बिहार में चुनाव बीते 9 महीने होने को हैं, लेकिन सियासी सरगर्मी खत्म होने का नाम नहीं ले रही. पहले राज्यसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी रही, फिर बांकीपुर उपचुनाव आ गया. इस बीच राजनीतिक बहसों के दूसरे मुद्दे भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए सहज ही मिलते रहे, जिन पर चर्चाएं चलती रहीं. अब एक नई बहस इस बात को लेकर छिड़ी है कि आरजेडी में बड़ी टूट होने वाली है. सत्ता पक्ष के लोग ऐसा कहें तो कोई आश्चर्य नहीं, लेकिन ऐसी आवाज जब किसी पार्टी के भीतर से आए तो उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीतर से ही इन दिनों ऐसी ही आवाजें निकल रही हैं. भाई वीरेंद्र ने शक्ति यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. रोहिणी आचार्य लगातार पार्टी की गतिविधियों पर तंज कसती रहती हैं. हाल ही में राजद के अच्छे प्रवक्ताओं में शुमार मृत्युंजय तिवारी इस्तीफा देकर भाजपा का हिस्सा बने हैं. कई अन्य नेताओं ने भी हाल के दिनों में राजद से इस्तीफा दिया है.
मृत्युंजय तिवारी का दावा
मृत्युंजय तिवारी का दावा किया है कि राजद के कुल 25 विधायकों में से 15-16 कभी भी पाला बदल सकते हैं. इस्तीफा देते वक्त उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं का सम्मान नहीं रह गया है. बाद में उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली. उनके इस्तीफे की वजह राजद नेता और तेजस्वी के करीबी शक्ति सिंह यादव बने. मृत्युंजय तिवारी के दावे पर भरोसे की वजह यह है कि वर्षों तक राजद में रहने के कारण उनके अच्छे संबंध राजद के विधायकों और दूसरे नेताओं से हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राजद के कुल 25 विधायकों में करीब डेढ़ दर्जन ऐसे हैं, जो पहली बार विधायक बने हैं. चुनाव लड़ते वक्त यकीनन इनका सपना अपनी सरकार बनने का रहा होगा. यह सपना भी उन्होंने अपने मन से नहीं देखा होगा. लालू यादव और तेजस्वी यादव के लोकलुभावन वादे और सरकार बनाने के दावे से इनमें भरोसा जगा होगा. पर, ऐसा नहीं हो पाया. उल्टे राजद की ही हालत इतनी खराब हो गई कि 2020 के 75 विधायकों से 2025 में संख्या घट कर 25 पर आ गई. यानी सत्ता सुख के लोभ में आए इन विधायकों को कमजोर विपक्ष की परेशानियों से जरूर दो-चार होना पड़ रहा होगा. ऐसे में उन्हें सत्ता सुख का मौका मिलेगा तो वे जरूर उसका लाभ उठाना चाहेंगे.
मृत्युंजय तिवारी का दावा किया है कि राजद के कुल 25 विधायकों में से 15-16 कभी भी पाला बदल सकते हैं. इस्तीफा देते वक्त उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं का सम्मान नहीं रह गया है. बाद में उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली. उनके इस्तीफे की वजह राजद नेता और तेजस्वी के करीबी शक्ति सिंह यादव बने. मृत्युंजय तिवारी के दावे पर भरोसे की वजह यह है कि वर्षों तक राजद में रहने के कारण उनके अच्छे संबंध राजद के विधायकों और दूसरे नेताओं से हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राजद के कुल 25 विधायकों में करीब डेढ़ दर्जन ऐसे हैं, जो पहली बार विधायक बने हैं. चुनाव लड़ते वक्त यकीनन इनका सपना अपनी सरकार बनने का रहा होगा. यह सपना भी उन्होंने अपने मन से नहीं देखा होगा. लालू यादव और तेजस्वी यादव के लोकलुभावन वादे और सरकार बनाने के दावे से इनमें भरोसा जगा होगा. पर, ऐसा नहीं हो पाया. उल्टे राजद की ही हालत इतनी खराब हो गई कि 2020 के 75 विधायकों से 2025 में संख्या घट कर 25 पर आ गई. यानी सत्ता सुख के लोभ में आए इन विधायकों को कमजोर विपक्ष की परेशानियों से जरूर दो-चार होना पड़ रहा होगा. ऐसे में उन्हें सत्ता सुख का मौका मिलेगा तो वे जरूर उसका लाभ उठाना चाहेंगे.
फैसल दिखा चुके हैं ट्रेलर
भाजपा के पवन जयसवाल को हरा कर ढाका से राजद के विधायक बने फैसल रहमान पार्टी में टूट का ट्रेलर दिखा चुके हैं. रहमान पहली बार विधायक बने हैं. राज्यसभा चुनाव में वे महागठबंधन (इंडिया) समर्थित राजद उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने नहीं पहुंचे. हालांकि एआईएमआईएम के विधायकों को पटाकर जीत के लिए जरूरी 41 मतों का बंदोबस्त तेजस्वी यादव ने कर लिया था. फैसल के वोट की राजद को इसलिए पक्की उम्मीद रही होगी, क्योंकि वे मुस्लिम समुदाय से आते हैं और राजद को अपने मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण पर पूरा भरोसा रहा है. राजद को गच्चा देने का उन्हें पुरस्कार भी एनडीए ने दे दिया. उन्हें विधानसभा की गैर-सरकारी विधेयक एवं संकल्प समिति का चेयरमैन बना दिया गया.
भाजपा के पवन जयसवाल को हरा कर ढाका से राजद के विधायक बने फैसल रहमान पार्टी में टूट का ट्रेलर दिखा चुके हैं. रहमान पहली बार विधायक बने हैं. राज्यसभा चुनाव में वे महागठबंधन (इंडिया) समर्थित राजद उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने नहीं पहुंचे. हालांकि एआईएमआईएम के विधायकों को पटाकर जीत के लिए जरूरी 41 मतों का बंदोबस्त तेजस्वी यादव ने कर लिया था. फैसल के वोट की राजद को इसलिए पक्की उम्मीद रही होगी, क्योंकि वे मुस्लिम समुदाय से आते हैं और राजद को अपने मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण पर पूरा भरोसा रहा है. राजद को गच्चा देने का उन्हें पुरस्कार भी एनडीए ने दे दिया. उन्हें विधानसभा की गैर-सरकारी विधेयक एवं संकल्प समिति का चेयरमैन बना दिया गया.
रहमान पर कार्रवाई नहीं
जाहिर तौर पर यह तेजस्वी को नागवार लगा होगा, लेकिन उन्होंने फैसल के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई से परहेज किया. ऐसा करने के पीछे तेजस्वी की अपनी मजबूरी है. मुख्यमंत्री न बन पाने का मलाल मिटाने के लिए उन्होंने कम से कम नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी ही मुनासिब समझी, जिससे सत्ता सुख का एहसास होता रहे. संयोग से राजद के पास उतने ही विधायक थे, जितने में नेता प्रतिपक्ष के लिए पार्टी का दावा बन सके. राजद के 25 विधायकों में एक की भी कमी से उनकी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी अपने आप चली जाएगी. कुर्सी के लिए उनकी बेचैनी का आलम यह रहा कि विधायकी की शपथ लेने से पहले ही उन्होंने अपने को सदन का नेता बनने का प्रस्ताव पास करा लिया. उन्हें पार्टी की बुरी हार की समीक्षा भी जरूरी नहीं लगी. अगर उन्होंने पार्टी लाइन की अवहेलना के आरोप में फैसल रहमान के निष्कासन की कार्रवाई की तो नेता प्रतिपक्ष की उनकी कुर्सी चली जाएगी.
जाहिर तौर पर यह तेजस्वी को नागवार लगा होगा, लेकिन उन्होंने फैसल के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई से परहेज किया. ऐसा करने के पीछे तेजस्वी की अपनी मजबूरी है. मुख्यमंत्री न बन पाने का मलाल मिटाने के लिए उन्होंने कम से कम नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी ही मुनासिब समझी, जिससे सत्ता सुख का एहसास होता रहे. संयोग से राजद के पास उतने ही विधायक थे, जितने में नेता प्रतिपक्ष के लिए पार्टी का दावा बन सके. राजद के 25 विधायकों में एक की भी कमी से उनकी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी अपने आप चली जाएगी. कुर्सी के लिए उनकी बेचैनी का आलम यह रहा कि विधायकी की शपथ लेने से पहले ही उन्होंने अपने को सदन का नेता बनने का प्रस्ताव पास करा लिया. उन्हें पार्टी की बुरी हार की समीक्षा भी जरूरी नहीं लगी. अगर उन्होंने पार्टी लाइन की अवहेलना के आरोप में फैसल रहमान के निष्कासन की कार्रवाई की तो नेता प्रतिपक्ष की उनकी कुर्सी चली जाएगी.
घर में ही एक नहीं राजद
यह सभी जानते हैं कि राजद पारिवारिक पार्टी है और इसके संस्थापक लालू यादव हैं. लालू ने अपनी सियासी शक्ति का इस्तेमाल कर पत्नी राबड़ी देवी को पहले सीएम बनाया और बाद में एमएलसी बनाकर उसकी वजह से मिलने वाले सरकारी लाभ का सुख भोग रहे हैं. इनके अलावा अपने दोनों बेटों- तेजस्वी और तेज प्रताप को उन्होंने सीधे सियासत में उतार कर पहली बार में ही सीएम और मिनिस्टर बनवा दिया. एक बेटी पहले ही सांसद बन चुकी थीं, बाद में उन्होंने एक और बेटी रोहिणी आचार्य को भी सांसदी का चुनाव लड़वा दिया. इतना समृद्ध सियासी साम्राज्य खड़ा करने के बावजूद लालू अपने परिवार को एक नहीं रख पाए. परिवार की अनबन की आवाज तो अब सड़कों पर गूंज रही है. इसके दृश्य भी सोशल मीडिया के जरिए सार्वजनिक हो चुके हैं.
यह सभी जानते हैं कि राजद पारिवारिक पार्टी है और इसके संस्थापक लालू यादव हैं. लालू ने अपनी सियासी शक्ति का इस्तेमाल कर पत्नी राबड़ी देवी को पहले सीएम बनाया और बाद में एमएलसी बनाकर उसकी वजह से मिलने वाले सरकारी लाभ का सुख भोग रहे हैं. इनके अलावा अपने दोनों बेटों- तेजस्वी और तेज प्रताप को उन्होंने सीधे सियासत में उतार कर पहली बार में ही सीएम और मिनिस्टर बनवा दिया. एक बेटी पहले ही सांसद बन चुकी थीं, बाद में उन्होंने एक और बेटी रोहिणी आचार्य को भी सांसदी का चुनाव लड़वा दिया. इतना समृद्ध सियासी साम्राज्य खड़ा करने के बावजूद लालू अपने परिवार को एक नहीं रख पाए. परिवार की अनबन की आवाज तो अब सड़कों पर गूंज रही है. इसके दृश्य भी सोशल मीडिया के जरिए सार्वजनिक हो चुके हैं.
तेज प्रताप की अलग राह
बड़े बेटे तेज प्रताप के विवाहेतर प्रेम प्रसंग का जब भांडा फूटा तो लालू ने आनन-फानन उन्हें परिवार और पार्टी से निकाल बाहर किया. हालांकि यह सिर्फ कहने के लिए था. वे आखिर तक राजद के विधायक बने रहे. राजद ने उनके निष्कासन का ऐलान तो किया, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष को इसकी सूचना ही नहीं दी. परिवार से निकालने का अर्थ इतना भर रहा कि वे अलग रहने लगे. हालांकि पारिवारिक कार्यक्रमों में वे शामिल होते रहे. अपने निष्कासन का ठीकरा उन्होंने तेजस्वी के करीबियों पर फोड़ा. उन्हें जयचंद करार दिया. चुनाव में राजद की हार पर दुखी होने के बजाय तेज प्रताप इतराते रहे. इसके लिए भी उन्होंने जयचंदों को ही जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने खुल कर संजय यादव और सुनील सिंह का नाम लिया. तेज प्रताप के इस आचरण से परिवार में खटपट का साफ पता चलता है.
बड़े बेटे तेज प्रताप के विवाहेतर प्रेम प्रसंग का जब भांडा फूटा तो लालू ने आनन-फानन उन्हें परिवार और पार्टी से निकाल बाहर किया. हालांकि यह सिर्फ कहने के लिए था. वे आखिर तक राजद के विधायक बने रहे. राजद ने उनके निष्कासन का ऐलान तो किया, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष को इसकी सूचना ही नहीं दी. परिवार से निकालने का अर्थ इतना भर रहा कि वे अलग रहने लगे. हालांकि पारिवारिक कार्यक्रमों में वे शामिल होते रहे. अपने निष्कासन का ठीकरा उन्होंने तेजस्वी के करीबियों पर फोड़ा. उन्हें जयचंद करार दिया. चुनाव में राजद की हार पर दुखी होने के बजाय तेज प्रताप इतराते रहे. इसके लिए भी उन्होंने जयचंदों को ही जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने खुल कर संजय यादव और सुनील सिंह का नाम लिया. तेज प्रताप के इस आचरण से परिवार में खटपट का साफ पता चलता है.
रोहिणी के अजीब आरोप
लालू को अपनी किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य तो तेजस्वी के रवैये से इतनी खफा हुई कि उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तेजस्वी की खूब लानत-मलामत की. यह सिलसिला विधानसभा चुनाव के पहले शुरू हुआ और अब तक जारी है. चुनाव नतीजे आने के बाद रोहिणी के साथ जो दुर्व्यवहार घर में हुआ, उसे उन्होंने रोते हुए मीडिया के सामने उजागर किया. उन्होंने अपने ऊपर चप्पल चलाए जाने का आरोप लगाया. इतना ही नहीं, रात में ही उन्होंने राबड़ी आवास भी छोड़ दिया. रोहिणी को इस बात से कोफ्त रही है कि पार्टी और परिवार में संजय यादव और रमीज जैसे लोगों की दखलंदाजी हो रही है.
लालू को अपनी किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य तो तेजस्वी के रवैये से इतनी खफा हुई कि उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तेजस्वी की खूब लानत-मलामत की. यह सिलसिला विधानसभा चुनाव के पहले शुरू हुआ और अब तक जारी है. चुनाव नतीजे आने के बाद रोहिणी के साथ जो दुर्व्यवहार घर में हुआ, उसे उन्होंने रोते हुए मीडिया के सामने उजागर किया. उन्होंने अपने ऊपर चप्पल चलाए जाने का आरोप लगाया. इतना ही नहीं, रात में ही उन्होंने राबड़ी आवास भी छोड़ दिया. रोहिणी को इस बात से कोफ्त रही है कि पार्टी और परिवार में संजय यादव और रमीज जैसे लोगों की दखलंदाजी हो रही है.
तेजस्वी भी हो गए अलर्ट
राजद में टूट के खतरे का अंदेशा तेजस्वी को भी हो गया है. यही वजह है कि विदेश से लौटते ही तेजस्वी ने पार्टी नेताओं के साथ बैठक की. सांगठनिक प्रकोष्ठों और समितियों को भंग किया. सांसदों-विधायकों के साथ बैठक कर नेताओं को सक्रिय होने का निर्देश दिया. तेजस्वी जिस तरह सक्रिय दिख रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि उन्हें भी खतरे का एहसास होने लगा है. मृत्यंजय तिवारी के दावे और शक्ति यादव के खिलाफ मनेर के विधायक भाई वीरेंद्र के रौद्र रूप का नतीजा क्या निकलता है, यह देखने वाली बात होगी.
राजद में टूट के खतरे का अंदेशा तेजस्वी को भी हो गया है. यही वजह है कि विदेश से लौटते ही तेजस्वी ने पार्टी नेताओं के साथ बैठक की. सांगठनिक प्रकोष्ठों और समितियों को भंग किया. सांसदों-विधायकों के साथ बैठक कर नेताओं को सक्रिय होने का निर्देश दिया. तेजस्वी जिस तरह सक्रिय दिख रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि उन्हें भी खतरे का एहसास होने लगा है. मृत्यंजय तिवारी के दावे और शक्ति यादव के खिलाफ मनेर के विधायक भाई वीरेंद्र के रौद्र रूप का नतीजा क्या निकलता है, यह देखने वाली बात होगी.







