राजनीतिक शतरंज के खेल में नीतीश कुमार ने एक बार फिर बाजी मार ली है। भाजपा की रणनीति धरी की धरी रह गई और सत्ता का पासा पलट गया। सही मायने में यह नीतीश कुमार की काबिलियत ही है कि उनकी सोच के आगे सभी नतमस्क हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश‚ महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में विजय का हुनर दिखाने वाली भाजपा को नीतीश कुमार ने बिहार में मात दे दी है।
नीतीश के ‘तीर’ के सामने भाजपा की राजनीति मू्च्छिछत हो गई है। शिवसेना को नाथने वाले भाजपा के शीर्ष नेताओं का भी जादू नहीं चल सका। गौर करें‚ तो बिहार के ताजा राजनीतिक ‘खेल’ के पीछे कई कारण हैं। नीतीश ने गलत किया या सही‚ इस पर बहस करने से पहले यह तौलना भी जरूरी है कि उनकी इस जीत के पीछे भाजपा की कमजोरी भी कम जिम्मेवार नहीं है। प्रदेश भाजपा के नेता को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए दो दशक से अधिक का समय मिला। नीतीश कुमार भले ही १७ वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं‚ पर बीच में एक–डे़ढ़ वर्ष को छोड़़ दें‚ तो भाजपा भी १७ वर्षों से सत्ता की भागीदार रही है। भाजपा नेताओं को अपना वजूद बढ़ाने के लिए १७ वर्ष कम नहीं है। इन १७ वर्षों में भाजपा नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे रहे। किसी ने अपनी ताकत उतनी नहीं बढ़ायी‚ ताकि नीतीश कुमार या लालू परिवार को चुनावी मैदान में टक्कर दर जा सके। भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि केंद्र या बिहार की सत्ता पाने में अधिक दिलचस्पी रही। वर्ष २०१३ में नीतीश कुमार ने बतौर मुख्यमंत्री भाजपा कोटे के सभी मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया था‚ फिर भी भाजपा नेताओं ने ‘उठने’ की कोशिश नहीं की। अपना कद नहीं बढ़ाया। राजनीतिक पंडि़तों का कहना है कि जनता के लिए त्याग करने की सोच छोड़़ उनकी सत्ता मोह उनपर हावी रही। बिहार में काम करने के लिए बहुत क्षेत्र हैं। जनसमस्याएं बिलबिला रही हैं। जनता के दुख–दर्द व्याप्त है‚ पर सत्ता सुख के आगे किसी ने जनता की पीड़़ा दूर करने की जहमत नहीं उठायी। ऐसा नहीं है कि भाजपा नेताओं में पोटेनशियल नहीं है। सामाजिक व जातीय समीकरण के मापदंड़ पर भी भाजपा के कई नेता महागठबंधन के नेताओं को जबरदस्त टक्कर दे सकते हैं‚ पर वैसे नेताओं ने जनता की खातिर सड़़क पर उतरने से परहेज किया। यदि जदयू और भाजपा के अलग होने की पृष्ठभूमि पर नजर दौड़ायी जाये‚ तो नीतीश और भाजपा के बीच वर्ष २०१९ से ही केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जदयू के प्रतिनिधित्व को लेकर तनातनी चल रही थी। जदयू एक से अधिक प्रतिनिधित्व मांग रहा था‚ किंतु भाजपा के शीर्ष नेताओं ने नीतीश कुमार को मना लिया। इसके बाद वर्ष २०२० के विधानसभा चुनाव के समय टिकट बंटवारे का मामला हो या चिराग पासवान का‚ कई उतार–चढ़ाव आये‚ पर जदयू और भाजपा की दोस्ती पटरी पर चलती रही। फिलहाल जदयू का आरोप जो भी हो‚ पर चुनाव के समय भाजपा ने ईमानदारी दिखाते हुए चिराग पासवान को एनड़ीए से अलग रखा। संघ से जुड़े़ राजेन्द्र सिंह‚ रामेश्वर चौरसिया और उषा विद्यार्थी जैसे नेताओं को भाजपा ने निष्कासित कर दिया था। बाद की परिस्थितियों में इन सभी निष्कासित नेताओं ने चिराग पासवान का झंड़ा उठा लिया और तब संदेश गया कि जदयू को कमजोर करने के लिए यह भाजपा की तरफ से रणनीति अपनायी जा रही है। अलबत्ता बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम आया‚ तो जदयू ४३ सीटों पर सिमट गया। इस परिणाम की टीस जदयू को अबतक है। समझा जाता है इस टीस ने नीतीश कुमार को भाजपा से अलग करने का ग्राउंड़ तैयार किया। हालिया राजनीतिक घटना में आरसीपी सिंह का प्रकरण आया है। इसके लिए भी भाजपा पर ठिकरा फोड़़ा जा रहा है। फिलहाल जो भी परिस्थितियां तैयार हुई हैं‚ उसमें भाजपा की क्या भूमिका हो सकती हैॽ क्या भाजपा बिहार में इतनी कमजोर है कि उसे दो बार सत्ता से बाहर कर दिया जाये और वह गश खाकर गिर जायेॽ इस कमजोरी के जिम्मेवार कहीं भाजपा के नेता ही तो नहींॽ यह विश्लेषण का विषय है। विश्व की सबसे बड़़ी पार्टी का दावा करने वाली भाजपा जदयू के तीर के आगे चित हो जाती है।
दरअसल‚ केंद्र में एनड़ीए की सरकार बनने के बाद से ही जदयू और भाजपा के बीच कई मुद्ों को लेकर मतभेद बना रहा। चाहे केंद्र सरकार में जदयू के शामिल होने का मामला हो या जम्मू–कश्मीर में धारा ३७० का या तीन तलाक पर कानून बनाने का‚ दोनों सहयोगी दलों के बीच खूब आरोप–प्रत्यारोप होता रहा है। जनसख्या नियंत्रण तथा समान नागरिक संहिता मामले पर भी जदयू की राय भाजपा से इतर ही है। एक समय भाजपा के एक विधान पार्षद ने नीतीश कुमार को केन्द्र की राजनीति में जाने का की सलाह दे दी थी। उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव में सीटों के तालमेल मामले में भी जदयू और भाजपा की नहीं बनी थी। वैसे समय में भी भाजपा के कुशल प्रबंधन के कारण दोनों की दोस्ती पर आंच नहीं आई‚ लेकिन अब नयी परिस्थितियों में जदयू और भाजपा की राहें अलग हो गई हैं।







