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बिहार जातीय जनगणना: नीतीश की बाजीगरी और लालू के दांव पेच से कैसे पार पाएगी बीजेपी

UB India News by UB India News
August 31, 2023
in पटना, बिहार
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बिहार जातीय जनगणना: नीतीश की बाजीगरी और लालू के दांव पेच से कैसे पार पाएगी बीजेपी
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जातीय जनगणना का अब पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है। ये महागठबंधन के लिए आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए मुद्दा बनते जा रहा है। इस वजह से उसकी आक्रामकता कहीं न कहीं पिछड़ा समाज को अपने पक्ष में करने की हो रही है। वहीं बीजेपी ने भी जातीय जनगणना को एक पक्षीय मुद्दा बनने के विरुद्ध खुद को खड़ा भी कर लिया है। इसके प्रथम चरण में केंद्र सरकार ने जो हलफनामा दर्ज किया था अब यू टर्न लेते हुए बिहार सरकार के सर्वे के साथ खड़ी हो गई है। बीजेपी को समझ में नहीं आ रहा है कि कोर्ट से महागठबंधन की सरकार को क्लीन चिट मिल जाने के बाद जनगणना को लेकर उनका स्टैंड क्या होना चाहिए। बीजेपी को पता है कि बिहार की राजनीतिक जमीन पर हमेशा जातीय समीकरण की खेती होती है।

भाजपा का दूसरा हलफनामा
दरअसल, बिहार से शुरू हुई जातीय जनगणना नमो नीत सरकार के बरक्स मुसीबतों का पहाड़ जैसा होते जा रहा था। बिहार से उठी ये लहर अन्य राज्यों के लिए जरूरी बनते जा रहा था। वैसे में इस मुद्दे के साथ परोक्ष या अपरोक्ष रूप से खड़े रहना बीजेपी की मजबूरी भी थी। यही वजह है कि जातीय सर्वे को लेकर केंद्र सरकार ने यू-टर्न लिया। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने पहले हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा था कि ये अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। हलफनामे के पैरा 5 में लिखा था, जनगणना कानून, 1948 के तहत केंद्र सरकार के अलावा किसी और सरकार को जनगणना कराने या वैसी मिलती-जुलती प्रक्रिया को अंजाम देने का अधिकार नहीं है। लेकिन जैसा कि पहले बताया कि जातीय जनगणना एक सामाजिक मुद्दे से इतर पूरी तरह से राजनीतिक हो चला है सो बीजेपी ने अपने दूसरे हलफनामे में साफ कहा कि सरकार जातीय सर्वे करा सकती है।

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क्या वजह है भाजपा के यू टर्न की
एक कहावत है कि दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पिता है। बीजेपी की हालत भी वैसी ही हैं। बीजेपी को याद आ गया है 2015 का विधान सभा चुनाव। जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान को जिसमे उन्होंने आरक्षण की समीक्षा की जरूरत पर फोकस कर विचार रखे थे। मोहन भागवत के उस बयान को राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने इस कदर प्रचारित किया कि बीजेपी आरक्षण समाप्त कर देगी। जब चुनाव परिणाम आए तो लालू प्रसाद के उस बात पर अधिकांश जनता ने मुहर लगा दी जो असंभव था। ये लालू प्रसाद और नीतीश कुमार भी जानते थे कि आरक्षण एक संविधान प्रदत्त सुविधा है उसे कोई नही छीन सकता। सो, जनगणना के प्रति कहीं लालू प्रसाद एक बार फिर यह न कहने लगे कि बीजेपी जनगणना का इसलिए विरोध कर रही है कि पिछड़ों को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण नहीं देना चाहती है। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व भी सबका साथ सबका विकास के फार्मूले पर आगामी चुनाव में उतरना चाह रही हैं।

बीजेपी की मूल राजनीति में बदलाव
वैसे आज की बीजेपी बनियों और सवर्णों की पार्टी भी नहीं रही। भाजपा में पिछड़ा और अति पिछड़ा बाद के उदाहरण हैं नरेंद्र मोदी। इसलिए अब भाजपा भी चाहती है कि जनगणना के बाद जो असली स्वरूप सामने आए उस से जुड़ना जितनी जल्दी हो सके हो जाए। ऐसा इसलिए भी कि राजद की जो मूल राजनीति यादव और मुस्लिम वोट पर आधारित हो चुकी है ऐसे में ये सही समय है जब यादव माइनस शेष पिछड़ावाद की राजनीति को भाजपा साध ले।

भाजपा ने डाल दी है कई पेंच
यह दीगर कि भाजपा बिहार सरकार के द्वारा कराई जा रही सर्वे के साथ खड़ी है ,पर इस सर्वे को समृद्ध करने के बहाने कुछ पेंच जरूर लगा दी है। भाजपा के फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह ने जातीय जनगणना को ले कर अपनी मांग रख दी है कि मुस्लिम समुदाय समेत तमाम अल्पसंख्यक की भी जातीय जनगणना की जानी चाहिए। उनकी इस मांग के बाद बिहार की सियासी समीकरण में उबाल आ गया। दरअसल उनकी मांग के पीछे उनका उद्देश्य स्पष्ट है कि बांग्लादेशी मुसलमानों ने अवैध ढंग से भारत की नागरिकता प्राप्त की है। उनका इशारा है कि बिहार के सीमांचल में अवैध नागरिकता के जरिए बसे मुसलमानों पर भी सबसे पहले ध्यान होना चाहिए। सबसे पहले उनका सर्वेक्षण हो और उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाए।

सुशील मोदी ने भी फंसाए पेंच
राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी ने भी राज्य सरकार को सुझाव देते कहा कि बिहार सरकार को कर्नाटक और तेलंगाना टीम भेजकर अध्ययन कराना चाहिए कि इन दोनों राज्यों ने किस प्रकार जातीय गणना कराई थी। साथ ही इस बात का भी अध्ययन कराना चाहिए कि 2011 की सामाजिक, आर्थिक, जातीय गणना में क्या त्रुटियां थी कि केंद्र सरकार जाति के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करा पाई।

क्या है लालू यादव की मंशा
दरअसल, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जातीय जनगणना के प्रति काफी आक्रामक है और वे चाहते हैं कि जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिले। यह प्रतिशत क्यों न 50 से भी ऊपर चला जाए। इसके पीछे लालू प्रसाद यादव की राजनीति बड़ी स्पष्ट है। उनका मानना है कि राजद अभी वह पार्टी है जिसे यादव और मुस्लिम का साथ हैं। जबकि एक समय था कि लालू यादव पिछड़ों और दलितों के लिए मसीहा कहे जाते थे। नीतीश कुमार जब उनसे अलग हुए तो वे माइनस यादव पिछड़ी जाति की राजनीति के साथ तमाम पिछड़ों के साथ निकल कर भाजपा के साथ आए और लालू यादव को सत्ता से हटा कर एनडीए की सरकार बनाने में सफल हुए। अब लालू यादव लगातार तेजस्वी यादव की राजनीति को मजबूत करने को लेकर आक्रामक बैटिंग इस लिए कर रहे हैं कि तेजस्वी की आगे की राजनीति दुरुस्त हो सके। इसलिए वो जातीय जनगणना को ले कर काफी आक्रामक भी हैं।

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