बिहार चुनाव में महागठबंधन को करारी शिकस्त मिलने के बाद घटक दलों के बीच दरार दिखने लगे हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने यहां तक कह दिया है कि गठबंधन केवल चुनावी था. केवल चुनाव के लिए तमाम दल साथ में आए थे. अब कांग्रेस अपने स्तर से पार्टी को मजबूत करेगी. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस केवल चुनावी गठबंधन बनाने वाली पार्टी बन चुकी है.
कांग्रेस की शगल ‘मौसमी दोस्ती’, बिहार में हार के बाद लालटेन को बाय कहेगा हाथ!
पटना: 26 साल पहले आई बॉलीवुड फिल्म जानवर का गाना ‘मौसम की तरह तुम भी बदल तो ना जाओगे…’ बेहद चर्चित है. इन दिनों ना केवल बिहार बल्कि, पूरे देश में कांग्रेस की राजनीति में कुछ इसी तरह के रंग दिख रहे हैं. याद कीजिए करीब-करीब इस गाने के रिलीज के आस-पास ही साल 2000 में पहला मौका था जब कांग्रेस ने सहारा देकर बिहार में राबड़ी देवी की सरकार बनवाई थी. तब से 2009 और 2010 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस चाहे अनचाहे आरजेडी के साथ गठबंधन में है.
गौर करने वाली बात यह है कि कांग्रेस जब से आरजेडी के साथ गठबंधन में है तब से ये दोनों दल अपने बूते एक बार भी सम्मानजनक जीत दर्ज नहीं कर पाई है. 2015 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी और कांग्रेस दोनों ने शानदार प्रदर्शन किया था , लेकिन उस वक्त नीतीश कुमार की जेडीयू इनके साथ थी. हालत यह हो गई कि कभी आरजेडी तो कभी कांग्रेस एक दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ती रही है.
बिहार में आरजेडी से गठबंधन पर क्या बोले राजेश राम
अब 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए के सामने दुर्गति होने के बाद कांग्रेस ने गठबंधन को ही आगे बढ़ाने पर संशय बना दिया है. बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने साफ शब्दों में कहा- ‘बिहार में कांग्रेस जिन दलों के साथ है वह गठबंधन सिर्फ चुनावी है, सांगठनिक नहीं. सभी पार्टियां केवल चुनाव लड़ने के लिए साथ आई थीं. संगठन चलाना और पार्टी की रणनीति बनाना कांग्रेस खुद करेगी.’
राजेश राम ने आगे ये भी कहा कि कांग्रेस अंदरुनी समीक्षा कर रही है. हर स्तर पर फीडबैक लेकर आगे के कदम उठाए जाएंगे. पटना कांग्रेस कार्यालय सदाकत आश्रम में जिला अध्यक्षों की बैठक हुई. इसमें शामिल हुए लोगों के बीच केवल बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर ही बातें हुई. तय हुआ कि पार्टी जमीनी स्तर पर खुद को मजबूत करने के लिए कदम उठाएगी.
तो क्या महागठबंधन है ‘मौसमी गठबंधन’?
यह पहला मौका नहीं है जब महागठबंधन के घटक दलों ने मौसमी गठबंधन की बात कही है. महज सालभर पहले ही 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी बिहार में कांग्रेस-आरजेडी गठजोड़ खास प्रदर्शन नहीं कर पाया था. इसके बाद आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने खुद कहा था कि चुनाव को लेकर इंडिया गठबंधन बनाया गया था. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी काफी ना-नुकुर के बाद कांग्रेस 71 सीटें लेकर आरजेडी के साथ गठबंधन में आई. चुनाव रिजल्ट में कांग्रेस महज 19 सीटें जीत पाई. इसके बाद आरजेडी लगातार आरोप लगाती रही कि कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के चलते तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री नहीं बन पाए.
पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश पर नजर डालें तो वहां भी कुछ इसी तरह की तस्वीर दिखती रही है. 2017 के विधानसभा चुनाव में आखिरी वक्त में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया. गठबंधन में सपा पर प्रेशर बनाकर कांग्रेस ने 114 सीटों पर प्रत्याशी उतारे, जिसमें केवल सात जीत पाए. चुनाव के बाद यह गठबंधन टूट गया और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राहुल गांधी में दूरियां बन गईं. 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले मैदान में उतरी तो फिर उसे करारी हार ही मिली. 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से कांग्रेस का समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन हुआ. इंडिया गठबंधन के अच्छे रिजल्ट आए तो कांग्रेस खुद को क्रेडिट देने लगी.
इससे थोड़ा पीछे जाएं तो 2023 मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के कमलनाथ ने ना केवल समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने से मना कर दिया बल्कि अखिलेश यादव के नाम को बिगाड़कर मीडिया में बयान दे दिया. इसी तरह 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को लगा कि वह सत्ता में आ रही है तो उसने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन से मना कर दिया. यहां भी कांग्रेस का दांव उल्टा पड़ा और वह चुनाव हार गई.
बिहार के ही पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल पर नजर डालें तो यहां भी चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस वामदलों के साथ गई, लेकिन यहां भी हार मिलने पर गठबंधन हवा-हवाई ही साबित हुए. इसी तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस ने चौंकाते हुए शिवसेना और एनसीपी के साथ गठबंधन किए. 2024 के लोकसभा चुनाव में शानदार जीत मिली. इसके बाद विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की खींचतान के चलते आखिरी वक्त तक गठबंधन में गांठ ही नजर आते रहे. बुरी हार मिली तो आज महाराष्ट्र में कांग्रेस का सहयोगी दलों के साथ क्या रिश्ते हैं यह सबके सामने है.
इन तमाम उदाहरणों में एक बात कॉमन दिखती है कि कांग्रेस अलग-अलग चुनावों से पहले गठबंधन बनाती है, लेकिन अपेक्षा के अनुरूप रिजल्ट नहीं आने पर या तो कांग्रेस सहयोगियों को निशाने पर लेती है या सहयोगी कांग्रेस के साथ ऐसा ही व्यवहार करती है.
ऐसे कैसे जनता का भरोसा जीतेगी कांग्रेस?
कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है. इसके बाद भी वह मौसम की तरह गठबंधन बदलती रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस के इस रवैये को देखते हुए भला वह देश की वोटरों के बीच कैसे भरोसा बना पाएगी. देश का वोटरों के मन में यह संशय होना स्वभाविक है कि कांग्रेस केवल सत्ता पाने के लिए सहयोगी बनाती है. मंसूबा पूरा नहीं होने पर वह सहयोगियों को झिड़कने में तनिक भी नहीं सोचती है.
समाज के किसी भी तबके में कोई उपेक्षा या नाराजगी का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं………
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