टाटा सन्स के चेयरमैन पद से एन. चंद्रशेखरन के इस्तीफे के बाद एक बार फिर टाटा समूह की हर तरफ चर्चा है. चंद्रशेखरन अगले साल फरवरी में इस पद से रिटायर होंगे और उसके बाद वह अगले कार्यकाल के लिए नहीं चुने जाएंगे. इस बीच उनके उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो गई है. एन. चंद्रशेखरन टाटा ट्रस्ट के पूर्व चेयरमैन दिवंगत रतन टाटा के बेहद करीबी थे. 9 अक्टूबर 2024 को रतन टाटा के निधन के बाद ट्रस्ट की बागडोर उनके सौतेले भाई नोएल टाटा के हाथों में आ गई. इसके बाद नोएल टाटा के साथ कुछ मुद्दों पर मतभेद के कारण चंद्रशेखरन ने टाटा सन्स के चेयरमैन पद से इस्तीफा दिया है. खैर, हम आज आपके साथ चंद्रशेखर के इस्तीफे के कारणों या उनसे जुड़ी खबरों के बारे में बात नहीं कर रहे हैं. आज का मुद्दा है कि टाटा समूह के भीतर जिम्मेदारियों का बंटवारा किस तरह है और कौन किसका बॉस है. जब एन. चंद्रशेखरन टाटा सन्स के चेयरमैन हैं तो फिर उनको मतभेद की स्थिति में पद क्यों छोड़ना पड़ा? कुल मिलाकर सीधा सवाल यह है- टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट में ज्यादा पावरफुल कौन है, किसके हाथ में टाटा समूह की चाबी रहती है? इस सवाल को समझने के लिए कुछ मूलभूत मुद्दों को समझना होगा.
क्या है टाटा सन्स
टाटा सन्स प्राइवेट लिमिटेड मुख्य इंवेस्टमेंट होल्डिंग कंपनी और टाटा समूह की प्रोमोटर है. कुल मिलाकर यह एक कंपनी है. इसका मुख्यालय मुंबई के प्रसिद्ध बांबे हाउस में है. समूह की तमाम कंपनियों जैसे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील और एयर इंडिया में अधिकतर हिस्सेदारी इसी टाटा सन्स के पास है. दरअसल, टाटा सन्स खुद कोई सीधा बिजनेस नहीं करती. बल्कि वह समूह की कंपनियों की मालिक है. और इसी टाटा सन्स से चेयरमैन हैं एन. चंद्रशेखरन.
टाटा सन्स के मालिक कौन हैं?
अब अगला सवाल यह है कि जब टाटा सन्स एक निवेश कंपनी है तो उसका भी कोई मालिक होगा न. बिना मालिक के कोई कंपनी हो ही नहीं सकती है. लेकिन, टाटा सन्स के मामले में यहीं पर सबसे बड़ा लोचा है. टाटा सन्स की एक ऐसी कंपनी है जिसमें सबसे अधिक हिस्सेदारी किसी व्यक्ति या परिवार की नहीं बल्कि ट्रस्ट्स की है. उन ट्रस्टों का नाम हैं टाटा ट्रस्ट्स. दरअसल, टाटा परिवार की एक खासियत है. यह परिवार कारोबार से पैसा नहीं कमाता. परिवार कारोबार से कमाई के पैसे को परोपकार को कामों में लगा देता है. इसी कारण टाटा समूह देश में सैकड़ों हॉस्पिटल, शैक्षणिक संस्थान और शोध संस्थानों का संचालन करता है. इस पूरे काम को व्यवस्थित तरीके से अंजाम देने के लिए टाटा परिवार के कई ट्रस्ट संचालित हो रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक टाटा परिवार के अधीर अभी 14 ट्रस्ट चल रहे हैं. इन सभी को मिलाकर टाटा ट्रस्ट्स नाम दिया गया है. इनका संचालन मुंबई के बॉबे हाउस से होता है. इसी टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स कंपनी की 66 फीसदी हिस्सेदारी है. यानी सबसे अधिक हिस्सेदारी होने की वजह से टाटा सन्स के असली मालिट टाटा ट्रस्ट्स हुए. इसके बाद टाटा सन्स में शपूरजी पालोनजी समूह की 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है. टाटा सन्स के सभी बड़े फैसले में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका अहम होती है.
सबसे प्रभावी टाटा ट्रस्ट कौन
दरअसल, टाटा ट्रस्ट्स में भी दो सबसे अहम ट्रस्ट हैं. पहला सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट. इसकी स्थापाना 1932 में टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा ने की थी. यह ट्रस्ट बड़ी-बड़ी लॉन्ग टर्म की परियोजनाओं को हैडल करता है. टाटा सन्स में इस ट्रस्ट की हिस्सेदारी 28 फीसदी है. दूसरा, सबसे बड़ा ट्रस्ट है सर रतन टाटा ट्रस्ट. इस ट्रस्ट की स्थापन 1919 में हुई थी. इसकी स्थापना जमशेदजी टाटा के छोटे बेटे सर रतन टाटा की इच्छा के अनुसार की गई थी. यह ट्रस्ट संस्थागत निवेश और ग्रामीण विकास पर फोकस करता है. टाटा सन्स में इस ट्रस्ट की हिस्सेदारी 24 फीसदी है. इसके अलावा टाटा सन्स की 14 फीसदी हिस्सेदारी 12 अन्य ट्रस्टों में बंटी हुई है. यानी समूह की चाबी टाटा परिवार को दो सबसे प्रभावी ट्रस्टों- सर दोराबजी ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास है.
फिर क्या करते हैं नोएल टाटा
नोएल टाटा परिवार के सभी 14वों ट्रस्ट के चेयरमैन हैं. सामूहिक रूप में ये सभी मिलकर टाटा ट्रस्ट नेटवर्क बनाते हैं. 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा को चेयरमैन बनाया गया. सभी ट्रस्टों के बोर्ड मेंबर्स ने सर्वसम्मति से नोएल को चुना था. इस तरह ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स में सबसे बड़ी हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट की है और उसके मुखिया नोएल टाटा हैं. इस तरह परोक्ष और सीधे हर तरीके से टाटा ट्रस्ट्स काफी ताकतवर हैं. वे ही टाटा सन्स के नीतिगत फैसलों को कंट्रोल करते हैं.







