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छात्रों के सहारे जेपी बनने निकले पीके औंधे मुंह गिरे!

UB India News by UB India News
January 1, 2025
in पटना, बिहार, शिक्षा
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छात्रों के सहारे जेपी बनने निकले पीके औंधे मुंह गिरे!
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राजनीति में दो-दो हाथ आजमाने उतरे जनसुराज के नायक प्रशांत किशोर भले राजनीतिक सलाहकार की भूमिका में सफल रहे हों, लेकिन जब खुद राजनीति का दामन थाम बिहार की धरती पर उतरे तो उनकी हार ‘शह मात’ का संदेश लेकर आई। चार विधान सभा उप चुनाव के परिणाम ने उनकी हेकड़ी को वास्तविकता का जमीन दिखाया। जब बीपीएसपी छात्रों के आंदोलन का ‘सूत्र’ पकड़ कर जे पी बनने की राह क्या ढूंढी खुद औंधे मुंह गिर गए, और तरह-तरह के इल्ज़ाम की पोटरी भी उनके सिर आ गिरी, सो अलग।

राह बताना आसान चलना मुश्किल
राजनीति में सफलता की राह बताने के मास्टर माइंड प्रशांत किशोर राजनीति की पथरीली भूमि पर जब स्वयं चलना चाहे तो चंद कदम भी नहीं चल सके। ‘नीतीशे कुमार’ के नारों से बिहार में चर्चित हुए प्रशांत किशोर खुद अपने लिए कोई ऐसा नारा नहीं ढूंढ सके, जो उन्हें जनप्रिय बना सके। इसलिए जब चुनाव में जातविहीन समाज की कल्पना के साथ उतरे तो असफलता का सामना करना पड़ा, लेकिन यह उनकी स्ट्रेटजी का एक मात्र दुखद काल नहीं। जेपी की तरह छात्र राजनीति के सहारे राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने की आस भी अधूरी रह गई। उल्टे कई आरोप भी उन पर लग गए।

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युवाओं की राजनीति से वैतरणी पार करना भी महंगा पड़ा
प्रशांत किशोर राजनीति के जब रिदम में आए तो उन्हें सबसे सॉफ्ट टारगेट युवा, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे लगे। इस संदर्भ में डाटा पर डाटा बिखेरने लगे। तेजस्वी यादव पर 9वीं फेल का जुमला ठोंका और उनकी तुलना पढ़े-लिखे लोगों से कर छोटी-मोटी नौकरियों को लेकर परेशान युवाओं को टारगेट किया। इस तुलनात्मक विवेचन ने युवा पीढ़ी को या फिर कह लें बेरोजगारों या पलायन के अभिशप्त लोगों को जनसुराज भाने भी लगा। लेकिन, शायद यह प्रशांत किशोर का बुरा वक्त था। जेपी कह लें या ‘मेरे जिगर के टुकड़े’ कहने वाले पूर्व मुख्यमंत्री महामाया बाबू के साथ जिस छात्र सेना ने सत्ता की कुर्सी हाथों हाथ दिला दी। इसी छात्र या कह ले युवाओं के साथ चलने की कला की अनभिज्ञाता ने प्रशांत किशोर की पूरी मुहिम का बंटा धार कर दिया।

प्रशांत किशोर से कहां चूक हुई ?
प्रशांत किशोर एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं हैं, यह तो साबित हो गया। वह आंकड़ों के बाजीगर हो सकते हैं। स्लोगन देने के बादशाह हो सकते हैं। जातीय समीकरण में जीत का समीकरण बना सकते हैं, पर राजनीति की धार पर चल नहीं सकते। छात्र आंदोलन के साथ लोकनायक जयप्रकाश जब निकले तो पहली लाठी उन्होंने ने खाई। सिर से बहता हुआ खून उस वक्त छात्र के लिए मर मिटने का संदेश लेकर आई। तब तानाशाही पर उतारू इंदिरा गांधी के विरुद्ध बिहार से उठा छात्र आंदोलन देश के कई हिस्सों में उससे भी ज्यादा व्यापकता के साथ शुरू हुआ। इसने प्रशासन तंत्र को नाकों चने चबा दिए।

महामाया बाबू जब अपना कुर्ता फाड़ते हुए कहते- ‘मेरे जिगर के टुकड़े’ तो छात्र युवा उनके लिए खून बहाने के लिए तैयार हो जाते थे। प्रशांत किशोर इस आंदोलन से खुद को जोड़ नहीं पाए। वे इसे एक अवसर मान बैठे और छात्रों के बीपीएससी आंदोलन को हाई जैक करने ऐसे निकले, जैसे कोई मॉर्निंग वॉक पर निकला हो। यहीं से उनके अभियान का तार ढीला पड़ गया।

प्रशांत किशोर पटना की सड़को पर आंदोलन कर रहे बिहार के युवाओं के साथ जुड़कर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते थे। पटना में BPSC परीक्षा के अभ्यर्थी प्रदर्शन कर रहे थे। पीके ने इस मौके का फायदा उठाकर आगामी चुनाव का आधार समझ लिया, वहां वे असफल हो गए। जब पुलिस ने लाठीचार्ज और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया तो पीके बैक डोर से निकल गए या उनके साथी प्रशांत किशोर को बचाते हुए छात्रों को भगवान भरोसे छोड़कर चले गए।

छात्रों के सहारे राजनीति करने उतरे प्रशांत किशोर की यह बड़ी भूल साबित हुई। बिहार का युवा अब उन्हें ‘रण छोड़’ कहने लगा है। कह सकते हैं कि पीके का दांव उल्टा पड़ गया। प्रशांत किशोर पर ही बीपीएससी अभ्यर्थियों को भड़काने का आरोप लग गया। ‘न माया मिली न राम’, यह स्थिति तब हुई जब आंदोलन स्थल पर पहुंचे प्रशांत किशोर ने प्रदर्शनकारी बीपीएससी अभ्यरियों को भरोसा दिलाया था कि अगर पुलिस एक्शन हुआ तो पहली लाठी उन पर ही चलेगी।

आंदोलन से पीछे क्या हटे, अपना दामन जला बैठे पीके
यहां तक भी ठीक था। थोड़ी फजीहत हुई। लेकिन हद तो तब हो गई जब प्रशांत किशोर वापस तीमारदारी के लिए आंदोलनकर्मियों के बीच आए। पर यह आपसी कहा सुनी में पीके की जुबान फिसली और कह बैठे- ‘ज्यादा होशियार बन रहे हो’ इस पर अभ्यर्थियो ने भी जवाब दे दिया- ‘यहां आंदोलन में रहना है, तो रहो… नहीं तो चले जाओ…। तमीज से बात करो, नहीं तो चुप रहो।’ इसके बाद प्रशांत किशोर ने यहां तक बोल दिया- ‘कंबल मांगे हो मुझसे… और बहस करते हो।’

क्यों असफल हुए प्रशांत किशोर?
अब तक चुनावी सफलता में प्रशांत किशोर का कंधा नहीं लगा था, वे जिन दलों के लिए काम किए, सड़कों पर वे राजनीतिक अनुभव के साथ उतरे। दरअसल चुनाव की रणनीति बनाना और सड़क पर उतर राजनीति को कोई शेप देना काफी कठिन है। मुश्किल यह हुई कि दलों की जीत की उन्होंने अपनी राजनीतिक जीत मान ली। यही पीके से गलती हुई, जिसका खामियाजा तो भुगतना ही था। यह सच है कि प्रशांत किशोर विभिन्न दलों के लिए कई मुहिम चलाए पर खुद कभी भी सड़क पर नहीं उतरे। पीके की इस अनुभवहीनता ने उनकी राजनीति की इस चाल की तो धज्जियां उड़ा दी, वह भी इसलिए कि वे यह नहीं समझ सके कि सड़कों पर जब राजनेता उतरते हैं तो पीठ पर लाठी का अहसास लेकर जाते हैं। चुनाव कैंपेन करना और सड़क पर उतरने का फर्क पीके नहीं समझ पाए।

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