बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इशारों ही इशारों में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा है कि ‘उन्हें क्या मालूम है, वह लोग क्या बोलते हैं, उसका कोई मतलब है?’ पटना में एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद जब मुख्यमंत्री से पत्रकारों ने गृहमंत्री अमित शाह के बयान पर प्रश्न किया तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, ‘इन लोगों को जयप्रकाश नारायण के बारे में क्या मालूम है?’ उन्होंने कहा, ‘आज जो प्रधानमंत्री हैं, जब मुख्यमंत्री बने थे, तब क्या थे?’ उन्होंने कहा कि इन लोगों को क्या मालूम है स्वतंत्रता संग्राम के विषय में। जिन लोगों का आजादी की लड़ाई से कुछ मतलब नहीं रहा, वह आज जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आंदोलन पर बोल रहे हैं। आजकल जो लोग बोल रहे हैं, उनकी क्या भूमिका थी स्वतंत्रता आंदोलन में?’
इससे पहले केंद्रीय गृहमंत्री ने जयप्रकाश नारायण की जयंती पर उनके गांव सिताबदियारा पहुंचे और कहा नीतीश कमार पर तंज कसते हुए कहा, ‘जेपी आंदोलन के कई लोग हैं जो पूरा जीवन जेपी और लोहिया जी का नाम लेते रहे, लेकिन आज वह सत्ता के लिए कांग्रेस की गोद में बैठे हुए हैं।’ उन्होंने कहा, ‘जेपी ने जीवनभर सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों के लिए लड़ाई लड़ी, लेकिन उनका नाम लेकर राजनीति में आने वाले लोग, सत्ता के लिए पांच-पांच वार पाला बदलने वाले लोग बिहार का मुख्यमंत्री बने बैठे हैं।’ सीएम नीतीश और गृहमंत्री अमित शाह के बीच जयप्रकाश नारायण का नाम लेकर शुरू हुए आरोप-प्रत्यारोप के बाद खासकर युवा वर्ग के बीच में कई तरह के सवाल हैं। लोग जेपी और RSS के रिश्तों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। आइए जेपी आंदोलन और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (RSS) के रिश्तों को लेकर कुछ अहम बातें समझते हैं।
आपातकाल के समय में देश की राजनीति उस आदर्श को प्राप्त कर चुका था, जहां शेर और बकरी एक ही घाट में पानी पी रहे थे। इस आंदोलन के मूल में था कांग्रेसी सत्ता से मुक्ति और इस स्थिति को लाने में वाम दल के साथ घोर राइटिस्ट संघटन RSS के साथ भारतीय जनसंघ की भी भूमिका अहम थी। यह दीगर है कि इस आंदोलन में क्या उत्तर, क्या दक्षिण लगभग पार्टियां, छात्र संघटन या फिर अन्य संघटन भी जुड़े थे। लेकिन तब कांग्रेस इसकी जड़ में मान रही थी कि संघ का ढांचा काम कर रही है और कांग्रेस विरोध के सारे तरीके संघ के प्लेटफार्म पर बनाए जा रहे हैं। यही वजह भी है कि तब कांग्रेस नेत्री इंदिरा गांधी ने आंदोलान का सारा ठीकरा RSS के माथे जड़ दिया था।
इंदिरा गांधी ने क्या कहा?
इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक प्लेटफार्म पर साफ कहा कि जेपी के आंदोलन को संघ चला रहा है। इस वजह से यह एक फासिस्ट आंदोलन है। कहते हैं कि इंदिरा गांधी के इस आरोप पर जेपी भड़क गए और तब संघ के प्रति उन्होंने अपना उद्गार प्रकट किया।
जेपी ने दिया जवाब
इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया पर बड़े विस्तार से लोकनायक जयप्रकाश ने जवाब भी दिया। नए भारत के निर्माण की चुनौती स्वीकार किए हुए इस क्रांतिकारी संघटन से मुझे बहुत आशा है। आप में ऊर्जा है, निष्ठा है और राष्ट्र के प्रति समर्पित भी हैं। इंदिरा जी जब यह कह रही हैं कि संघ एक फासीवाद संघटन है तो मैं भी फासीवाद हूं।
संघ के ही कद्दावर नेता प्रो. महेश प्रसाद सिंह कहा करते थे कि संघ लोकनायक के लिए नया नहीं था। वे 1959 में भी संघ के एक शिविर में जा चुके थे। उनका मानना भी था कि जेपी भले परंपरागत संघी नही थे, लेकिन संघ को वह कभी भी अछूत की तरह देखते भी नहीं थे।
बिहार में भी सक्रिय रहा संघ
आपातकाल के दौरान बिहार में तीन ऐसे बड़े नेता थे जो आंदोलन की लौ को जलाए रखने के लिए अपनी गिरफ्तारी नहीं दी थी। इन नेताओं में स्व. कर्पूरी ठाकुर, स्व. कैलाशपति मिश्र और स्व. सतेंद्र बाबू शामिल थे। कहते हैं तब कैलाश पति मिश्र हैट, पैंट और कोट पहनकर राज्य भर में घूम-घूम कर आंदोलन को ताकत पहुंचाते रहे।
इस आंदोलन में संघ की तरफ से। गोविंदाचार्य, रामबहादुर राय, सुशील मोदी, राजेंद्र गुप्ता समेत कई नेता भी भेष बदल बदलकर आंदोलन को तेज करने का काम करते रहे।
संघ पर भरोसा था
लोकनायक संघ पर भरोसा व्यक्त करते रहे हैं। जनसंघ हो या एबीवीपी की निष्ठा और कर्तव्यता को आजमाया भी था। इस वजह से तब आपातकाल में कई जिम्मेवारियां संघ को जेपी ने दी। एक उदाहरण यह है कि जेपी जो छात्र और युवा संघर्ष वाहिनी के राष्ट्रीय संयोजक अरुण जेटली थे, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में एवीबीपी के अध्यक्ष थे।
बहरहाल, यह तो जेपी के बारे में कहा जाता है कि विभिन्न विचारधाराओं से प्रभावित होते रहे हैं। प्रारंभ में रूसी मार्क्सवादी क्रांति से। बाद में गांधीजी की सत्य और अहिंसा से भी प्रभावित हुए। एक समय ऐसा भी था जब समाजवादी राजनीति के मुरीद हुए। लेकिन तत्कालीन लोग कहते हैं कि अपने अंतिम समय में लोकनायक राष्ट्रवादी हो गए थे। और राष्ट्रवाद के मूल्यों पर ही जेपी ने इंदिरा गांधी गद्दी को छोड़ो के बुनियाद पर नारा दिया था कि सिंहासन छोड़ो की जनता आती है।




