एशिया में दशकों तक अमेरिका की केंद्रीय भूमिका रही है। लेकिन अब चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं ने पूरे सुरक्षा ढांचे को बदलना शुरू कर दिया है। जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देश पहले की तुलना में एक-दूसरे के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहे हैं। इसका सीधा संकेत यह है कि एशिया में अब सुरक्षा के नए समीकरण बन रहे हैं। अमेरिका की भूमिका खत्म नहीं हुई है, लेकिन उसके सहयोगी देश अपनी सुरक्षा के लिए पहले से ज्यादा खुद तैयारी करते दिखाई दे रहे हैं। यह बदलाव केवल सैन्य ताकत का मामला नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में पूरे एशिया के रणनीतिक ढांचे को प्रभावित कर सकता है।
चीन की गतिविधियों ने पड़ोसी देशों की चिंता क्यों बढ़ाई?
पिछले कुछ हफ्तों में चीन ने ताइवान के पूर्वी तट तक अपनी समुद्री गश्त का विस्तार किया है। इससे यह संकेत गया है कि जरूरत पड़ने पर वह पूरे ताइवान की समुद्री घेराबंदी करने की क्षमता दिखाना चाहता है। चीन ने जापान पर सैन्य, व्यापार और कूटनीतिक दबाव भी बढ़ाया है। इसके साथ ही उसने पनडुब्बी से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया है। चीन की लगातार बढ़ती सैन्य क्षमता ने क्षेत्र के दूसरे देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है। यही वजह है कि एशिया में अलग-अलग देशों के बीच रक्षा साझेदारी तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है।
जापान अपनी सुरक्षा नीति में इतना बड़ा बदलाव क्यों कर रहा है?
जापान ने ऑस्ट्रेलिया, फिलीपीन और भारत के साथ अपने रक्षा संबंध मजबूत किए हैं। दक्षिण कोरिया के साथ भी रक्षा सहयोग को और गहरा करने पर चर्चा चल रही है। इससे जापान की सुरक्षा नीति में आए बदलाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। लंबे समय से रक्षा उपकरणों के निर्यात पर लागू पाबंदियों को खत्म करने के बाद जापान अब दक्षिण कोरिया की तरह क्षेत्रीय हथियार आपूर्तिकर्ता बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव बताता है कि जापान अब केवल अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है।
ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देश किस तरह तैयारी कर रहे हैं?
ऑस्ट्रेलिया भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में जुटा है। उसने प्रशांत महासागर के द्वीपीय देशों के साथ नए समझौते किए हैं। इनमें फिजी के साथ पारस्परिक रक्षा संधि भी शामिल है। दूसरी ओर, जापान, फिलीपीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग मजबूत हो रहा है। भारत भी इस बदलते क्षेत्रीय समीकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन देशों के बीच बढ़ता सहयोग इस बात का संकेत है कि एशिया के देश सुरक्षा की जिम्मेदारी को आपस में बांटने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे एक ऐसी क्षेत्रीय व्यवस्था बनने की संभावना दिखती है, जिसमें किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भरता कम हो।
ट्रंप की वापसी के बाद अमेरिका को लेकर सवाल क्यों उठे?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद एशिया में अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आशंका यह है कि अगर अमेरिका पहले की तरह क्षेत्रीय सुरक्षा में सक्रिय नहीं रहा, तो चीन इस स्थिति का फायदा उठा सकता है। ट्रंप यह स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिका के सहयोगी देशों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी पहले की तुलना में ज्यादा खुद उठानी होगी। हालांकि एशिया के लिए अमेरिका की सैन्य उपस्थिति में कटौती की कोई ऐसी योजना सामने नहीं आई है, लेकिन अमेरिकी नीति में बदलाव की आशंका ने उसके सहयोगी देशों को पहले से ज्यादा एकजुट होने के लिए प्रेरित किया है।
क्या अमेरिका अब एशिया की सुरक्षा का पूरा जिम्मा उठा सकता है?
अमेरिका पर दुनिया के कई हिस्सों में सैन्य और रणनीतिक जिम्मेदारियां हैं। इन बढ़ते बोझ के कारण उसके लिए पहले की तरह लंबे समय तक एशिया की सुरक्षा का पूरा जिम्मा उठाना आसान नहीं रह गया है। ईरान के साथ हुए युद्ध ने भी अमेरिकी सैन्य शक्ति की सीमाओं को सामने रखा है। इसके बाद अमेरिका को एशिया-प्रशांत क्षेत्र से अपने कुछ सैन्य संसाधन हटाकर दुनिया के दूसरे हिस्सों में लगाने पड़े। ट्रंप की नीति भी यह संकेत देती है कि सहयोगी देशों को अपनी सुरक्षा में ज्यादा योगदान देना होगा। ऐसे में एशिया के देशों के लिए अपनी सामूहिक सुरक्षा क्षमता बढ़ाना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
क्या चीन के लिए कमजोर अमेरिकी प्रतिबद्धता बड़ा अवसर बन सकती है?
अगर बीजिंग को यह लगता है कि अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धता तेजी से कमजोर हो रही है या उसके सहयोगी पहले से ज्यादा असुरक्षित हैं, तो वह इसे अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के अवसर के रूप में देख सकता है। यही सबसे बड़ी चिंता है। चीन की सैन्य ताकत लगातार बढ़ रही है और वह अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार भी कर रहा है। ऐसे माहौल में अगर क्षेत्रीय देशों को अमेरिकी सुरक्षा छतरी कमजोर होती दिखाई देती है, तो वे अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने पर और ज्यादा जोर दे सकते हैं। इससे सुरक्षा मजबूत होने के बजाय हथियारों की दौड़ तेज होने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
क्या पूर्वी एशिया में हथियारों की होड़ तेज हो रही है?
पूर्वी एशिया में सुरक्षा को लेकर चिंता पहले से मौजूद है और अब इसमें हथियारों की होड़ का तत्व भी जुड़ता दिखाई दे रहा है। जापान ने लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को तैनात करना शुरू कर दिया है। दक्षिण कोरिया में अपने परमाणु हथियार विकसित करने को लेकर बहस तेज है। ऑस्ट्रेलिया परमाणु ऊर्जा से संचालित पनडुब्बियों और उन्नत मिसाइल प्रणालियों में बड़ा निवेश कर रहा है। वहीं चीन अपनी सैन्य क्षमता और परमाणु शस्त्रागार बढ़ा रहा है। यह स्थिति बताती है कि क्षेत्र के देश केवल कूटनीतिक भरोसे पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि अपनी सैन्य क्षमता को भी सुरक्षा की गारंटी मान रहे हैं।
क्या अमेरिका के बिना भी एशियाई देश प्रभावी साझेदारी बना सकते हैं?
इतिहास बताता है कि अलग-अलग हितों और अलग-अलग सरकारों वाले एशियाई देश अमेरिका की ज्यादा दखलअंदाजी के बिना भी साझेदारी बना सकते हैं। 1967 में बने 11 सदस्यीय दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के संगठन यानी आसियान इसका एक उदाहरण है। आसियान को कई बार साझा चुनौतियों पर धीमी और कमजोर प्रतिक्रिया के लिए आलोचना झेलनी पड़ी है। दक्षिणी चीन सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने में भी इसकी भूमिका सीमित रही है। इसके बावजूद, इस संगठन ने दशकों तक युद्धों से प्रभावित क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच शांति बनाए रखने में भूमिका निभाई और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा चीन के बीच संवाद और सहयोग का एक संस्थागत ढांचा दिया।
क्या ज्यादा संतुलित सुरक्षा व्यवस्था एशिया को मजबूत कर सकती है?
सुरक्षा की जिम्मेदारी अगर ज्यादा संतुलित तरीके से बांटी जाती है, तो इससे एशिया की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के बजाय मजबूत हो सकती है। जापान, फिलीपीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच मजबूत रक्षा सहयोग सुरक्षा खतरों से निपटने की पहली पंक्ति को मजबूत कर सकता है। जैसे-जैसे अमेरिका के सहयोगी देश खुद ज्यादा सक्षम और आपस में बेहतर तालमेल वाले बनेंगे, वैसे-वैसे उन्हें अपनी सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी ज्यादा खुद उठाना होगा। इसका फायदा यह हो सकता है कि किसी संकट के समय अमेरिकी मदद देर से मिले या सीमित रहे, तब भी ये देश मिलकर प्रभावी प्रतिक्रिया देने की स्थिति में रहें।
भारत के लिए बदलता एशियाई समीकरण क्यों महत्वपूर्ण है?
इस बदलते सुरक्षा समीकरण में भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत उन देशों में है, जिनके साथ जापान ने रक्षा संबंध मजबूत किए हैं। एशिया में सुरक्षा की जिम्मेदारी साझा करने की सोच आगे बढ़ती है तो भारत को क्षेत्रीय साझेदारियों में अपनी भूमिका तय करनी होगी। यहां चुनौती केवल सैन्य ताकत बढ़ाने की नहीं है, बल्कि अलग-अलग देशों के साथ भरोसा और समन्वय मजबूत करने की भी है। एशिया के लिए ऐसी व्यवस्था अधिक उपयोगी हो सकती है, जिसमें देश अपनी सुरक्षा क्षमता बढ़ाने के साथ एक-दूसरे के साथ सहयोग भी करें और किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहें।
क्या अमेरिका फिर भी एशिया में महत्वपूर्ण बना रहेगा?
अमेरिका की भूमिका खत्म होने की संभावना नहीं है। वह आगे भी प्रशांत क्षेत्र की एक प्रमुख शक्ति बना रहेगा। लेकिन बदलती परिस्थितियों में उसकी भूमिका पहले जैसी नहीं रह सकती। अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ बेहतर तालमेल बनाए रख सकता है और अपने रणनीतिक हितों से जुड़े दायित्वों को निभा सकता है। प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों को खुला और सुरक्षित रखना भी उसकी अहम भूमिका हो सकती है। साथ ही वह चीन के साथ स्थिर संबंध बनाए रखने की कोशिश कर सकता है। इस तरह अमेरिका पूरी तरह पीछे हटने के बजाय अपनी भूमिका को नए तरीके से परिभाषित कर सकता है।
पश्चिम एशिया का अनुभव एशिया को क्या संकेत देता है?
पश्चिम एशिया की स्थिति यह दिखाती है कि केवल अमेरिकी सैन्य भागीदारी से अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विताओं को युद्ध में बदलने से हमेशा नहीं रोका जा सकता। अमेरिका ने इस्राइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया, जिसके बाद फारस की खाड़ी में उसके साझेदार देशों को ईरानी हमलों का सामना करना पड़ा और वैश्विक व्यापार भी प्रभावित हुआ। इसके कारण खाड़ी क्षेत्र के कुछ देश वाशिंगटन पर अपनी निर्भरता पर दोबारा विचार कर रहे हैं और सुरक्षा के नए विकल्प तलाश रहे हैं। यह अनुभव एशिया के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि सुरक्षा के लिए किसी एक बाहरी शक्ति पर पूरी निर्भरता अपने आप में पर्याप्त गारंटी नहीं है।
क्या एशिया ज्यादा स्वतंत्र सुरक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है?
एशिया अब नई रणनीतिक वास्तविकता के अनुसार खुद को ढाल रहा है। अमेरिका के मित्र और प्रतिद्वंद्वी दोनों पहले की तुलना में ज्यादा समृद्ध और सैन्य रूप से सक्षम हैं, जबकि अमेरिकी सेनाएं कई वैश्विक मोर्चों पर दबाव में हैं। ऐसे में जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण कोरिया और फिलीपीन जैसे देशों का एक-दूसरे के साथ करीब आना केवल तत्काल सुरक्षा जरूरत नहीं है। यह आने वाले समय की क्षेत्रीय व्यवस्था की शुरुआत भी हो सकती है। लेकिन इसके साथ यह चुनौती भी रहेगी कि सैन्य तैयारी बढ़ाने और तनाव बढ़ने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
क्या बदलता शक्ति संतुलन एशिया को सुरक्षित बनाएगा या अस्थिर?
एशिया में शक्ति संतुलन का बदलना अब शायद टाला नहीं जा सकता। सवाल यह है कि यह बदलाव किस दिशा में जाएगा। अगर एशियाई देश अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी ज्यादा खुद उठाते हैं, एक-दूसरे पर भरोसा बढ़ाते हैं और अमेरिका पर निर्भरता कम करते हुए उसके साथ सहयोग बनाए रखते हैं, तो इससे क्षेत्र ज्यादा स्थिर और सुरक्षित हो सकता है। लेकिन अगर यही प्रक्रिया हथियारों की अंधी दौड़ और आपसी अविश्वास में बदलती है, तो जोखिम बढ़ेंगे। इसलिए आगे की राह सैन्य ताकत के साथ संवाद, सहयोग और संतुलन पर निर्भर करेगी। एशिया के लिए सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था वही होगी, जिसमें अमेरिका की भूमिका बनी रहे, लेकिन क्षेत्र के देश अपनी सुरक्षा के लिए खुद भी पर्याप्त सक्षम और एकजुट हों।







