नीट पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवा पीढ़ी यानी जेन-जी के प्रदर्शन के बाद पूरे देश में इनकी चर्चा हो रही है. ये विरोध प्रदर्शन बिल्कुल अलग किस्म के थे. कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में आंदोलनकारी युवाओं की मांग पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया. हालांकि आंदोलन की भाषा और मर्यादा को लेकर भी नई बहस छिड़ गई है. दूसरी ओर समाज के एक वर्ग देश और समाज निर्माण में जेन-जी की भूमिका को अहम बनाने की वकालत करने लगा है. इसी कड़ी में तेलंगाना सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है. राज्य सरकार का कहना है कि अब चुनाव लड़ने की उम्र घटाकर 21 वर्ष कर देनी चाहिए. अगर ऐसा होता है तो 2029 के लोकसभा चुनाव में जेन-जी के कई युवा मैदान में उतरने के योग्य हो जाएंगे. अब 18 साल वाले ये जेन-जी 2029 तक 21 साल के हो जाएंगे. हालांकि, यह केवल एक प्रस्ताव है. इसके लिए केंद्र सरकार को कई कानूनी और संवैधानिक कदम उठाने पड़ेंगे. लेकिन, यह बहस अब राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हो चुकी है.
क्या कह रही है तेलंगाना सरकार?
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने ऐलान किया है कि अगस्त में राज्य विधानसभा और विधान परिषद का संयुक्त विशेष सत्र बुलाया जाएगा. इसमें एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र 25 से घटाकर 21 वर्ष करने की मांग की जाएगी. साथ ही राज्यसभा और विधान परिषद के लिए न्यूनतम आयु 30 से घटाकर 25 वर्ष करने का भी प्रस्ताव रखा जाएगा. प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे केंद्र को भेजा जाएगा, ताकि संसद में जरूरी कानून लाया जा सके. रेवंत रेड्डी का तर्क है कि जंतर-मंतर पर हुए जेन-जी के आंदोलन ने दिखाया है कि देश का युवा केवल विरोध नहीं करना चाहता, बल्कि नीति निर्माण में भी अपनी भागीदारी चाहता है.
अभी चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र कितनी है?
- भारत में मतदान और चुनाव लड़ने की उम्र अलग-अलग है.
- मतदाता बनने की उम्र: 18 वर्ष
- लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र: 25 वर्ष
- राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव: 30 वर्ष
- राष्ट्रपति बनने की न्यूनतम उम्र: 35 वर्ष
- उपराष्ट्रपति बनने की न्यूनतम उम्र: 35 वर्ष
यानी कोई युवा 18 साल की उम्र में वोट तो डाल सकता है, लेकिन सांसद या विधायक बनने के लिए उसे कम से कम 25 साल का होना जरूरी है.
बदलाव के लिए क्या करना होगा?
यह बदलाव केवल किसी राज्य सरकार के प्रस्ताव से नहीं हो सकता. लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र भारतीय संविधान के अनुच्छेद 84 और अनुच्छेद 173 में तय की गई है. इसलिए इसे बदलने के लिए संसद को कानून पारित करना होगा. जरूरत पड़ने पर संविधान संशोधन भी करना पड़ सकता है. यानी तेलंगाना विधानसभा प्रस्ताव पारित कर सकती है, लेकिन अंतिम फैसला केंद्र सरकार और संसद के हाथ में होगा.
कांग्रेस ने किस फैसले का दिया उदाहरण?
रेवंत रेड्डी ने इस मांग को कांग्रेस के पुराने फैसलों से भी जोड़ा है. उन्होंने कहा कि 1988 में राजीव गांधी सरकार ने 61वें संविधान संशोधन के जरिए मतदान की उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल कर दी थी. इससे करोड़ों युवाओं को पहली बार मतदान का अधिकार मिला. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पीवी नरसिम्हा राव सरकार के दौरान कई स्थानीय निकायों में चुनाव लड़ने की उम्र 25 से घटाकर 21 वर्ष की गई थी. उनका कहना है कि जब 21-22 साल की उम्र में युवा आईएएस, आईपीएस बन सकते हैं, यूनिकॉर्न कंपनियां खड़ी कर सकते हैं और बड़े कॉरपोरेट चला सकते हैं, तो सांसद या विधायक बनने का अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए?
आखिर Gen-Z को लेकर इतनी चर्चा क्यों?
आमतौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों को जेन-जी कहा जाता है. यही पीढ़ी अब कॉलेजों, नौकरियों, स्टार्टअप और डिजिटल दुनिया में सबसे सक्रिय मानी जाती है. रेवंत रेड्डी का दावा है कि देश की करीब 30 फीसदी आबादी जेन-जी की है, लेकिन 543 सदस्यीय लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व एक प्रतिशत से भी कम है. ऐसे में उनके मुद्दे भी संसद और विधानसभाओं में पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाते. उनका मानना है कि अगर युवाओं को नीति निर्माण में सीधे शामिल करना है तो उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर भी जल्दी मिलना चाहिए.
अगर उम्र घटी तो 2029 में क्या बदलेगा?
अगर केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है और संसद समय रहते कानून बना देती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में 21 से 24 वर्ष के युवा उम्मीदवार मैदान में उतर सकेंगे. इससे राजनीतिक दलों पर भी युवा चेहरों को टिकट देने का दबाव बढ़ सकता है. संसद में पहली बार बड़ी संख्या में ऐसे सांसद पहुंच सकते हैं, जो डिजिटल युग में पले-बढ़े हैं और रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन और सोशल मीडिया जैसे मुद्दों को अलग नजरिए से उठाएं.
क्या सभी इस प्रस्ताव से सहमत होंगे?
इस प्रस्ताव पर बहस होना तय है. समर्थकों का कहना है कि आज का 21 वर्षीय युवा पहले की तुलना में अधिक शिक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और जागरूक है. इसलिए उसे लोकतांत्रिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. वहीं विरोध करने वालों का तर्क हो सकता है कि सांसद और विधायक का पद केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि अनुभव और राजनीतिक समझ भी मांगता है. इसलिए मौजूदा आयु सीमा उचित है. फिलहाल तेलंगाना सरकार ने बहस की शुरुआत कर दी है. लेकिन यह प्रस्ताव कानून बनेगा या नहीं, इसका फैसला संसद करेगी. यदि केंद्र सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र में एक बड़ा बदलाव लेकर आ सकता है.






