शुतुरमुर्ग भले ही एक पक्षी है, लेकिन उसमें उसके एक भी गुण नहीं होते हैं. इसकी आदत होती है कि यह खतरे को भांपकर अपना सिर नीचे झुका लेता है. माना जाता है कि शुतुरमुर्ग मान लेता है कि उसके सिर झुकाने से खतरा टल जाएगा, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है. इस वक्त भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की भी यही हालत नजर आती है.
बिहार विधानसभा चुनाव में महज छह सीटों पर सिमटने के बाद राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने समीक्षा बैठक बुलाई. समीक्षा बैठक में कांग्रेस नेताओं के एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप मढ़ने की खबरें आई. हालात इतने बिगड़े की बात गाली-गलौज और गोली मारने की धमकी तक चली गई. चलिए ये तो समीक्षा बैठक के अंदर की बातें हैं, जिसपर बिहार कांग्रेस के मौजूदा कर्णधार मुहर लगाने से कतरा रहे हैं.
इस झगड़ा-झंझट से इतर समीक्षा बैठक के बाद हुई प्रेस ब्रीफिंग की बातों पर गौर करें तो वह पूरी तरह से समझ से परे नजर आती है.
बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कृष्णा अल्लावरु को प्रभारी बनाया. सो समीक्षा बैठक के बाद वही पत्रकारों से बातचीत करने पहुंचे. पत्रकारों ने उनसे पहला ही सवाल पूछा कि क्या कांग्रेस की इस दुर्गति के लिए किसी की जवाबदेही तय होगी? इसपर अल्लावरु ने कहा- ‘कांग्रेस और गठबंधन की हार के दो बड़े कारण रहे. एक वोट खरीदी और दूसरा चुनावी प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाना.’
वहीं प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने इसी सवाल के जवाब में कहा- ‘मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने वन टू वन लोगों से फीडबैक लिया, जिसमें दो तीन बातें छनकर आई. सभी कैंडिडेट ने एक स्वर से कहा कि ये एसआईआर के जरिए वोट चोरी करने का लीगल तरीका अपनाया गया. चुनाव आयोग की मदद से लोगों को आचार संहिता लगने के बावजूद आर्थिक मदद की गई. खासकर वोटिंग के वक्त किसानों, महिलाओं और वर्करों को प्रभावित किया गया.’
उन्होंने आगे कहा कि वोट चोरी के बाद भी हमारे और इंडिया गठबंधन के वोट प्रतिशत में कमी नहीं आई है. हमारी पराजय केंद्र सरकार की ओर से प्रभावित की गई. अब हम नये सिरे से संगठन को तैयार करेंगे.
टिकट बंटवारे को हार के आंकड़ों से ढकते दिखे कांग्रेसी
कांग्रेस नेताओं से पूछा गया कि क्या कुछ सीटों पर गठबंधन के दलों की ओर से दो-दो उम्मीदवार उतारने का नुकसान हुआ? इसपर कृष्णा अल्लावरु ने रणनीतिक गलती स्वीकारने के बजाय कहा- ‘कुछ टिकट बंटवारे कंट्रोवर्शियल रहे. ये बात सही है. लेकिन आंकड़ें भी देखने चाहिए. कंट्रोवर्शियल और नॉन कंट्रोवर्शियल टिकट में हार के मार्जिन में अंतर नहीं है. इससे ये साफ होता है कि टिकट बेचे जाने का आरोप गलत है. आरोप लगाना आसान है. तथ्य के साथ आपको बात करनी चाहिए.
अब यहां कृष्णा अल्लावरु ने जिस सफाई के साथ आंकड़े दिखाकर अपनी गर्दन बचाते दिखे उसमें यह नहीं समझा पाए कि जब आप किसी चुनाव में एक भी सीट पर फ्रेंडली फाइट करते हैं तो उसक इम्पैक्ट पूरे चुनाव पर होता है. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए खेमा इसी बात को प्रचारित करता दिखा कि महागठबंधन में अभी से एकजुटता की कमी है तो बिहार को कैसे चलाएंगे. खुद प्रधानमंत्री मंचों से आरोप लगाते रहे कि महागठबंधन में सिर पर कट्टा रखकर टिकटों का बंटवारा हुआ है.
अपनी कमियों को दूर करने के बजाय सामने वाले पर दोष मढ़ते रहे कांग्रेसी
पूरी प्रेस ब्रीफिंग में तमाम कांग्रेस नेता अपनी कमियों को स्वीकारने के बजाय केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को कोसते दिखे. प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम अपने पूरे बयान में समीक्षा बैठक में हुई चर्चा के विषयों से ज्यादा इस बात पर जोर देते दिखे कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोगों से व्यक्तिगत तौर पर बात की.
यहां यह समझने की जरूरत है कि दूसरी तरफ देश के गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह डेली रूटीन है. वह हर रोज पार्टी के एक छोटे कार्यकर्ता के पास खुद चलकर पहुंचते हैं, उनसे फीडबैक लेते हैं और रणनीतियों में क्रॉस करेक्शन करते हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि 2014 के बाद इतनी ज्यादा हार झेलने के बाद भी कांग्रेस पार्टी अभी भी शुतुरमुर्ग बने रहने पर क्यों आमदा है. अगर उनके आरोपों को कुछ समय के लिए मान भी लें तो सवाल है कि क्या कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इसी से खुश है. क्या कांग्रेस सत्तापक्ष के सामने संख्याबल के हिसाब से लाचार विपक्ष ही बने रहना चाहती है. आगे पश्चिम बंगाल का बड़ा चुनाव है. वहां पार्टी खुद का अस्तित्व बचाए रखने के लिए क्या करती है यह देखने वाली बात होगी.







