जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों ने गत मंगलवार को 20 दिनों के भीतर ही कश्मीरी पंडित समुदाय को फिर निशाने पर लेकर टारगेट किलिंग की नृशंस श्रृंखला में नई कड़ी जोड़ दी। उन्होंने कुलगाम में एक सरकारी स्कूल में घुसकर रजनीबाला नाम की शिक्षिका को गोलियों से भून डाला। इससे पहले १२ मई को उन्होंने बड़गाम में सरकारी कर्मचारी राहुल भट के दफ्तर में घुसकर उसकी जान ले ली थी। इस खूंरेजी से स्वाभाविक ही कश्मीरी पंडितों में असुरक्षा बहुत बढ़ गई है और वे विरोध प्रदर्शनों में अपना गुस्सा फोड़ रहे हैं। इतना ही नहीं‚ वे कश्मीर घाटी से बड़े पैमाने पर पलायन की चेतावनी दे रहे हैं और सुरक्षा गारंटी के बिना वहां रहने को तैयार नहीं है।
यह सब इस अर्थ में दुखद है कि ऐसे समय में हो रहा है जब केंद्र सरकार आतंकवाद के लिहाज से देश के इस सबसे संवेदनशील सीमावर्ती राज्य के अमन चैन की ओर बढ़ने और दशकों पहले घाटी के अपने घरबार छोड़ गये पंडितों की घरवापसी की उम्मीद जता रही थी। ‘द कश्मीर फाइल्स’ नामक बहुचर्चित फिल्म को लेकर बहस में तो उसकी ओर से ऐसा जताया जा रहा था जैसे जम्मू–कश्मीर को लेकर जो भी गलतियां हुइ‚ अतीत में ही हुइ और अब वहां सब कुछ चाकचौबंद है‚ लेकिन यह दावा कितना गलत था‚ इसे इस बात से समझ सकते हैं कि गत अक्टूबर में कश्मीर घाटी में पंडितों की टारगेट किंलिंग को लेकर केंद्र सरकार की नींद टूटी तो भी गृहमंत्री अमित शाह को इसके अलावा कुछ नहीं सूझा कि हालात की उच्चस्तरीय समीक्षा के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल व नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी के चीफों को घाटी भेजें और आतंकवादियों के खिलाफ अभियान और तेज कराएं‚ लेकिन उसका भी अब तक कोई हासिल देखने में नहीं आ रहा।
जरा और पीछे जाकर देखें तो २०१९ में जम्मू–कश्मीर संबंधी संविधान का अनुच्छेद ३७० हटाया गया तो देशवासियों को विश्वास दिलाया गया था कि अब वहां न सिर्फ अमन–चैन लौट सकेगा‚ बल्कि भारी निवेश से विकास कार्य तेज होंगे‚ जिनसे खुशहाली आएगी‚ बेरोजगारी का खात्मा होगा‚ विस्थापित कश्मीरी पंडित अपने घरों को लौट सकेंगे और देश का कोई भी नागरिक वहां भूमि खरीद सकेगा। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि वहां शांति बहाल होने के बजाय पंडितों को चुन–चुनकर मारा जाने लगा है‚ जिससे उनके १९९० के विस्थापन के दौर की वापसी होती दिखाई पड़ने लगी है और जिन लोगों ने उस दौर में भी घाटी में बने रहने का हौसला दिखाया था‚ वे भी पलायन की सोच रहे हैं। कुछ महीने पहले तक आतंकी बिहार व उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों से वहां गए प्रवासी मजदूरों को निशाना बना रहे थे और अब वहां के सरकारी कर्मचारियों व शिक्षकों– शिक्षिकाओं को निशाने पर ले रहे हैं। इस सवाल का सामना करें कि ऐसा क्यों है तो जवाब कश्मीर संबंधी सरकारी नीति की बदनीयती व अपंगता की ओर ही ले जाता है।
आगे कश्मीर में आतंकवाद का खात्मा और अमन चैन की बहाली बहुत हद तक इस पर निर्भर करेगी कि केंद्र सरकार उस संबंधी अपने सांप्रदायिक एजेंडे से कितना परहेज कर पाती हैॽ अभी तो न वह अपने सांप्रदायिक एजेंडे से परहेज कर पा रही है और न काहिली से। निस्संदेह यह उसकी काहिली की ही मिसाल है कि उसने अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद जम्मू–कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ने को लेकर बार–बार जताए जा रहे अंदेशों को गंभीरता से नहीं लिया और गफलत में रही कि नागरिकों और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों को विश्वास में लिये बिना राज्य के निवासियों को लगातार संगीनों के साये में रखकर आतंकवादियों से निपट लेगी। उसकी यह गफलत ऐसी थी कि लश्कर–ए–तैयबा की शाखा ‘दि रेसिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) ने गत वर्ष टारगेट किलिंग शुरू करने से एक महीना पहले ही घाटी में रह रहे बाहरी लोगों को टारगेट एवं बहिष्कृत करने की रणनीति का एलान किया था–बाकायदा मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम और वीपीएन–संरक्षित ब्लॉग ‘कश्मीर फाइट’ के माध्यम से दस्तावेज जारी करके‚ लेकिन सरकार को या तो इसकी जानकारी नहीं थी या वह जानबूझकर नादान बनी रही थी‚ जब तक कि टीआरएफ ने अपनी रणनीति पर अमल नहीं शुरू कर दिया।
तब टीआरएफ ने न केवल उन नागरिकों को टारगेट करने की धमकी दी थी जो गैरस्थानीय लोगों को उनके व्यापार में मदद करते हैं‚ या उन्हें रहने के लिए जगह देते हैं‚ बल्कि उन प्रशासनिक अधिकारियों को निशाना बनाने को भी धमकाया था‚ जो गैरस्थानीय लोगों को अधिवास प्रमाण पत्र दिलाने में मदद करते हैं। सरकार इसका समय रहते पता लगाकर या उसे संज्ञान में लेकर अपनी मशीनरी को सक्षम व सचेत बना देती तो असमय जानें गवाने को मजबूर हुए कई निर्दोषों की प्राणरक्षा भी हो जाती‚ लेकिन वह संविधान का अनुच्छेद–३७० हटाने और जम्मू–कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा छीनकर उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित कर देने के साथ जैसे पूरी तरह आश्वस्त हो गई थी कि इससे वहां फैला आतंकवाद उड़न छू हो जाएगा। हालांकि नोटबंदी के बाद उसके द्वारा किया गया ऐसा ही दावा गलत सिद्ध हुआ था और दूध के जले के छाछ भी फूंक–फूंक कर पीने की स्थिति थी‚ जो अभी भी बनी हुई है।
बेहतर होगा कि वह अपनी अब तक की कश्मीर नीति की ईमानदारी से समीक्षा करे और वहां की जनता को विश्वास में लेकर ऐसे कदम उठाए‚ जिनसे क्या स्थानीय और क्या बाहरी सभी लोगों में सुरक्षा की भावना पैदा हो। बहरहाल‚ जैसे भी हो‚ जम्मू–कश्मीर में शांति और विश्वास बहाली बहुत जरूरी है। यह जरूरत पूरी करने के लिए प्रधानमंत्री का सर्वदलीय बैठक बुलाकर विचार–विमर्श करना भी उपयोगी हो सकता है‚ लेकिन यह कहने से कतई काम नहीं चलने वाला कि आतंकवादी हताशा में खूंरेजी पर आमादा हैं। सुनिश्चित करना होगा कि निर्दोष नागरिकों को उनकी हताशा का मूल्य अपनी जानों से न चुकाना पड़े। बहरहाल‚ जैसे भी हो‚ जम्मू–कश्मीर में शांति और विश्वास बहाली बहुत जरूरी है। यह जरूरत पूरी करने के लिए प्रधानमंत्री का सर्वदलीय बैठक बुलाकर विचार–विमर्श करना भी उपयोगी हो सकता है‚ लेकिन यह कहने से कतई काम नहीं चलने वाला कि आतंकवादी हताशा में खूंरेजी पर आमादा हैं। सुनिश्चित करना होगा कि निर्दोष नागरिकों को उनकी हताशा का मूल्य अपनी जानों से न चुकाना पड़े







