बिहार के पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। मंगलवार को इसका ऐलान हुआ। लोकसभा चुनाव से पहले इसे मोदी सरकार के बड़े मास्टर स्ट्रोक के तौर पर देखा जा रहा है। समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर को ‘जननायक’ के तौर पर जाना जाता है। वह दिसंबर 1970 से जून 1971 तक और फिर दिसंबर 1977 से अप्रैल 1979 तक बिहार के सीएम रहे। यह घोषणा कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती से ठीक एक दिन पहले हुई है। बुधवार को कर्पूरी ठाकुर की जयंती के मौके पर बिहार में बड़े स्तर पर आयोजन होने हैं। पूरे बिहार में इसे लेकर उत्साह है। कर्पूरी ठाकुर बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी सीएम थे। मोदी सरकार का यह फैसला सिर्फ सम्मान तक सीमित नहीं है। इसके जरिये बीजेपी की नजर उनकी राजनीतिक विरासत पर भी है।
पीएम के बिहार दौरे से पहले हुआ ऐलान
लोकसभा चुनाव से पहले कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न सम्मान देकर सरकार ने एक साथ कई चीजों को साधने की कोशिश की है। 4 फरवरी को पीएम मोदी बिहार के बेतिया जाने वाले हैं। बेतिया के सुगौली में वह रैली को संबोधित करेंगे। बिहार में केंद्र की कई योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन भी करने का प्रोग्राम है। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार बीजेपी राज्य में अपने सबसे पुराने सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU) के बगैर चुनावी मैदान में उतरेगी। 2019 के चुनाव में एनडीए ने 39 सीटों पर जीत हासिल की थी। उस वक्त सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पार्टी बीजेपी के साथ थी। एनडीए से अलग होने के बाद बीजेपी के पास 17 और जेडीयू के पास 16 सीटें हैं।
नीतीश के ओबीसी कार्ड को किया कुंद
कर्पूरी ठाकुर के जरिये नीतीश बिहार में पिछड़ों खासतौर से ओबीसी कार्ड खेलने की पुरजोर कोशिश में लगे थे। लेकिन, मोदी सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित कर उस धार को कुंद करने का काम किया है। कर्पूरी ठाकुर बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले थे। वह नाई समुदाय से थे। उन्हें पिछड़े वर्गों के हितों की वकालत करने के लिए जाना जाता था। उन्होंने सामाज में भेदभाव और असमानता के खिलाफ लंबा संघर्ष किया। पहली बार वह सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय क्रांति दल की सरकार में सीएम बने थे। फिर वह जनता पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री बने।
कांग्रेस के प्रणब को बीजेपी ने बनाया अपना!
कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे प्रणब मुखर्जी को भी बीजेपी सरकार में भारत रत्न मिला था। 26 जनवरी 2019 को उन्हें इससे सम्मानित किया गया था। प्रणब मुखर्जी 2012 से 2017 तक देश के राष्ट्रपति रहे। दूसरे दलों के दिग्गजों को सराहने और सम्मानित करने में मोदी सरकार जरा भी नहीं संकोचती। इसमें उसकी बिल्कुल अलग तरह की अप्रोच है। यह मामला सिर्फ सम्मान तक सीमित नहीं होता है। इसके जरिये बीजेपी की नजर उन नेताओं की विरासत पर भी होती है।
मुलायम सिंह हैं उदाहरण…
मुलायम सिंह यादव भी इसका बड़ा उदाहरण हैं। पिछले साल के शुरू में मोदी सरकार ने अपने फैसले से समाजवादी पार्टी को चौंका दिया था। पार्टी ने जाने-माने समाजवादी मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। जीते-जी मुलायम बीजेपी के धुर विरोधी रहे। उनके गुजरने के कुछ महीने बाद ही केंद्र सरकार ने पद्म विभूषण सम्मान देकर मास्टर स्ट्रोक खेल दिया। खुद सपा प्रमुख अखिलेश यादव को यकीन नहीं रहा होगा कि मुलायम को बीजेपी सरकार में पद्म विभूषण से सम्मानित किया जाएगा। इसके जरिये बीजेपी की यादव बिरादरी को अपने साथ जोड़ने की कोशिश भी थी। 2024 के चुनाव में यादव वोट बैंक भी बीजेपी के लिए अहम है।
कर्पूरी ठाकुर के जन्म शताब्दी समारोह के आयोजन के बहाने बिहार में कई राजनीतिक दल अपनी ताकत दिखाने की बुधवार को कोशिश करेंगे। बिहार के भूतपूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर की इस बार जयंती इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि तीन महीने बाद ही लोकसभा का चुनाव होना है। पिछड़े वोटरों पर पकड़ बनाने के लिए जेडीयू, आरजेडी और बीजेपी के अलावा उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक जनता दल ने भी पूरी तैयारी की है। लेकिन सबके मंसूबों पर भाजपा ने जयंती समारोह की पूर्व संध्या पर ही पानी फेर दिया है। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी है।
भारत रत्न देने की होती रही है मांग
बिहार के लिए कर्पूरी ठाकुर के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। वे दो बार बिहार के सीएम रहे। वर्ष 1952 से वे लगातार विधायक चुने जाते रहे। साल 1967 में वे बिहार के उप मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री भी रहे। पहली बार वे 1970 में मुख्यमंत्री बने, मगर उनकी सरकार अधिक दिनों तक नहीं चल पाई। दूसरी बार उन्होंने 1977 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। उनका दूसरा कार्यकाल 1979 तक रहा। अपने राजनीतिक करियर में कर्पूरी ठाकुर सिर्फ एक बार चुनाव नहीं जीत पाए थे। वर्ष 1984 में वे लोकसभा चुनाव हार गए थे। इसलिए कि उसी साल इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। इसकी वजह से कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति लहर थी।
आरक्षण देकर मसीहा बने थे ठाकुर
मुख्यमंत्री रहते कर्पूरी ठाकुर ने सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। उनकी सादगी और ईमानदारी को आज भी लोग शिद्दत से याद करते हैं। जीवित रहते उन्होंने न कोई संपत्ति खड़ी की और परिवार के किसी व्यक्ति को राजनीति में कदम रखने दिया। उनके निधन के बाद ही परिवार का कोई सदस्य राजनीति में आ पाया। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने उनके बेटे रामनाथ ठाकुर को राज्यसभा भेजा। कर्पूरी ठाकुर अगर जीवित रहते तो शायद ही बेटे को राजनीति में आने देते। इसलिए कि शुरू से ही वे इसके विरोधी रहे। भ्रष्टाचार के वे सख्त विरोधी थे। यह अलग बात है कि आज जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, वे ही अपने को उनका सच्चा अनुयायी साबित करने के प्रयास में जुटे हुए हैं।
घर नहीं बनवा सके थे कर्पूरी ठाकुर
कर्पूरी ठाकुर अपने राजनीतिक जीवन में विधायक से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, पर गांव के पैतृक मकान के अलावा उनके पास कोई दूसरा मकान नहीं था। गांव में भी उनका पुश्तैनी मकान भी कायदे का नहीं था। आज के अघाए नेता कर्पूरी ठाकुर को भुनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं, पर वे उनकी सादगी और ईमानदारी से जरा भी सीख नहीं लेते। वोट के लिए उन्हें भुनाने की खूब कोशिश हो रही है, पर किसी ने यह नहीं सोचा कि उनके आदर्शों पर थोड़ा भी अमल कर लें। आज किसी को भी यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि बिहार में एक सीएम ऐसा भी रहा, जिसने अपने परिवार को इसलिए गांव में रखा कि उसे मिलने वाली तनख्वाह से यह संभव नहीं था।
कार नहीं खरीद पाए
यह बात आज किसी के गले नहीं उतरेगी कि कर्पूरी ठाकुर अपने लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद एक कार तक नहीं खरीद पाए। विधायकों या सांसदों की कौन कहे, आज तो मुखिया तक कार की सवारी करते हैं। सबके पास अपने वाहन हैं। कर्पूरी ठाकुर सीएम बनने पर रिक्शे की सवारी करने में थोड़ा भी संकोच नहीं करते थे। तीन साल पहले आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव को जब चारा घोटाले में जमानत मिली तो उन्होंने अपनी पुरानी जीप निकाली और बड़े फख्र से कहा कि कर्पूरी जी को वे इसी जीप से घुमाया करते थे। हालांकि सच ये नहीं है। कहा जाता है कि विधानसभा में लालू और कर्पूरी ठाकुर साथ बैठे थे। किसी काम से कर्पूरी जी को बाहर जाना था। उनके पास वाहन तो था नहीं। इसलिए एक पर्ची लिख कर उन्होंने लालू की ओर बढ़ाई। लालू ने पर्ची पर लिख कर वापस कर दी कि जीप में पेट्रोल नहीं है। आप खुद क्यों नहीं गाड़ी खरीद लेते हैं।
कुर्ते के लिए चंदा मांगा गया
कर्पूरी ठाकुर के निजी सहायक (पीए) रह चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर बताते हैं कि वर्ष 1977 में पटना के कदमकुआं स्थित चरखा समिति भवन में जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन मनाया जा रहा था। वहां बड़े समाजवादी नेताओं का जुटान हुआ था। भूत पूर्व पीएम चंद्रशेखर, नानाजी देशमुख जैसे नेता वहां आए थे। कर्पूरी ठाकुर तब बिहार के मुख्यमंत्री थे। जब वे वहां पहुंचे तो उनके कुर्ते पर चंद्रशेखर की नजर पड़ी। कुर्ता फटा हुआ था। चप्पल भी टूटी हुई थी। अचानक चंद्रशेखर उठे और अपने कुर्ते का अगला भाग फैला कर सबसे चंदा देने को कहा। उन्होंने कहा कि कर्पूरी जी के लिए कुर्ता फंड बनाना है। तत्काल कुछ लोगों ने उनके फाड़ में कुछ रुपये दिए। पैसा देते हुए चंद्रशेखर ने कहा कि कर्पूरी जी, इन रुपयों से अपने लिए एक कायदे का कुर्ता-धोती खरीद लीजिए। कर्पूरी ठाकुर ने पैसा ले लिया और कहा कि इसे हम मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा देंगे।







