बैंकों का धन लूटकर विदेशों में धन शोधन करने वाले बड़े औद्योगिक घरानों की जांच को लेकर एजेंसियां आए दिन विवादों में घिरी रहती हैं। भगोड़े वित्तीय अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने में देश की बड़ी जांच एजेंसियां विफल रही हैं। ऐसी नाकामी के कारण जांच एजेंसियों पर चुनिंदा आरोपितों के खिलाफ ही कार्रवाई करने के आरोप भी लगते रहे हैं।
पिछले दिनों कानपुर की रोटोमैक पेन कंपनी के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने ७५० करोड़ रु पये से अधिक के बैंक फ्रॉड का मामला दर्ज किया। इस कंपनी पर आरोप है कि इसने कई बैंकों से ऋण लेकर नहीं लौटाए। रिपोर्ट के अनुसार‚ ७ बैंकों के समूह के लगभग २९१९ करोड़ रुपये इस कंपनी पर बकाया हैं। गौरतलब है कि बैंक फ्रॉड का यह मामला नया नहीं है। बैंक को चूना लगाने वाली यह कंपनी जून‚ २०१६ में ही नॉन–परफॉमिग असेट्स (एनपीए) घोषित कर दी गई थी। छह साल बाद २०२२ में जब सीबीआई ने इस कंपनी पर कार्रवाई शुरू की तब तक कंपनी के कर्ताधर्ता विक्रम कोठारी का निधन हो चुका था। जांच और कार्रवाई में देरी के कारण बैंकों को करोड़ों का चूना लग चुका था। देश में कोठारी जैसे अनेक लोग हैं‚ जो बैंक से लोन लेते हैं। यदि वो छोटे–मोटे लोन लेने वाले व्यापारी होते हैं‚ तो उनके खिलाफ बहुत जल्द कड़ी कार्रवाई की जाती है परंतु आम तौर पर देखा गया है कि बैंकों के धन की बड़ी चोरी करने वाले आसानी से जांच एजेंसियों के हत्थे नहीं चढ़ते। कारण बैंक अधिकारी और व्यापारी की सांठ–गांठ होता है।
ऋण लेने वाला व्यापारी बैंक के अधिकारी को मोटी रिश्वत के भार के तले दबा कर अपना काम करा लेता है‚ और किसी को कानों–कान खबर नहीं होती। जब ऋण और उस पर ब्याज मिला कर रकम बहुत बड़ी हो जाती है‚ तो तेजी से कार्रवाई करने का नाटक किया जाता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। रोटोमैक कांड़ के आरोपियों की सूची में कानपुर का एक और समूह है‚ जिस पर जांच एजेंसियों की कड़ी नजर नहीं पड़ी। आरोप है कि इस समूह ने विभिन्न बैंकों के साथ सात हजार करोड़ से अधिक रुपये का घोटाला किया है। फर्जी कंपनियों का जाल बिछा कर बैंकों के साथ धोखा किया है। इस समूह के मुख्य आरोपियों उदय देसाई और सरल वर्मा–जिनकी कंपनियां हैं एफटीए एचएसआरपी सोल्यूशन प्रा. लि. और एग्रोस इम्पेक्स इंडिया लि.–रोटोमैक कांड के सह–अभियुक्त भी हैं। इनकी गिरफ्तारी भी हुई थी। लेकिन कोविड और स्वास्थ्य कारणों के चलते इन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जमानत दी गई। गौरतलब है कि सीबीआई‚ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) में इस समूह के खिलाफ २०१९ के बाद से विभिन्न बैंक ८ एफआईआर लिखा चुके हैं परंतु वर्मा और देसाई बंधुओं पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उदय देसाई ने दिल्ली उच्च न्यायालय में विदेश जाने की गुहार लगा कर एक याचिका दायर की। कोर्ट ने जुलाई‚ २०२२ के अपने आदेश में याचिका रद्द करते हुए विशेष रूप से उल्लेख किया कि विभिन्न जांच एजेंसियों में लंबित अनेक गंभीर मामलों के बावजूद आरोपियों को एक ही बार पूछताछ के लिए बुलाया गया।
जांच एजेंसियों ने सघन जांच और पूछताछ की शुरुआत ही नहीं की। सोचने वाली बात है कि हजारों करोड़ के घोटाले के आरोपियों को एक ही बार बुलाकर जांच एजेंसियों को इत्मिनान हो गया कि आरोपियों को दोबारा पूछताछ के लिए नहीं बुलाना चाहिएॽ क्या एक ही बार में पूछताछ से जांच एजेंसियां संतुष्ट हो गइॽ आरोपी एक ही बार में एजेंसियों के ‘कड़े सवालों’ का संतोषजनक जवाब दे पाएॽ क्या जांच एजेंसियां आरोपियों से ऐसे ही केवल एक बार ही जांच और पूछताछ करती हैंॽ इन से कहीं छोटे मामलों में विपक्षी नेताओं या नामचीन लोगों के खिलाफ भी इन एजेंसियों का क्या यही रवैया रहता हैॽ क्या इन आरोपियों की करोड़ों की संपत्ति को जब्त किया गयाॽ क्या इनकी बेनामी संपत्तियों तक ये एजेंसियां पहुंच पाइॽ सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमयी मृत्यु के बाद जिस तरह बॉलीवुड के सितारों को लगातार पूछताछ के लिए बुलाया गया था क्या वैसा कुछ इनके भी साथ हुआॽ अगर नहीं तो क्यों नहींॽ केंद्र में जो भी सरकार रही हो‚ उस पर जांच एजेंसियों के दुरु पयोग का आरोप लगता रहा है। मौजूदा सरकार पर विपक्ष द्वारा यह आरोप लगता रहा है कि वो कुछ चुनिंदा लोगों पर‚ अपने राजनैतिक प्रतीद्वंद्वियों या अपने विरुद्ध खबर छापने वाले मीडिया प्रतिष्ठानों के खिलाफ इन एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है।
जांच एजेंसियों में लंबित अन्य मामलों को छोड़ देसाई और वर्मा बंधुओं के मामले को ही लें तो यह बात सच साबित होती है। दिल्ली के ‘कालचक्र समाचार ब्यूरो’ के प्रबंधकीय संपादक रजनीश कपूर को जब एफटीए एचएसआरपी सोल्यूशन प्रा. लि. और एग्रोस इम्पेक्स इंडिया लि. के घोटालों से संबंधित सभी दस्तावेज मिले तो उन्होंने इन आरोपों को सही पाया। कपूर ने ६ मई‚ २०२२ को एजेंसियों को सप्रमाण पत्र लिख कर देसाई और वर्मा द्वारा किए गए हजारों करोड़ रु पये के घोटालों की जांच की मांग की थी। ऐसे में प्रमुख जांच एजेंसियां शक के घेरे में आ जाती हैं। इन एजेंसियों पर विपक्ष द्वारा लगाए गए ‘गलत इस्तेमाल’ के आरोप सही लगते हैं। मामला चाहे छोटे घोटाले का हो या बड़े घोटाले का‚ एक ही अपराध के लिए दो मापदंड कैसे हो सकते हैंॽ
यदि आम आदमी या किसान बैंक को ऋण चुकाने में असमर्थ होता है‚ तो बैंक की शिकायत पर पुलिस या एजेंसियां कड़ी कार्रवाई करती हैं। उसकी दयनीय दशा की परवाह न करके कुर्की तक कर डालती हैं परंतु बड़े घोटालेबाजों के साथ सख्ती क्यों नहीं बरती जातीॽ घोटालों की जांच कर रही एजेंसियों का निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है। एक जैसे अपराध पर‚ आरोपी का रुतबा देखे बिना‚ अगर एक समान कार्रवाई होती है‚ तो जनता के बीच संदेश जाता है कि जांच एजेंसियां अपना काम स्वायत्तता और निष्पक्ष रूप से कर रही हैं। सिद्धांत यह होना चाहिए कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। चाहे वो किसी भी विचारधारा या राजनैतिक दल का समर्थक क्यों न हो। कानून अपना काम कानून के दायरे में ही करेगा।







