लालू यादव खामोश हैं। नीतीश एक्शन मोड में हैं। हालात एक बार फिर 2017 जैसे हैं। चर्चा नए गठबंधन की है। ऐसे में हर जुबान पर बस एक ही सवाल है, क्या बिहार में नई सरकार बनने वाली है? पॉलिटिकल पार्टियों से लेकर आम जनता में ऐसे सवाल लाजिमी हैं, क्योंकि लालू की खामोशी ऐसे नहीं है।
वह जब भी खामोश हुए और नीतीश एक्शन में दिखे और कुछ न कुछ बड़ा हुआ है। अब तो पॉलिटिकल पार्टियों के प्रदेश कार्यालयों में खामोशी और उत्साह के भी मायने निकाले जा रहे हैं। हालांकि आरजेडी और जेडीयू के नेता अब भी कह रहे हैं कि गठबंधन पर कोई आंच नहीं है।
एक बार सोच लेते तो किसी की नहीं सुनते नीतीश
नीतीश कुमार जब एक्शन के मूड में होते हैं, किसी की नहीं सुनते हैं। वह अचानक से चौंकाने वाले फैसले लेते हैं। इस बार जेडीयू की कमान अपने हाथों में लेकर सभी को चौंका रखा है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश का यह एक्शन सामान्य घटना नहीं है। इसके पीछे बिहार से लेकर दिल्ली तक की बड़ी प्लानिंग है।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट की माने तो नीतीश के इस एक्शन को बिहार की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत मान रहे हैं। वह बताते हैं, यह बदलाव का संकेत है। नीतीश कुमार खुद अपने आप को चेंज कर सकते हैं। इसके साथ ही बिहार की जनता को न्यू ईयर का बड़ा गिफ्ट दे सकते हैं। बिहार में नया राजनीतिक गठबंधन सामने आ सकता है। एनडीए काे एक नया पार्टनर भी मिल सकता है।
नई सरकार की चर्चा की वजह जानिए
राजनितिक विश्लेषक मानते हैं, नीतीश कुमार एक लॉजिकल एंड पर ले जाएंगे। यह जो फाइट है, ललन सिंह के हटने या हटाने का या फिर खुद ऑफर करने का, इसका बैकग्राउंड तो एक सप्ताह पहले से चल रहा था। खुद ललन सिंह ने भी मीटिंग में कहा वह खुद 6 माह से हटने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री जी नहीं मान रहे थे।
मुंगेर में कैंपेन में परेशानी हो रही थी, वह टाइम नहीं दे पा रहे थे। अब जनता समझ रही थी कि एक सप्ताह से यह सब चल रहा है, लेकिन ललन सिंह के बयान से यह साफ हो गया कि 6 माह से यह प्रपोजल था। यानी यह पुरानी कहानी थी, जिसका अंत दिल्ली में हुआ। जेडीयू में बदलाव से ही बिहार में नए गठबंधन की चर्चा शुरू हुई है।
केसी त्यागी के बयान ने बढ़ाया सस्पेंस
नीतीश कुमार के हाथ जेडीयू की कमान आने के बाद केसी त्यागी के बयान ने राजनीतिक सस्पेंस बढ़ा दिया है। बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। इसमें बिहार की राजनीतिक भविष्य को देखा जा रहा है।
केसी त्यागी के बयान में बीजेपी से नजदीकियां साफ झलक रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम में दो तीन बातों पर गौर करने की बात करते हैं। इसमें नीतीश कुमार के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद केसी त्यागी के बयान को खास मानते हैं।
बिहार में बदलाव का बड़ा संकेत
केसी त्यागी के बयान को एक्सपर्ट बिहार में बदलाव का बड़ा संकेत मान रहे हैं। राजनितिक विश्लेषक बताते हैं, ऐसे बयान बदलाव की तरफ ले जाते हैं। यह एक इंडीकेशन है, जो धीरे-धीरे चल रहा है। जहां तक हमारी जानकारी है, जनता दल सूत्रों ने जो खबर दी है और बड़े नेताओं से बातचीत के आधार पर जो बाते सामने आई है, उससे यह पता चला है कि नीतीश कुमार और बीजेपी के बड़े नेताओं से बातचीत हो रही है।
15 जनवरी तक नए गठबंधन की भी बात कर रहे हैं। वह इसी लिए बिहार को न्यू ईयर गिफ्ट की बात कह रहे हैं। कल तक नीतीश के लिए बीजेपी का दरवाजा बंद करने जैसा बयान देने वालों के बदलाव के स्वर को भी बदलाव की कड़ी में जोड़ा जा रहा है।
अब बात लालू की खामोशी पर
एक्सपर्ट बताते हैं, लालू खामोश हैं। तेजस्वी ने नीतीश कुमार को बधाई दी है, लेकिन वह ललन सिंह को एक भी शब्द नहीं बोले। ललन सिंह ने अच्छा काम किया है। यह भी नहीं बोला कि ललन सिंह के नेतृत्व में जेडीयू और आरजेडी का को-ऑर्डिनेशन अच्छा रहा।
ललन सिंह काे लेकर तेजस्वी की यह खामोशी ही है, लेकिन लालू यादव तो अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं, उनकी खामोशी अलग है। लालू यादव देख रहे हैं, नीतीश कुमार क्या एप्रोच लेते हैं? इसके बाद ही लालू कुछ बोल पाएंगे। हालांकि सीधा आरोप ललन सिंह पर लगा, ललन सिंह ने इसका खंडन भी किया। लेकिन ऐसे आरोपों को लेकर भी लालू की खामोशी सवाल खड़े कर रही है?
बिहार की राजनीति को करीब से जानने वाले राजनितिक विश्लेषक भी इसी तरफ इशारा करते हैं। वो कहते हैं अभी महागठबंधन में बहुत चुप्पी है। नीतीश कुमार को लेकर बीजेपी, आरजेडी और कांग्रेस भी चुप है। अब नीतीश कुमार के सामने अपनी पार्टी को बचाने के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं है। अब आरजेडी के साथ संबंध सामान्य नहीं दिख रहा है। राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश कुमार को कोई जगह नहीं मिली, उन्हें किनारे कर दिया गया। अब खतरा पार्टी में टूट को लेकर है, इस कारण से उन्हें पार्टी की कमान भी संभालनी पड़ी है। परिस्थितियां तो यही कह रही हैं, बदलाव होने वाला है। विरोधी नेता भी खामोश हैं। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष का भी सुर बदला है।
2023 में बन गए 2017 जैसे हालात
पॉलिटिकल एक्सपर्ट बताते हैं, नीतीश कुमार 2017 की तरह एक्शन मोड में हैं। चर्चा वैसी ही है, जैसे 2017 में नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अलग हो गए थे। उस समय ईडी, सीबीआई और आयकर ने लालू यादव के यहां रेड किया था। इसमें तेजस्वी और तेज प्रताप का नाम आया था। तब नीतीश कुमार बार-बार बयान दे रहे थे, कि मैंने उनसे स्पष्टीकरण मांगा है। वह 10 दिन इंतजार भी किए, लेकिन अचानक एक्शन में आ गए और राजद के मंत्रियों को हटा दिया। तब नीतीश कुमार ने बयान भी दिया था कि स्पष्टीकरण मांगा था नहीं आया, हम भ्रष्ट्राचार के मुद्दे पर कोई समझौता करने वाले नहीं हैं।
एक्सपर्ट की माने तो ऐसी ही परिस्थिति मौजूदा हालात में भी बन रही है, तेजस्वी को 3 से 4 बार ईडी बुला चुकी है, अब 5 जनवरी को डेट है। लालू यादव को भी बुलाया गया है। ऐसे हालात में 2017 वाला हाल हो सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ऐसे ही हमेशा कड़ा और चौंकाने वाला फैसला लेते हैं।
पहली बार अध्यक्ष बने तो छोड़ दिया था साथ
राजनीतिक जानकारों का कहना है 2016 में शरद यादव के बाद जब नीतीश कुमार पहली बार जेडीयू के अध्यक्ष बने तो लालू यादव की आरजेडी सत्ता में थे। इस बार भी वही हालात हैं, वह पार्टी की कमान नीतीश के हाथ में है और लालू की पार्टी के साथ वह सत्ता में हैं। साल 2017 में वह एनडीए में चले गए थे।
इसके बाद बिहार में बीजेपी और जेडीयू की सरकार बनी थी। इस बार भी नीतीश कुमार के जेडीयू का अध्यक्ष बनते ही सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। हालांकि दिल्ली में हुई जेडीयू पदाधिकारियों की बैठक में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ किसी तरह की बातचीत नहीं होने की बात कही है, लेकिन मौजूदा हालात ऐसे हैं जो चर्चा का बाजार गर्म कर रहे हैं।
4 माह से पार्टी को स्कैन कर रहे थे नीतीश
राजनितिक विश्लेषक मानते हैं की, नीतीश कुमार 4 माह से पार्टी को स्कैन कर रहे थे। जब तेजस्वी को सीएम बनाने की हवा तभी उड़ी तो नीतीश एक्टिव हो गए थे। हालांकि पहले खुद नीतीश कुमार तेजस्वी को लेकर यह बात बोलते थे, लेकिन उस समय वह प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ रहे थे।
बिहार से जब एलायंस बनी तो भी वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ही आगे बढ़ते हुए नजर आ रहे थे, लेकिन रास्ते में बाधा आने लगी और इधर तेजस्वी के सीएम बनने की चर्चा तेज हो गई। ऐसे में नीतीश कुमार ने पार्टी को गोपनीय स्तर से स्कैन करना शुरु कर दिया।
कार्यकर्ताओं के साथ हर लेबल पर बैठक की और पूरा निचोड़ निकाला। बैठक भी ऐसी होती रही जिसमें मीडिया तक को प्रतिबंधित किया गया। ऐसे में माना जा सकता है कि जो घटनाक्रम हुए हैं, इसकी तैयारी 4 से 5 माह पहले से ही चल रही थी। इसके लिए नीतीश कुमार गोपनीय स्तर पर काम कर रहे थे।
पार्टी कार्यालयों में कहीं खुशी तो कहीं गम
पार्टी कार्यालयों में कहीं खुशी कहीं गम के हालात हैं। जेडीयू में बदलाव के बाद भाजपा कार्यालय में अचानक से रौनक बढ़ी है। राजद कार्यालय में ठंड के साथ पॉलिटिकल असर भी दिख रहा है।
हालांकि जेडीयू में कोई खास असर नहीं दिख रहा है, लेकिन नीतीश के अध्यक्ष बनने पर पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश है। हालात 2017 की याद ताजा कर रहे हैं। पार्टी कार्यालयों में नेताओं के बीच भी अलग-अलग चर्चाएं बढ़ी हैं।







