अभी हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर मालदीव गए थे और वहां ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके मुताबिक मालदीव अपने 28 द्वीप भारत की निगरानी में दे रहा है. भारत वहां पीने के पानी और अन्य बातों की देखरेख के लिए सैकड़ों मिलियन डॉलर की योजना शुरू कर रहा है. एक ही साल में मुइज्जू के तेवर ढीले पड़े हैं, तो इसके पीछे कहीं न कहीं भारत की विदेश नीति की कामयाबी है. आज जब मुइज्जू भारत की ओर बड़ी उम्मीदजदा नजरों से देख रहे हैं तो गेंद अब भारत के पाले में है और फैसला भी भारत को ही करना है. चीन और तुर्किए के दम पर कूदनेवाले मुइज्जू को यह पता चल गया कि भारत वह बड़ा भाई है, जिसके बिना मालदीव का गुजारा नहीं है.
पड़ोस में लोकतंत्र पर खतरा
भारत का पड़ोस एक के बाद एक फेल्ड स्टेट बनने की ओर बढ़ रहा है या बढ़ चुका है. अफगानिस्तान से शुरू करें तो वह एक विफल राष्ट्र है औऱ जब से अमेरिका ने वहां से अपनी जगह छोड़ी है, तब से तालिबान ने उस देश को और भी अंधकार में धकेल दिया है. तालिबान को इक्का-दुक्का देश मान्यता देते हैं, अन्यथा वह भी नहीं. भारत से उसका दूतावास उठ चुका है. चीन वहां अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारत वहां पिछले दो दशकों से मौजूद है और मानवीय सहायता दे रहा है.
म्यांमार या बर्मा फौजी बूटों के तले ही रौंदा जा रहा है. बीच में एकाध साल ऐसे रहे जब वहां के लिए कुछ उम्मीद जगी, लेकिन फिलहाल वहां भी लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया है. नेपाल लगातार राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है और दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र जब से अपनी पहचान से विमुख हुआ है, सेकुलर बना है, वहां स्थिरता नहीं आय़ी. श्रीलंका चीन के ऋण-जाल में फंस चुका है. पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र तो है ही, वह आतंकवाद की भी नर्सरी है और ये बेहद चिंता की बात है.
बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकार भारत के साथ अच्छे संबंध रखना चाहती थी, रखती थी लेकिन अब वहां भी ऐसी सरकार आयी है, जो खुद तो डांवाडोल है ही, भारत के संदर्भ में भी उनकी वफादारी सोचने का विषय है. ले-देकर एक भूटान ही है जहां थोड़ी ठीक स्थिति है, वरना भारत का पड़ोस बहुत ही अधिक वोलाटाइल यानी विस्फोटक है.
मालदीव की हेकड़ी गायब
नए राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपना पूरा कैंपेन तो भारत के खिलाफ रखा ही था. सत्ता में आने के बाद भी वह इस तरह की बयानबाजी कर रहे थे, मानो अब भारत से दो-दो हाथ मालदीव कर ही लेगा. चीन वहां वैसे भी घुसने के फिराक में है ही, क्योंकि हिंद महासागर के लिहाज से मालदीव बहुत ही रणनीतिक जगह पर है. चीन ने मुइज्जू के चुनाव में भी काफी पैसा लगाया था.
भारत पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए मुइज्जू ने भी कई बयान दिए और तुर्किए औऱ चीन से खाद्यान्न और तेल वगैरह मंगवाने लगे. वह हालांकि इतना महंगा पड़ा कि मुइज्जू को आटे-दाल का भाव पता चल गया और उन्होंने भारत से गुहार लगाकर फिर से अपने संबंध ठीक किए. भारत अब उसके 28 द्वीपों पर पेयजल और सीवेज वगैरह की व्यवस्था देखेगा. रणनीतिक तौर पर यह भारत के लिए बड़ा सौदा है.
दरअसल, मुइज्जू भारत विरोधी माहौल बनाकर चुनावों में जीतकर आए थे, लिहाजा उन्होंने इसी को आगे बढ़ाना चाहा. मालदीव में सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री और अधिकारी भारत पर गैर जिम्मेदाराना टिप्पणियां करने से बाज नहीं आए. यहां तक कि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप का दौरा कर कुछ तस्वीरें साझा कीं, तो मालदीव के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी गलत बयान दिए. इससे मालदीव के विदेशी और आर्थिक दोनों ही हितों को खासा नुकसान हुआ. मालदीव की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पर्यटन पर आधारित है और उसमें भारतीयों की अच्छी-खासी संख्या रहती है. विवाद के बाद भारतीयों ने भी अच्छी-खासी संख्या में दूरी बना ली, दूसरी ओर चीनी ऋण बढ़ता जा रहा था. मालदीव की समझ में आ गया कि चीन की मदद लेते रहने का मतलब ऋण के ऐसे जाल में फंसना, जहां से निकलना मुश्किल हो जाएगा. उसके सामने श्रीलंका से लेकर पाकिस्तान तक का उदाहरण सामने था और तब ही उसको विश्वसनीय भागीदार के रूप में भारत की भूमिका समझ में आने लगी. भारत ने भी अच्छे पड़ोसी की भूमिका निभायी और उसकी मदद की है.
बांग्लादेश के हिंदू और भारत
भारत कुल मिलाकर एशिया में एक ऐसी ताकत है, जिसके पास काफी जिम्मेदारियां हैं और पूरी दुनिया इसकी तरफ उम्मीद से देखती है. चीन के पास ताकत और सामर्थ्य है, लेकिन उसके ऊपर कोई भरोसा नहीं करता है. खासकर कोरोना के बाद से चीन अपनी ही मुसीबतों में फंसा दिखता है और वैसे भी चीन कुल मिलाकर है एक तानाशाही वाला देश ही. उसके आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक अंदरूनी हालात कैसे हैं, कोई दावे से नहीं कह सकता, इसलिए अगर भविष्य में यूएसएसआर की तरह चीन भी कई टुकड़ों में बंट जाए, तो वह भी आश्चर्य नहीं होगा, लेकिन अभी भी वह भरोसेमंद तो नहीं है.
मालदीव हिंद महासागर में बहुत महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान रखता है और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए यह भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है. मालदीव की पिछली सरकार और भारत में अच्छे संबंध थे. चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए एक स्थिर साझीदारी जरूरी है. भारत का विरोध करने से भू-राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है, ऐसा मालदीव भी जानता है. इसलिए, भारत और मालदीव दोनों एक-दूसरे के साथ फिर आ गए हैं.
बांग्लादेश में हिंदू-नरसंहार पर भारतीय पीएम के ट्वीट के बाद बांग्लादेशी अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनुस ने हिंदुओं से माफी मांगी है. यह जहां एक तरफ सिद्ध करता है कि बांग्लादेश में हिंदू-नरसंहार हुआ, वहीं यह भी दिखाता है कि भारत इस मुद्दे पर चिंतित है और उसकी चिंता से बांग्लादेश वाकिफ है. भारत के कहने का प्रभाव होता है, इसलिए इस बार संयुक्त राष्ट्र ने भी इसका संज्ञान लिया है और कई अंतरराष्ट्रीय शख्सियतों ने भी, वरना अमूमन हिंदू-हत्या या हिंदुओं के खिलाफ घृणा शायद ही कभी इस तरह खबरों में आ पाती थी, उसे नकारने की सबसे अधिक कोशिश होती थी.
निष्कर्ष के तौर पर यह कि फिलहाल भारत में एक स्थायी और मजबूत सत्ता वाली केंद्रीय सरकार है और यह देश के दुश्मनों को हजम नहीं हो रही. उसी तरह डीप स्टेट कभी नहीं चाहता कि भारत एक वैश्विक शक्ति बने और इस काम मे उसको फिलहाल भारत के ही कुछ लोग भी मदद दे रहे हैं. चौतरफा अस्थिरता और संकटों से घिरे इस देश की विदेश नीति अभी बहुत महत्वपूर्ण है और अच्छी बात यह है कि हम देख रहे हैं कि देश में यह काम बिल्कुल कायदे से हो रहा है. हमारी विदेश नीति अति सुरक्षित हाथों में है और हमें उन पर भरोसा करने लायक बनाती है.







