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खामोशी से काम करने वाले नीतीश कुमार को तू-तड़ाक करने की क्या है मजबूरी?

UB India News by UB India News
December 17, 2022
in पटना, ब्लॉग, मुख्यमंत्री
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खामोशी से काम करने वाले नीतीश कुमार को तू-तड़ाक करने की क्या है मजबूरी?

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बिहार के सीएम नीतीश कुमार की यह खूबी रही है कि किसी के आरोपों पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिये शांत भाव से वह चुपचाप अपने काम में व्यस्त रहते हैं। पिछले दो-तीन साल में उनके स्वभाव में परिवर्तन आ गया है। गया की पार्षद के बेटे ने जब रोड रेज में एक युवक को मार डाला था या सारण जिले में जहरीला मिड डे मील खाकर बच्चे बीमार हुए थे तो तत्कालीन विपक्ष ने उनकी खूब खिंचाई की थी। तब भी नीतीश खामोश रहे। अब वह बात-बात पर झुंझला जाते हैं। उनकी झुंझलाहट गुस्से के रूप में फूट पड़ती है। तीन दिनों पहले बिहार असेंबली में उनका जो रौद्र रूप दिखा, उसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। तू-तड़ाक से लेकर देख लेंगे, ठोक देंगे या ठंडा कर देंगे जैसी शब्दावली का प्रयोग उनकी जुबान से अब अक्सर निकल जाता है। आखिर उनके स्वभाव में यह परिवर्तन क्यों आया है। आइए, इसकी पड़ताल करते हैं।

उपेक्षित, तिरस्कृत आदमी को आता है गुस्सा
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि गुस्सा आने का प्रमुख कारण व्यक्तिगत या सामाजिक अवमानना है। उपेक्षित, तिरस्कृत और हेय समझे जाने वाले लोग आमतौर पर अधिक गुस्सा करते हैं। क्योंकि वे गुस्सा जैसी नकारात्मक गतिविधि की ओर से समाज को एहसास कराना चाहते हैं कि उनका भी वजूद है। गुस्से का मकसद किसी व्यक्ति विशेष या समाज से अपनापन की अपेक्षा करना भी होता है। आदमी की अपेक्षाएं जब पूरी नहीं होती हैं, तब गुस्सा पैदा होता है। गुस्से का सबसे खराब पक्ष यह होता है कि इसमें आदमी की बुद्धि भ्रमित हो जाती है। बुद्धि भ्रमित होने से विवेक मर जाता है। अंततोगत्वा इस प्रकार आदमी का पतन हो जाता है। वह विनाश को प्राप्त होता है। इसीलिए कहा जाता है कि आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन गुस्सा ही है।

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दो साल से नीतीश को आ रहा है गुस्सा
साल 2020 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए थे। तत्कालीन लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने चुन-चुन कर उन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिये थे, जहां एनडीए के बैनर तले जेडीयू के प्रत्याशी खड़े थे। एनडीए में रहते हुए बागी तेवर अपना कर एलजेपी ने 243 सदस्यों वाली विधानसभा चुनाव में अपने 137 उम्मीदवार उतार दिये। इनमें ज्यादातर जेडीयू प्रत्याशियों खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। सीटों के बंटवारे में जहां बीजेपी के उम्मीदवार थे, वहां चिराग पासवान ने कोई उम्मीदवार नहीं दिया। एलजेपी खुद एक सीट मटिहानी की 333 मतों के अंतर से जीत पायी, लेकिन उसने नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के उम्मीदवारों को हराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जेडीयू को तकरीबन 35 सीटें एलजेपी के उम्मीदवारों द्वारा वोट काटने से गंवानी पड़ी। पार्टी द्वारा टिकट से वंचित बीजेपी के 25 नेताओं को भी एलजेपी ने अपना उम्मीदवार बनाया। एलजेपी की वजह से जेडीयू 2015 की 71 सीटों से खिसक कर 43 पर आ गया। ये सब तब हुआ, जब एलजेपी एनडीए में ही थी और इसके नेता चिराग पासवान अपने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते घूम रहे थे। इसे मन ही मन नीतीश कुमार ने बीजेपी की साजिश मानी। यही वजह रही कि नीतीश तीसरे नंबर की पार्टी बन जाने के कारण सीएम बनने को तैयार नहीं थे। बीजेपी ने रिश्ते और वादे का हवाला देकर उन्हें राजी किया था।

नीतीश ने चिराग को सबक सिखाया
नीतीश के गुस्से का आलम यह था कि दबाव डाल कर पहले एलजेपी को उन्होंने एनडीए से हटवाया। फिर एलजेपी के एकमात्र विधायक को अपने पाले में किया। इतना ही नहीं, एलजेपी में विभाजन करा कर एनडीए कोटे से चिराग पासवान की जगह उनके चाचा को केंद्रीय मंत्री बनवा दिया।

चुनाव सभाओं में उनका गुस्सा कई बार दिखा
असेंबली इलेक्शन के दौरान ही चुनावी सभाओं में लोगों ने उनका गुस्से वाला रूप पहली बार देखा था। उनकी एक चुनावी सभा में जह लालू जिंदाबाद के नारे लगे तो उन्होंने गुस्से में कहा था- क्या बोल रहे हो..बोल क्या रहे हो..काहे को अनापशनाप बोल रहे हो…यहां पर हल्ला मत करो, वोट नहीं देना है तो मत दो। दूसरी बार इसी साल विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा पर वह सदन में ही बरस पड़े थे। उन्हें संविधान के मुताबिक सदन चलाने की नसीहत दे डाली। नीतीश ने कहा- क्या आप सदन को ऐसे चलाएंगे, हम ऐसा नहीं होने देंगे। सदन में इस तरह से चर्चा नहीं होती है। दरअसल चुनाव बाद नीतीश को तीसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद बीजेपी ने उन्हें सीएम तो बना दिया, लेकिन उन्हें यह एहसास कराने में कोई कोताही नहीं बरती कि आप हमारे समर्थन से सीएम हैं। सीवान के रहने वाले बीजेपी पार्षद टुन्ना पांडेय ने कहा था कि नीतीश परिस्थितिवश मुख्यमंत्री बने हैं। उन्हें जेल भेजवा कर छोड़ेंगे। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल और गोपालगंज के सांसद समेत पार्टी के कई नेता शराब से होने वाली मौतों, बढ़ते अपराध और मुस्लिम तुष्टीकरण को लेकर अक्सर नीतीश पर आरोप लगाते रहे। इससे नीतीश इतने आहत हुए कि उन्होंने बीजेपी से रिश्ता तोड़ने में तनिक भी देर नहीं की।

बीजेपी का गुस्सा तेजस्वी पर उतारा
आदमी जब गुस्से में होता है तो कई बार दूसरे पर भी वह इसे उतार देता है। बीजेपी के प्रति गुस्सा नीतीश में इतना गहरा था कि विधानसभा में वह तेजस्वी पर बरस पड़े थे। इस झड़प में नीतीश ने तेजस्वी के बाप-माई के कारनामे तक गिना दिए। बहनों को भी नहीं छोड़ा। ऐसा एक बार नहीं, कई बार हुआ। नेता प्रतिपक्ष को तुम और बच्चा कहने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया।

और अब बीजेपी पर भड़के नीतीश
बीजेपी पर इस बार नीतीश का गुस्सा इतना अधिक था कि ठोंक देंगे, ठंडा कर देंगे से लेकर तू तड़ाक पर वह उतर आए। क्या नीतीश को गुस्सा इसलिए आता है कि अब उम्र उन पर हावी होती जा रही है। या ताजारीन कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव की पराजय को वह पचा नहीं पा रहे। महागठबंधन के साथ जाकर उन्होंने बीजेपी को सबक सिखाने का बीड़ा उठाया है। बिहार की गद्दी आरजेडी नेता उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को सौंप कर वह बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने का अभियान चलाने की तैयारी में हैं। लेकिन उनके आरंभिक प्रयास का कोई असर न दिखना भी उनके भीतर गुस्से का कारण हो सकता है।

नीतीश की खासियत में गुस्से की खामी
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं- ‘आप मुझसे पूछ सकते हैं कि आप किस या किन अन्य सत्तासीन नेता या नेताओं के प्रशंसक हैं तो उनके काम देखने बाद तो मेरा जवाब यह है कि मैं इन दिनों मुख्यतः दो सत्तासीन नेताओं का प्रशंसक हूं- नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार। आखिर क्यों? इसलिए कि इन दोनों में तीन-तीन मुख्य गुण हैं। पहला- अपने लिए जायज आय से अधिक रुपए-पैसे एकत्र करने में इनकी कोई रुचि नहीं है। दूसरा- परिवारवाद से दूर हैं दोनों नेता। और तीसरा- जन सेवा भाव से भरे हैं दोनों। विकास व कल्याण के लिए इनमें बेजोड़ कल्पनाशीलता भी है।‘ दरअसल गुस्सा आने का प्रमुख कारण व्यक्तिगत या सामाजिक अवमानना है। नीतीश कुमार की नीति या नीयत में कोई खोट नहीं है। ऐसे में जब कोई जब उनके कामों पर सवाल उठाता है तो गुस्सा भड़क जाता है।

 

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