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बड़े निर्णय से पूर्व खामोशी ओढ़ इशारों में ही अपने इरादे का इजहार कर देते………

UB India News by UB India News
March 28, 2023
in पटना, ब्लॉग, मुख्यमंत्री
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बिहार में फिर से शुरू होगी सेटिंग वाली सियासत?
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बिहार के सीएम नीतीश कुमार इशारों में ही अपने इरादे का इजहार करते हैं। उनके इशारे भी अब आम हो गये हैं। उन्हें जब कोई बड़ा निर्णय लेना होता है तो सबसे पहले खामोशी ओढ़ लेते हैं। खामोशी में ही उनके अगले कदम का संकेत छिपा होता है। बड़े सियासी फैसले के पहले उनका दूसरा इशारा होता है अचानक अपने विरोधी के यहां पहुंच जाना। साल भर में दो ऐसे मौके आये हैं, जब नीतीश कुमार अपने विरोधियों के घर अचानक किसी बहाने पहुंच गये और बाद में उसी के साथ रिश्ते जोड़ने की सूचना सार्वजनिक हुई।

बीजेपी नेता के घर छठ में पहुंच गए नीतीश
ताजा मामला यह है कि नीतीश कुमार चैती छठ में खरना का प्रसाद ग्रहण करने बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय मयूख के घर रविवार को अपने कैबिनेट के कई मंत्रियों के साथ पहुंच गये। यह संयोग था या कोई रणनीति, कि नीतीश के साथ मयूख के घर जाने वालों में विजय चौधरी और संजय झा जेडीयू कोटे के ही मंत्री हैं। मुख्यमंत्री नीतीश का विरोधी पार्टी के नेता के घर जाना निश्चित ही अचरज पैदा करने वाली बात है। राजनीतिक विश्लेषक पिछले अनुभवों के आधार पर इसे बिहार में नये सियासी समीकरण का संकेत मान रहे हैं।

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इसी अंदाज में राबड़ी के घर गये थे नीतीश
साल भर पहले रमजान के महीने में राजद की नेता और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के आवास पर भी नीतीश इसी अंदाज में पहुंचे थे। अपने आवास से पैदल ही वे राबड़ी के घर गये थे, जहां इफ्तार पार्टी का आयोजन था। उसके बाद कयास लगने लगे थे कि नीतीश कोई बड़ा सियासी खेल करने वाले हैं। कुछ ही महीने बाद सच सामने आ गया। नीतीश ने बीजेपी का साथ छोड़ आरजेडी से हाथ मिला लिया। वे महागठबंधन के नेता बतौर बिहार के सीएम बन गये। इस बार वे बीजेपी के नेता और अमित शाह के बेहद करीबी माने जाने वाले संजय मयूख के घर गये हैं तो फिर इसके राजनीतिक मायने तलाशे जाने लगे हैं।

राहुल-तेजस्वी के मुद्दे पर नीतीश की चुप्पी
संजय मयूख के घर नीतीश का जाना जितन आश्चर्य पैदा करता है, उतना ही अचरज इस बात को लेकर लोगों में है कि तेजस्वी यादव और उनकी बहन मीसा भारती से सीबीआई-ईडी की पूछताछ पर अब तक नीतीश चुप हैं। इतना ही नहीं, राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द होने पर भी वो खामोश हैं। हालांकि बिहार में इन दोनों दलों के सहयोग से ही नीतीश सरकार चला रहे हैं। सात दलों के महागठबंधन के सभी दल राहुल गांधी के मुद्दे पर बोल रहे हैं। यहां तक कि नीतीश की पार्टी जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह भी बोले, पर महागठबंधन के मुखिया होने के बावजूद नीतीश कुमार चुप रहे।

CBI के मुद्दे पर ही छोड़ा था RJD का साथ
2013 में एनडीए छोड़ने के बाद 2015 में आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बना कर नीतीश ने विधानसभा का चुनाव लड़ा था। लेकिन 2017 में सीबीआई ने जब तेजस्वी यादव पर मामला दर्ज किया तो उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ दिया। भरोसे की साथी बीजेपी के साथ सरकार बना ली। इस बार फिर सीबीआई ने तेजस्वी या यूं कहें कि पूरे लालू परिवार के खिलाफ सक्रियता बढ़ा दी है तो इसे नीतीश की नाराजगी की वजह माना जा सकता है। महागठबंधन को बाय बोलने का यह उपयुक्त अवसर हो सकता है।

यह अमित शाह की चुनावी स्ट्रेटजी तो नहीं ?
छह महीने के अंदर चार बार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बिहार का दौरा कर चुके हैं। उनके लगातार दौरों से ही यह अनुमान लगाया जाता है कि वे बड़ी चुनावी रणनीति के तहत ही बार-बार बिहार आ रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा के जेडीयू से अलग होने को भी अमित शाह की ही रणनीति का हिस्सा माना जाता है। सम्राट चौधरी को बिहार बीजेपी का अध्यक्ष बनाये जाने के पीछे भी शाह का ही दिमाग है। दरअसल उनकी नजर नीतीश कुमार के आधार वोट बैंक लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) पर है। उपेंद्र कुशवाहा और सम्राट चौधरी के जरिये उन्होंने नीतीश को कमजोर कर दिया है। आरजेडी के नेता जिस तरह नीतीश की खिल्ली उड़ाते रहे हैं या अक्सर विरोध में खड़े हो जाते हैं, उससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि आरजेडी के वोट जेडीयू को सहज भाव से ट्रांसफर नहीं होंगे। यानी नीतीश इतने कमजोर हो चुके हैं कि उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। इसलिए संजय मयूख के घर पूजा के प्रसाद के बहाने नीतीश का जाना महागठबंधन से उनके मोह भंग को दर्शाता है।

ED-CBI के सवाल पर बचते रहे हैं नीतीश
नीतीश कुमार के हृदय परिवर्तन का एक संकेत यह भी माना जा सकता है कि सीबीआई-ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के सवाल पर वे विपक्ष के साथ कदमताल करने से बचते रहे हैं। पीएम को पत्र लिखने का समय हो या सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर विपक्षी दलों की दस्तक का वक्त, नीतीश कुमार और उनकी पार्टी ने अपने को अलग रखा है। हालांकि नीतीश के डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव जरूर विपक्ष के साथ शामिल रहे हैं। इससे भी संदेह पैदा होता है कि नीतीश को अब महागठबंधन का साथ रास नहीं आ रहा।

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