22, 2026
in पटना, बिहार
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बिहार और बंगाल, भाजपा के लिए कठिन राज्य रहे हैं। 45 साल में अब जाकर भाजपा बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनी है। अकेले सत्ता पाने का लक्ष्य अभी मुश्किल दिखता है। पश्चिम बंगाल में तो भाजपा के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा है। खूब मेहनत की तो 40 साल बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन पाई। पश्चिम बंगाल में तो अकेले सत्ता पाने का लक्ष्य और भी मुश्किल दिखता है। आखिर भाजपा इन दो राज्यों में क्यों नहीं उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश की तरह अपनी जमीन मजबूत कर पाई?

बिहार: जातिवाद की लहर में हिंदुत्व खड़ा नहीं हो पाया

भाजपा का मूल आधार हिंदुत्व है। लेकिन बिहार में हिंदुत्व की भावना को इसलिए उभार नहीं मिल पाया क्यों कि यहां समाज जातियों में बंटा हुआ है। बिहार में जातीय भावना के सामने हिंदुत्व की भावना गौण हो गई। जाति आधारित नेता उभरने लगे। समाज में उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। यहां तक कि राममनोहर लोहिया की समाजवादी पार्टी भी बिहार में इसलिए मजबूत हुई कि क्योंकि इसे पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग का भरपूर समर्थन हासिल था। कर्पूरी ठाकुर का जनननायक की प्रतिष्ठा मिली। लोहिया ने नारा दिया था,पिछड़ा पावे में सौ में साठ। इस दौर में हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करने वाला जनसंघ 20 से 30 सीटों के बीच सिमटा रहा। उस दौर में कांग्रेस सबसे पार्टी थी।

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समाजवादी दलों ने जातीय आधार पर पैठ बनाई

1967 में कांग्रेस का विकल्प बन कर उभरे समाजवादी जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। जो जाति उसकी ताकत थी वही उसकी कमजोरी बन गई। सत्ता का लालच और जातीय गुटबाजी के कारण समाजवादी दल टूट-फूट कर हाशिये पर चले गये। इस मौके का फायदा कांग्रेस ने उठाया क्योंकि उसके पास इंदिरा गांधी जैसी करिश्माई नेता थीं। जाति की राजनीति कुछ कमजोर तो हुई लेकिन इसका फायदा जनसंघ को नहीं मिल सका। 1972 के चुनाव में जनसंघ को सिर्फ 25 सीटें ही मिलीं। कांग्रेस ने 5 साल बाद पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाई।

नीतीश का साथ मिला तब भाजपा पैर जमा पाई

1980 में भाजपा बनी। लेकिन शुरू में इसका प्रभाव बिल्कुल नहीं था। उस समय धर्म और हिंदुत्व की राजनीति में बिहार में जम नहीं पाई। 1980 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल 21 सीटें मिलीं थीं। भाजपा की किस्मत तब बदली जब उसका नीतीश कुमार से चुनावी गठबंधन हुआ। नीतीश के साथ चलने के लिए भाजपा ने कट्टर हिंदुत्व से समझौता कर लिया और बीच का रास्ता अपनाया। नीतीश भाजपा के लिए जरूरी हो गये इसलिए वह अपने मूल एजेंडे (धार्मिक ध्रुवीकरण) को कभी लागू नहीं कर पाई।

बंगाली ने की जनसंघ की स्थापना लेकिन बंगाल में बेअसर

जनसंघ की स्थापना का श्रेय पश्चिम बंगाल के श्यामा प्रसाद मुखर्जी को है। लेकिन इसके बाद भी जनसंघ अपने संस्थापक के राज्य में जड़ नहीं जमा सकी। इसकी वजह है पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक विशेषता। अंग्रेजों ने सबसे पहले कलकत्ता (कोलकाता) को अपनी राजधानी बनाया था। शिक्षा, व्यवसाय और इंफ्रास्ट्रक्चर का सबसे अधिक विकास पश्चिम बंगाल में ही हुआ। 1911 तक भारत की राजधानी कोलकाता थी। 1911 में भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट की गई। अंग्रेजी राज में ही बंगाल भारत का सबसे विकसित और शिक्षित राज्य बन गया था। बंगाल का शिक्षित समाज भद्रजन की अवधारणा के साथ आगे बढ़ा। देश के बंटवारे के समय बंगाल में बहुत मार-काट मची थी। इसके बाद वहां का समाज धार्मिक आधार पर विभाजित नहीं हुआ।

पहले कांग्रेस फिर वाम दल और अब तृणमूल

आजादी के समय पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का आधार था। कांग्रेस के बाद साम्यवादी दल ने मजबूत ढांचा बनाया। साम्यवादी दलों का पतन हुआ तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में दबदबा कायम किया। 2016 तक यह कहा जाने लगा था कि भाजपा अब शायद कभी पश्चिम बंगाल में पैर न जमा सके। लेकिन जब ममता बनर्जी पर तुष्टिकरण के आरोप लगने लगे तो यहां भाजपा को अपनी जमीन तैयार करने का मौका मिल गया।

2019 के बाद भाजपा में उभार लेकिन सत्ता बहुत दूर

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 42 में से 18 सीटें जीत कर पूरे देश को चौंका दिया। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें जीत कर एक बार फिर धमाका कर दिया। अब यह पश्चिम बंगाल में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन बहुमत के मैजिक फिगर (148) से बहुत दूर है। 4 महीने बाद पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इस बार भाजपा बहुमत पाने के इरादे से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।

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