बिहार की राजनीति में पिछले आठ महीने के दौर को देखा जाए तो उसमें कई हलचल हुई। सबसे ज्यादा हलचल जेडीयू में देखने को मिला। जहां पार्टी के तीन प्रमुख नेता पार्टी से अलग हो गये। ये तीनों नेता हैं। आरसीपी सिंह, उपेंद्र कुशवाहा और आरा की पूर्व सांसद मीना सिंह। इनके बाहर निकलने से सत्तारूढ़ जेडीयू को बड़ा सियासी झटका लगा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये नेता और कुछ नहीं नीतीश के लिए मुश्किल खड़ी करेंगे। आगामी लोकसभा चुनाव में ऐसे कदम उठाएंगे जिससे नीतीश कुमार को राजनीतिक घाटा हो। ये नेता महागठबंधन को कड़ी चुनौती देंगे। हालांकि, इसमें एक नाम और है प्रशांत किशोर का जो ऑलरेडी नीतीश के खिलाफ बिगुल फूंके हुए हैं।
नीतीश को डैमेज कर रहे नेता
नीतीश को डैमेज करने वालों में आरसीपी सिंह भी शामिल हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी ने अपने जीवनकाल में कोई प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ा। मुख्य रूप से अपने राजनीतिक गुरु नीतीश के आशीर्वाद के कारण दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए। उधर, नीतीश के विरोध में विरासत बचाओ नमन यात्रा पर निकले कुशवाहा का सियासी करियर भी कुछ उठा-पटक वाला रहा। कुशवाहा 2019 का लोकसभा चुनाव काराकाट और उजियारपुर दोनों से हार गए। पिछले साल अगस्त में जद (यू) छोड़ने के बाद, आरसीपी अपने गृह जिले नालंदा में अधिकतम समय बिता रहे हैं। जैसा कि चर्चा है, वह 2024 का लोकसभा चुनाव नालंदा से भाजपा के टिकट पर या उसके समर्थन से लड़ने की योजना बना रहे हैं।
उपेंद्र पर भड़की जेडीयू
पूर्व विधायक और जद (यू) नेता राजीव रंजन ने बताय कि हालांकि आरसीपी कुर्मी जाति से संबंधित है, लेकिन निर्वाचन क्षेत्र में समुदाय पर उनका नीतीश जैसी पकड़ नहीं है। इसके अलावा, कुर्मी नेताओं का एक बड़ा वर्ग आरसीपी से नाराज है क्योंकि उसने नीतीश की ‘पीठ में छुरा घोंपा’, जिसने उसे दो बार राज्यसभा भेजा। रंजन ने कहा कि आरसीपी एक मुखिया का चुनाव अपनी पंचायत में भी नहीं जीत सकते हैं। कुशवाहा न केवल उजियारपुर से 2019 का चुनाव 2.77 लाख वोटों के भारी अंतर से हारे, उनकी तत्कालीन राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 2020 के विधानसभा चुनाव में खाता खोलने में भी नाकाम रही थी।
जेडीयू को नुकसान पहुंचा रहे नेता
इसी तरह, मीना 2009 में आरा से लोकसभा के लिए चुनी गईं, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में चौथे स्थान पर रहीं। पिछला चुनाव उन्होंने लड़ा था। आरा में उन्हें भाकपा माले के राजू यादव से कम वोट मिले थे। 2014 में बीजेपी के राजकुमार सिंह ने मीणा को भारी अंतर से हराया था। हालांकि, सियासी जानकारों की मानें, तो ये नेता नीतीश के लिए लोकसभा चुनाव में परेशानी का सबब बन सकते हैं। प्रशांत किशोर जहां महागठबंधन की सरकार की लगातार खामिया गिना रहे हैं। वहीं कुशवाहा क्षेत्र में जेडीयू के जमीनी कार्यकर्ताओं को तोड़ रहे हैं। ये बातें जेडीयू के लिए ठीक नहीं है। जानकार मानते हैं कि मीना सिंह के समर्थक भी बहुत जल्द बीजेपी ज्वाइन कर लेंगे। इधर हाल में कुशवाहा ने जेडीयू के विभिन्न प्रकोष्ठ के नेताओं को अपने पाले में कर जेडीयू के लिए चुनौती पैदा कर दी है।







