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कांग्रेस युक्त गठबंधन से कांग्रेस को परहेज क्यों है?

UB India News by UB India News
June 10, 2023
in पटना, राष्ट्रीय
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विपक्षी दलों की बैठक की नई तारीख का ऐलान , पटना में 23 जून को होगी विपक्षी दलों की बैठक
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विपक्षी एकता की मुहिम में लगे राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने शुरुआती दौर में ही यह साफ कह दिया था कि उनकी इच्छा कांग्रेस युक्त गठबंधन की है। वह भी वन फ्रंट के रूप में। नीतीश कुमार की इस स्पष्टवादिता को ले कर तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर काफी दुखी हुए। यहीं से वन फ्रंट बनाम थर्ड फ्रंट की नींव पड़ी। जहां यह सोच भी स्पष्ट थी कि भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय पार्टी के बिना क्षेत्रीय दल मिल कर थर्ड फ्रंट बनाए। पर हैरत भरी बात तो ये है कि कांग्रेस युक्त गठबंधन से कांग्रेस को परहेज क्यों है?

कांग्रेस अपनी चुनावी रणनीति के साथ हिमाचल और अब कर्नाटक विधानसभा की जीत के बाद काफी उत्साहित है। कांग्रेस के भीतर अब यह स्वर उठने लगा है कि बीजेपी की उलटी गिनती शुरू हो गई है। राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस एक मात्र विकल्प है। रही पीएम उम्मीदवार की बात तो कांग्रेस के पास तो घोषित उम्मीदवार पहले से है। ऐसे में नीतीश कुमार के नेतृत्व में कांग्रेस का असहज होने के कई कारण हैं।

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कांग्रेस के असहज होने के कारण
उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस के असहज होने के कई कारण भी है। कांग्रेस का बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के प्लेटफार्म पर एक साथ आने के कई खतरे हैं। सबसे पहले तो सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस को काफी उदार होना पड़ेगा। कांग्रेस के लिए यह कार्य कठिन है। सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़ना चाहेगी। ताकि उसकी सीटें लोकसभा में ज्यादा हो। समाजवादी और बसपा के रहते संभव नहीं है। हिंदी बेल्ट में बढ़ते प्रभाव के कारण कांग्रेस अकेले चुनाव में जाने पर विचार भी कर रही है। मिली जानकारी के अनुसार बिहार में भी कांग्रेस का इंटरनल सर्वे काफी उत्साहजनक है। गत लोकसभा चुनाव में भी एनडीए के अलावा एक सीट कांग्रेस को ही मिली थी।

मुस्लिम वोटों पर भरोसा
कांग्रेस को मुस्लिम मतों का भरोसा है और भाजपा से निराश सवर्ण मतों का भी। इस ले कर हिंदी बेल्ट में कांग्रेस सम्मानजनक समझौता की उम्मीद वन फ्रंट में नहीं दिखती। कांग्रेस के भीतर खाने की बात करें तो वह बिहार की 10 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। ये वन फ्रंट में संभव नहीं। 40 में तो 16 लोकसभा पर जदयू का सीटिंग सीट है। 16 पर राजद भी लड़ेगी तो मात्र 8 सीट में कांग्रेस, वाम दल, हम को कैसे संतुष्ट किया जा सकेगा।

दिल्ली और पंजाब
दिल्ली और पंजाब में भी कांग्रेस आज की स्थिति में ‘आप’ के साथ मंच साझा करने से बचना चाहती है। पंजाब और दिल्ली के कांग्रेस नेताओं ने आलाकमान तक यह संदेश पहुंचा ही दिया है कि ‘आप’ के साथ खड़े होने पर गलत संदेश जाएगा। खास कर तब जब ‘आप’ के सक्रिय नेता व सांसद ने ये कहा था कि आगामी चुनाव ‘आप’ के नेता अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। ऐसे में कांग्रेस सहज नहीं हो पा रही है।

बंगाल में ममता के साथ असहज
पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस को दिक्कत है। कांग्रेस के विरुद्ध ही तृणमूल कांग्रेस का जन्म हुआ है। हाल में ही कांग्रेस के एक विधायक को तृणमूल में मिला कर कांग्रेस को असहज कर दिया है। तेलंगाना के सीएम केसीआर कांग्रेस के साथ नहीं खड़ा होना चाहते हैं। उनकी पूरी लड़ाई ही कांग्रेस के विरुद्ध ही है। शरद पवार को पीएम उम्मीदवार के रूप में खुद नीतीश कुमार ही प्रोजेक्ट कर चुके हैं।

महागठबंधन में कई पीएम उम्मीदवारों
महागठबंधन के भीतर एक सवाल तो अभी भी है कि पीएम के उम्मीदवार कौन होंगे। जदयू कार्यकर्ताओं के अतिउत्साह में नीतीश कुमार भी पीएम उम्मीदवार हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की नजर में नीतीश कुमार पीएम उम्मीदवार हैं। आप के संजय सिंह कह चुके हैं कि अगला लोकसभा चुनाव केजरीवाल के नेतृत्व में लड़ा जाएगी। तेलंगाना ने भाजपा के विरोधियों का तो जमावड़ा ही लगाया। आज नरेंद्र मोदी विगत 9 वर्षों से प्रधानमंत्री हैं, वे भी तो गुजरात के सीएम थे। नीतीश कुमार ,अरविंद केजरीवाल, केसीआर भी मुख्यमंत्री तो हैं।

कई सवाल हवा में तैर रहे हैं
बहरहाल ,12 जून को स्थगित की गई विपक्षी एकता की बैठक को एक नई तारीख 23 जून मिल गई है। इस 23 तारीख को वो भी विपक्षी दल एक धरातल पर विचार विमर्श करेंगे जिनकी उत्पत्ति ही कांग्रेस के आपातकाल के विरोध में हुई है। विरोधाभास तो अभी भी कई स्तर पर दिख रहा है। गत लोकसभा में कांग्रेस 411 लोक सभा सीट पर लड़ी थी। अब विपक्षी एकता के दरवाजे इतनी उदार होगी कि 18 दल सम्मानजनक सीटों के साथ लड़ सकें। लेकिन कुछ सवाल तो अभी भी हैं। मसलन ,अरविंद केजरीवाल ने राज्यसभा में जब एक अध्यादेश के समर्थन में कांग्रेस से संपर्क साधा तो कांग्रेस ने अपनी सहमति नहीं दी। सवाल तो यह भी है कि क्या एक सीट पर विपक्ष का एक उम्मीदवार की रणनीति पर सहमति हो गई है ? क्या जिस ममता बनर्जी ने अपने प्रभाव से कांग्रेस के एकमात्र विधायक को तृणमूल में मिला लिया ,कांग्रेस ममता बनर्जी के साथ चुनावी रिश्ता प्रगाढ़ करेगी ? इन सब सवालों का उत्तर शायद 23 जून की बैठक में ढूंढा जायेगा!

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