महिला वोटर बनेंगी निर्णायक
पहले चरण की तरह इस बार भी महिला मतदाता अहम भूमिका में हैं। 6 नवंबर को हुए पहले चरण में रिकॉर्ड 65 फीसदी से ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई थी। पहले चरण में भी महिला मतदाताओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा मतदान किया। इसके बाद दूसरे चरण में सभी दलों के नेताओं ने महिला वोटरों को साधने पर खास ध्यान दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जहां अपनी सरकार की महिला सशक्तिकरण योजनाओं को गिनाते नजर आए, वहीं तेजस्वी यादव ने ‘माई बहिन योजना’ के तहत महिलाओं के खातों में 30 हजार रुपये सालाना देने का वादा दोहराया।
P फैक्टर: प्रशांत किशोर का नया प्रयोग
प्रशांत किशोर, जो पहले चुनावी रणनीतिकार के रूप में जाने जाते थे, अब खुद एक राजनीतिक दल जन सुराज के संस्थापक और नेता हैं. उन्होंने चार उपचुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे और कुछ सीटों पर उल्लेखनीय प्रदर्शन किया. उदाहरण के लिए:
- बेलागंज में तीसरे स्थान पर रहते हुए 17,285 वोट मिले.
- इमामगंज में 37,103 वोट के साथ फिर तीसरे स्थान पर.
- रामगढ़ में 6,513 वोट, चौथा स्थान.
- तरारी में 5,592 वोट, तीसरा स्थान.
पॉलिटिकल एक्सपर्ट सतीश के. सिंह कहते हैं कि पीके की पार्टी असर डालेगी, लेकिन उन्होंने एक नैरेटिव खड़ा किया है. खासकर गंगा के उस पार और मगध क्षेत्र में उनका असर देखा जा सकता है. पटना की सीटों कुम्हरार और दीघा में उन्होंने बीजेपी को नुकसान पहुंचाया है.
क्या PK सरकार बनाने में गेमचेंजर बन सकते हैं?
विश्लेषकों का मानना है कि अगर जन सुराज को 7% से कम वोट मिलते हैं, तो उन्हें 0 से 5 सीटें मिल सकती हैं. 7-14% वोट शेयर पर 5 से 20 सीटें, और 14-17% पर 21 से 40 सीटें संभव हैं. लेकिन अगर वोट शेयर 18% से ऊपर चला गया, तो सीटों का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि भारत के फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम में वोटों का बिखराव नतीजों को अप्रत्याशित बना देता है.
चुनाव के एक दिन पहले का अहम समय
सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि अगर एनडीए को अपनी सत्ता बरकरार रखनी हो तो पहले चरण ने मोमेंटम को दूसरे चरण में भी कायम रखना होगा। मतदान के एक दिन पहले और मतदान के दिन का प्रभाव ही चुनाव में सबसे अहम माना जाता है। जरा-सी गलती के कारण महीने भर की मेहनत ऐन वक्त पर मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जाती है। अगर, एनडीए को बेहतर प्रदर्शन करना है तो उसे अपने कमजोर पक्ष को ठीक करना होगा। एनडीए का कमजोर पक्ष है रोहतास और कैमूर की 11 सीटें साथ ही मगध क्षेत्र की 26 सीटें।
रोहतास, कैमूर और मगध का सिकंदर कौन?
पिछले चुनाव में एनडीए को रोहतास और कैमूर में एक भी सीट नहीं मिली थी। राजद और कांग्रेस के विधायकों के एनडीए में आने के बाद स्थिति कुछ बदली है। पिछले चुनाव में मगध प्रमंडल के 5 जिलों की 26 सीटों में से एनडीए को सिर्फ 6 सीटें मिलीं थीं। 20 पर महागठबंधन ने कब्जा जमाया था। अगर 2025 में एनडीए को सत्ता सुनिश्चित करनी है तो रोहतास, कैमूर और मगध में महागठबंधन के किले को ढाहना होगा। एक दिन के घर-घर जनसम्पर्क से चुनाव में बहुत कुछ बदल जाता है। यही बात महागठबंधन पर लागू होती है। एक दिन में वो भी अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
महागठबंधन के लिए दरभंगा सबसे बड़ी चुनौती
महागठबंधन को सबसे अधिक नुकसान और एनडीए को सबसे अधिक फायदा दरभंगा क्षेत्र में हुआ था। पिछले चुनाव में दरभंगा जिले की 10 विधानसभा सीटों में से 8 पर एनडीए को विजय मिली थी। महागठबंधन को सिर्फ दो सीटों पर संतोष करना पड़ा था। यहां ध्यान देने की बात है कि दरभंगा जिले में मुस्लिम वोटरों की अच्छी-खासी आबादी है। इसके बावजूद महागठबंधन के 4 मुस्लिम उम्मीदवार इस चुनाव में हार गए थे।
हरा गए थे महागठबंधन के 4 मुस्लिम कैंडिडेट
राजद के दिग्गज नेता में शुमार अब्दुल बारी सिद्दीकी केवटी में भाजपा के मुरारी मोहन झा से हार गए थे। इस चुनाव में राजद का मुस्लिम वोट बैंक बिखर गया था। राजद के अफजल अली खां गौराबौड़ाम सीट पर और फराज फातिमी दरभंगा ग्रामीण सीट पर हारे थे। जाले में कांग्रेस के मश्कूर रहमानी भाजपा से हार गए थे। लालू यादव के हनुमान कहे जाने वाले भोला यादव भी हायाघाट में भाजपा से मात का गए थे। इस बार अगर एनडीए ने इस क्षेत्र में अपने पुराने प्रदर्शन को दोहरा दिया तो महागठबंधन और पिछड़ जाएगा।
तिरहुत में महागठबंधन को हुआ था भारी नुकसान
इसी तरह पिछले चुनाव में तिरहुत प्रमंडल के चार जिलों (मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली) की 30 सीटों पर महागठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। कुल 30 में उसे केवल 7 सीट पर विजय मिली थी। तिरहुत क्षेत्र एनडीए का मजबूत किला है। चिराग और उपेंद्र कुशवाहा के नहीं रहने के बाद भी एनडीए ने 23 सीटें जीती थी। मुजफ्फरपुर की 11 सीटों पर लगभग बराबर का मुकाबला था। एनडीए को 6 तो महागठबंधन को 5 सीटें मिली थी। वैशाली (8) में भी मुकाबला 4-4 से बराबर था। असल अंतर आया था पश्चिम चंपारण में। बेतिया की 9 सीटों में से 8 पर एनडीए को विजय मिली थी। एक सीट (सिकटा) भाकपा माले को मिली थी। पूर्वी चंपारण की 12 सीटों में से 9 पर एनडीए को और 3 पर राजद को जीत मिली थी।
भागलपुर में महागठबंधन के लिए विकट स्थिति
पिछले चुनाव में भागलपुर और बांका की 12 सीटों में से 10 पर एनडीए तो 2 पर महागठबंधन को जीत मिली थी। इस बार भागलपुर के कहलगांव और सुल्तानगंज में महागठबंधन के प्रत्याशी आपस में ही चुनाव लड़ रहे हैं। कहलगांव में राजद के रजनीश भारती और कांग्रेस के प्रवीण कुशवाहा की आपसी लड़ाई से जदयू उम्मीदवार शुभानंद मुकेश की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। सुल्तानगंज में राजद के चंदन कुमार और कांग्रेस के ललन कुमार के बीच दोस्ताना लड़ाई चल रही है। इससे जदयू के ललित मंडल का रास्ता आसान हो गया है।
दूसरे चरण में 37 लाख से अधिक मतदाता, 1302 उम्मीदवार मैदान में
सीमांचल में सियासी मुकाबला कड़ा
बिहार चुनाव का दूसरा चरण सीमांचल और दक्षिण बिहार के कई अहम जिलों को कवर करता है। 2020 विधानसभा चुनाव में सीमांचल में एनडीए ने 67 सीटें, जबकि महागठबंधन ने 50 सीटें जीती थीं। वहीं, एआईएमआईएम (AIMIM) ने सीमांचल क्षेत्र की पांच सीटें जीतकर विपक्ष को नुकसान पहुंचाया था।
दूसरे चरण में दोनों गठबंधनों से कितने प्रत्याशी?
महागठबंधन की ओर से राजद (70), कांग्रेस (37) और वीआईपी (8) उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि सीपीआई (एमएल), सीपीएम और सीपीआई क्रमशः 5, 4 और 2 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। कुछ सीटों पर गठबंधन के भीतर ‘फ्रेंडली फाइट’ भी देखने को मिलेगी, जिनमें चैनपुर, नरकटियागंज और सुल्तानगंज प्रमुख हैं।
वहीं, एनडीए की ओर से भाजपा (52), जदयू (45) और लोजपा (रामविलास) (16) सीटों पर मुकाबले में हैं। इसके अलावा हम (6) और आरएलएम (4) ने भी उम्मीदवार उतारे हैं। एनडीए अपने सहयोगियों चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा के प्रभाव वाले समुदायों में वोट ट्रांसफर पर भरोसा कर रहा है।
दूसरे चरण में कई मंत्री भी मैदान में
इस चरण में कई मौजूदा मंत्री भी दोबारा विधानसभा में पहुंचने की कोशिश में हैं, जिनमें विजेंद्र यादव (सुपौल), सुमित कुमार सिंह (चकाई), नीतीश मिश्रा (जमुई), जयंत राज (अमरोपुर), नीरज कुमार सिंह बबलू (छातापुर) और जमां खान (चैनपुर) शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय सीमा सील, सुरक्षा बलों की 1650 कंपनियां तैनात, दूसरे चरण के लिए किले में तब्दील हुए बिहार के 20 जिले
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए दूसरे चरण का चुनाव प्रचार रविवार को समाप्त हो गया। मंगलवार को 122 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे। ऐसे में वोटिंग को लेकर सुरक्षा व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए गए हैं। चप्पे-चप्पे पर पुलिस की टीम और सुरक्षा बलों की भी तैनाती की गई है।
पहले चरण की तुलना में इस बार सुरक्षा व्यवस्था ज्यादा कड़ी
बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार ने रविवार को कहा कि विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान को लेकर सुरक्षा इंतज़ाम पूरी तरह से पुख्ता कर दिए गए हैं। पहले चरण की तुलना में इस बार सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी की गई है। डीजीपी ने बताया कि 11 नवंबर को होने वाले दूसरे चरण के मतदान के लिए सभी जिलों में सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती की गई है।
भारत-नेपाल सीमा से सटे 7 जिलों में खास सुरक्षा व्यवस्था
इस चरण में 20 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है। इनमें कई जिले अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय सीमाओं से सटे हैं, जिसके चलते अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। कुमार ने कहा कि भारत-नेपाल सीमा से सटे सात जिलों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। वहीं, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सीमाओं से लगे जिलों में विशेष निगरानी रखी जा रही है।
शनिवार से सील की गई अंतरराष्ट्रीय सीमा
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा को शनिवार से पूरी तरह सील कर दिया गया है, जबकि अंतरराज्यीय सीमाएं रविवार शाम तक बंद कर दी जाएंगी। डीजीपी ने कहा कि दूसरे चरण में केंद्रीय सुरक्षा बलों की कुल 1,650 कंपनियां तैनात की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त राज्य पुलिस बल की अतिरिक्त टुकड़ियां भी प्रत्येक जिले में भेजी गई हैं ताकि हर मतदान केंद्र पर शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित किया जा सके।





