कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के आंदोलन के बाद अंतत: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसे ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यहां तक आते-आते सरकार ने बहुत देर कर दी। सरकार के लिए राहत की बात बस इतनी कही जा सकती है कि जो छात्र आंदोलन गले की हड्डी बनता जा रहा था, वह फिलहाल के लिए तो खत्म हो गया है। इसी तरह सरकार इस मसले पर संसद के भीतर विपक्ष की लामबंदी के भी समाप्त होने की उम्मीद के साथ कुछ जरूरी विधयेकों को आगे बढ़ा सकती है।
जिस सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री का यह बयान सदाबहार रहा हो कि इस सरकार में कभी इस्तीफे नहीं होते, वहां धर्मेंद्र प्रधान की रवानगी कई लोगों को हैरान करने वाली लग सकती है। इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं। इस्तीफे के तुरंत बाद सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके की यह हुंकार कि ‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए’ में अनेक लोग ‘सरकार की पराजय’ जैसे भावार्थ निकाल सकते हैं। हालांकि अगर इसे सरकार की हार मान भी लिया जाए तो विपक्ष के लिए भी यह कोई बहुत खुश होने का अवसर नहीं है। इसकी दो वजहें हैं-देश में कोई भी यह मानने को तैयार नहीं कि प्रधान ने इस्तीफा विपक्ष के दबाव में दिया। इसका पूरा श्रेय छात्रों के आंदोलन को ही दिया जा रहा है। प्रधान से इस्तीफा दिलवाकर सरकार ने एक तरह से विपक्ष से वह मुद्दा छीन लिया है, जो शिक्षा व्यवस्था में खामियों को लेकर बन सकता था और इससे सरकार और अधिक मुसीबतों से घिर सकती थी। अब माना जा सकता है कि सरकार पूरे मसले को रफा-दफा करके पूर्व वाली स्थिति में आ जाएगी। वह भविष्य में भी सीजेपी की बात ही ज्यादा सुनेगी, ताकि कांग्रेस और सपा जैसे प्रमुख विपक्षी दलों को नजरअंदाज करने का एक नैरेटिव बना सके।
इस पूरे परिप्रेक्ष्य में इस्तीफों के इतिहास को भी समझने के साथ ही इस्तीफों को लेकर सियासी नफा-नुकसान के बारे में जानना भी समीचीन होगा। एक तात्कालिक आम धारणा यही बनती है कि किसी राजनीतिक हस्ती के इस्तीफे का मतलब है उसके राजनीतिक करियर का खात्मा, लेकिन असल में ऐसा नहीं होता है। एमजे अकबर जैसे कतिपय उदाहरणों को छोड़ दें तो पता चलेगा कि जिस भी शख्स ने इस्तीफा दिया, उसने उसी ताकत के साथ वापसी भी की। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो लाल बहादुर शास्त्री हैं। जब-जब भारतीय राजनीति में सार्वजनिक जवाबदेही और नैतिक मूल्यों की बात होती है, उनकी मिसाल सबसे पहले दी जाती है। वर्ष 1956 में जब शास्त्री देश के रेल मंत्री थे, उसी वर्ष तमिलनाडु में हुए एक भीषण रेल हादसे में 144 यात्रियों की मौत हो गई थी। शास्त्री जी ने हादसे की पूरी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, 1957 के आम चुनाव के बाद पंडित नेहरू ने उन्हें पुनः मंत्रिमंडल में शामिल कर परिवहन एवं संचार मंत्री बनाया। कालांतर में वे देश के प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे।
त्यागपत्र और दमदार राजनीतिक वापसी के शास्त्री अकेले उदाहरण नहीं रहे। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर यह क्रम कई बार दोहराया गया है। जनवरी 1993 में पीवी नरसिंह सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री रहे माधवराव सिंधिया ने भी ऐसी ही मिसाल पेश की थी। दिल्ली एयरपोर्ट पर घने कोहरे के दौरान रूस से लीज पर लिया गया एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। गनीमत यह रही कि इस हादसे में किसी यात्री की जान नहीं गई। फिर भी सिंधिया ने तत्काल नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। लगभग दो साल बाद 1995 में वे पुनः कैबिनेट में स-सम्मान लौटे और 17 जनवरी 1996 तक मंत्री रहे। इस तरह देखा जाए तो भारतीय राजनीति में इस्तीफे अक्सर नैतिक जिम्मेदारी से अधिक राजनीतिक संदेश देने का माध्यम रहे हैं। शास्त्री और सिंधिया ही नहीं, टी.टी. कृष्णमाचारी और शिवराज पाटिल जैसों के उदाहरण भी बताते हैं कि ऐसे इस्तीफे प्रायः राजनीतिक जीवन का अंत नहीं, बल्कि अस्थायी विराम साबित होते हैं। इसलिए प्रधान की भी भविष्य में वापसी की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, मोदी सरकार का इस मुद्दे पर एक अलग नजरिया रहा है। पिछले 12 वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब शीर्ष स्तर पर नैतिक जवाबदेही के सवाल उठे, लेकिन सरकार ने अपने किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया। दरअसल, हर सरकार की अपनी कार्यप्रणाली होती है। मोदी सरकार का संभवतः यह मानना रहा होगा कि किसी मंत्री की बलि लेने या केवल प्रतीकात्मक इस्तीफा कराने के बजाय जिस समस्या के कारण संकट खड़ा हुआ है, उसके मूल कारणों पर काम किया जाए। उदाहरण के तौर पर पेपर लीक के हालिया विवाद में संकट गहराने के बाद सरकार ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कई कड़े कदम उठाए। बेशक, सरकार के ये प्रशासनिक कदम स्वागतयोग्य हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इन कड़े प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ शुरुआत में ही प्रधान का इस्तीफा ले लिया जाता तो न तो इतना बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा हो पाता और न ही विपक्षी दलों को सरकार को चौतरफा घेरने का ऐसा बड़ा नैतिक हथियार मिल पाता।
अब जब प्रधान का इस्तीफा हो गया तो इससे भी भाजपा के समक्ष दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। शिक्षा मंत्रालय वैचारिक दृष्टि से काफी अहम माना जाता है। ऐसे में संघ परिवार के साथ संतुलन साधना एक कठिन काम होगा। भाजपा के लिए उनके ऐसे स्थायी उत्तराधिकारी को चुनना टेढ़ी खीर होगी, जो न केवल संघ के वैचारिक एजेंडे तथा अधूरे शिक्षा सुधारों को आगे बढ़ा सके, बल्कि छात्रों के असंतोष को भी बखूबी दूर कर सके। हालांकि, राजनीति में देरी कभी नहीं मानी जाती। इसलिए सरकार ने डैमेज कंट्रोल करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। राजनीतिक इतिहास गवाह है कि भारतीयों की सियासी याददाश्त काफी कमजोर होती है। वे पुरानी बातों को भुलाकर नए घटनाक्रम पर चर्चा-परिचर्चाओं में व्यस्त हो जाते हैं। सरकार भी इसे भूलकर एक नई शुरुआत करने की उम्मीद कर सकती है।







