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क्या धार खो रहा है मोदी का सबसे बड़ा हथियार?

UB India News by UB India News
May 23, 2023
in Lokshbha2024, ब्लॉग
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क्या धार खो रहा है मोदी का सबसे बड़ा हथियार?
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लोकसभा चुनाव में करीब एक साल का वक्त रह गया है। इस बीच कर्नाटक चुनाव में बीजेपी को मिली हार के बाद भगवा दल बैकफुट पर है। कभी डबल इंजन की सरकार के मजबूत नारे के साथ विधानसभा चुनाव जीते वाली बीजेपी का स्लोगन अब अपनी चमक खो रहा है?

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और पीएम नरेंद्र मोदी अपने तरकश में स्लोगन वाले भारी-भरकम अस्त्र के लिए जाने जाते रहे हैं। ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ या फिर ‘डबल इंजन की सरकार’ जैसे स्लोगन 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद बीजेपी की जीत में खूब चले थे। ये वादे और स्लोगन उसके बाद महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों के चुनावों में जमकर चले। इन स्लोगनों का मतलब ये निकला कि अगर राज्य और केंद्र दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार है तो विकास का पहिया दो ट्रैक पर दौड़ते रेल की तरह तेजी से भागेगा। अगर ऐसा नहीं होगा तो इंजन पटरी से उतर भी सकती है। हालांकि, हिमाचल और कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भगवा दल को तगड़ा झटका दिया है। पिछले 5 साल में जहां बीजेपी के करीब दर्जनभर राज्यों में सीएम थे वहीं अब उत्तर पूर्व को छोड़ दें तो ये घटकर महज 6 (यूपी, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और गुजरात) रह गया है। तो क्या डबल इंजन की सरकार वाला नारा फीका हो रहा है? आइए समझते हैं।

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इस स्लोगन के जरिए बीजेपी ने कई राज्यों में हासिल की सत्ता
‘डबल इंजन की सरकार’ वाला स्लोगन तो 2014 के राज्य चुनावों में तो जमकर चला। बीजेपी ने महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा में जीत दर्ज की और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन करके सरकार बना ली। हालांकि, इन जीतों के पीछे डबल इंज की सरकार वाला स्लोगन काम नहीं किया था बल्कि इन राज्यों में जीत के पीछे कई और स्थानीय कारण भी रहें। जैसे बीजेपी ने आदिवासी बहुल राज्य झारखंड में ओबीसी सीएम पर दांव खेला। हरियाणा में गैर जाट और गैर बिश्नोई सीएम चेहरा लाई। इसका फायदा भगवा दल को मिला। ऐसी स्थिति में विपक्षी दल के मुख्यमंत्री को चतुर और विनम्र दोनों होना होगा। जैसे ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक हों या फिर आंध्रप्रदेश के सीएम वाईएस जगन मोहन रेड्डी। ये दोनों नेता केंद्र को खुश रखते हुए अपनी इंजन को आराम से चला रहे हैं।

संघीय भावना के लिए खतरा!
तो क्या डबल इंजन की सरकार वाला स्लोगन मजबूत केंद्र और राज्यों के ताकतवर नेताओं के लिए खतरा है? इसमें कोई शक नही कि देश ने दशकों के बाद एक बेहद ताकतवर सरकार के लिए अपना वोट दिया था। जो गठबंधन सरकारों से तंग आ गई थी। हालांकि, ताकतवर सरकार के आने के बाद एक नई बहस भी सामने आ गई। इसमें केंद्र और राज्यों के बीच एक संशय के बादल भी बने। हालांकि, कर्नाटक के नतीजा आने के बाद बीजेपी के स्लोगनों पर अब संशय के बाद छा गए हैं। पूरी ताकत झोंकने के बाद भी कर्नाटक में पार्टी की बड़ी हार के बाद सवाल उठने तो लाजिमी है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने मणिपुर हिंसा के दौरान एक ट्वीट किया था कि मणिपुर में देखिए डबल इंजन की सरकार का नुकसान। दोनों इंजन फेल हो गई है। राज्य में जल रहा है। दरअसल, चिदंबरम का ट्वीट कर्नाटक के वोटरों के लिए चेतावनी के तौर पर था कि देखिए डबल इंजन की सरकार का हश्र मणिपुर में देख लीजिए

हिमाचल और कर्नाटक में बीजेपी का स्लोगन फेल
चाहे हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव हो या फिर कर्नाटक का, बीजेपी ने दोनों जगह डबल इंजन की सरकार का स्लोगन खूब उछाला था। लेकिन इन सबके बाद भी हिमाचल में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। कर्नाटक में भी पार्टी को सरकार विरोधी लहर का सामना करना पड़ा। केंद्र के काम करने का लाभ बासवराज बोम्मई सरकार उठा नहीं पाई। वास्तव में ये सिंगल इंजन की सरकार है जो मोदी के व्यक्तित्व के आसपास घूम रहा है। उनका करिश्मा और भाषण की शैली को बीजेपी जीता की गारंटी मानती रही है।

मोदी के करिश्मे की भी सीमा है
ये जरूरी है कि बीजेपी 2019 में झारखंड वाली हार से कुछ सबक सीखे। इस चुनाव में पार्टी को यूपीए गठबंधन से मात मिली थी। पूर्व सीएम रघुवर दास के काम और उनके खिलाफ माहौल से बीजेपी को नुकसान हुआ था। यही नहीं, बीजेपी को ये भी समझना होगा कि मोदी के चेहरे पर जीतने की भी एक सीमा होती है।

अब बीजेपी के सामने है बड़ी मुश्किल
कर्नाटक में हार के बाद अब बीजेपी के सामने बड़ी मुश्किल है। पहली मुश्किल तो मध्य प्रदेश में फिर से सरकार बनाना। दूसरी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति से छीनकर भगवा दल की सरकार बनाना। ये जरूर है कि डबल इंजन वाला स्लोगन यहां भी जरूर दोहराया जाएगा। मध्य प्रदेश में बीजेपी को सत्ता विरोधी लहर के बीच कुछ करिश्मा करना होगा वहीं, राजस्थान में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी के कारण भगवा दल के लिए यहां जीत आसान हो सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में मजबूत क्षेत्रीय नेताओं का कब्जा है। यहां बीजेपी के लिए राहें आसान नहीं होने वाली है।

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