भारत की स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ का अवसर देश के लिए गौरव, स्मरण और आत्ममंथन का दिन होना चाहिए था। लेकिन इस बार स्वतंत्रता दिवस के आसपास राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। जिस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों में राष्ट्रभावना जगाई, वही गीत आज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बन गया है।
15 अगस्त 2026 को कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के गायन के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई बातचीत और इशारों का एक वीडियो सामने आने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस से देश से माफी मांगने की मांग तक कर दी। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वीडियो को गलत अर्थ में पेश किया जा रहा है और सोनिया गांधी की ओर से की गई कार्रवाई का उद्देश्य कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था कराना था।
यह विवाद केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है। इसके पीछे भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय प्रतीकों की राजनीतिक व्याख्या से जुड़े कई पुराने प्रश्न भी मौजूद हैं।
वंदे मातरम्: एक गीत से कहीं अधिक
‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना का एक शक्तिशाली माध्यम बना।
स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ‘वंदे मातरम्’ केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं था। यह मातृभूमि के प्रति समर्पण, त्याग और संघर्ष की भावना का प्रतीक था। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों में इस उद्घोष ने लोगों में साहस पैदा किया।
इसी ऐतिहासिक विरासत के कारण आज भी ‘वंदे मातरम्’ का सवाल केवल संगीत या सांस्कृतिक प्रस्तुति का सवाल नहीं रह जाता। इसके साथ करोड़ों भारतीयों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
यही कारण है कि जब राजनीतिक दल इसके सम्मान या गायन को लेकर एक-दूसरे पर सवाल उठाते हैं, तो बहस तुरंत राजनीतिक सीमाओं से बाहर निकलकर भावनात्मक और राष्ट्रीय विमर्श का रूप ले लेती है।
इस बार विवाद कैसे शुरू हुआ?
15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया गया। भाजपा ने समारोह के दौरान कांग्रेस की शीर्ष नेतृत्व-व्यवस्था से जुड़े वीडियो को आधार बनाकर आरोप लगाया कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का व्यवहार राष्ट्रगीत के प्रति उचित सम्मान वाला नहीं था। भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस से माफी की मांग की।
भाजपा का तर्क है कि जिस गीत के साथ स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया, उसके गायन के दौरान किसी भी प्रकार की बातचीत या व्यवधान उचित नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताया। कांग्रेस की ओर से कहा गया कि सोनिया गांधी किसी प्रकार से राष्ट्रगीत को रोकने का प्रयास नहीं कर रही थीं, बल्कि लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था कराने की बात कर रही थीं। कांग्रेस ने यह भी कहा कि समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरे गाए गए।
अर्थात एक ही दृश्य की दो राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ गईं—भाजपा इसे राष्ट्रगीत के प्रति कथित असम्मान के रूप में देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे सामान्य मानवीय और व्यवस्थागत परिस्थिति बता रही है।
भाजपा के लिए राष्ट्रवाद का प्रश्न
भाजपा लंबे समय से राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीकों को अपने राजनीतिक विमर्श के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ‘वंदे मातरम्’ भी इसी व्यापक राष्ट्रवादी विमर्श का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
भाजपा का हमला केवल कांग्रेस के नेताओं के व्यवहार तक सीमित नहीं है। उसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है—क्या कांग्रेस आधुनिक भारत के राष्ट्रवादी प्रतीकों के प्रति उसी भावनात्मक प्रतिबद्धता के साथ खड़ी है, जिसकी अपेक्षा आम भारतीय करता है?
यही सवाल भाजपा नेताओं के बयानों में दिखाई देता है। उनका कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ के प्रति सम्मान किसी दल की विचारधारा का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य का विषय होना चाहिए।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा के लिए यह मुद्दा कांग्रेस की राष्ट्रवादी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का अवसर भी बनता है।
कांग्रेस की चुनौती: इतिहास और वर्तमान के बीच संतुलन
कांग्रेस की स्थिति भी कम जटिल नहीं है। कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक भारत के निर्माण की अपनी ऐतिहासिक भूमिका को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत मानती है।
लेकिन आज कांग्रेस को एक ऐसी राजनीति का सामना करना पड़ रहा है जिसमें राष्ट्रवाद की भाषा का राजनीतिक महत्व पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है।
इसलिए कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर उसे अपनी ऐतिहासिक धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी पहचान को बनाए रखना है, दूसरी ओर उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि उसके किसी नेता या कार्यक्रम को राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति असम्मान के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर विरोधियों को न मिले।
‘वंदे मातरम्’ विवाद इसी चुनौती को सामने लाता है।
क्या राष्ट्रभक्ति का प्रमाण राजनीतिक दल तय करेंगे?
सबसे बड़ा सवाल शायद यही है।
क्या किसी व्यक्ति का ‘वंदे मातरम्’ गाने के दौरान कुछ कहना या किसी व्यवस्था की ओर इशारा करना उसके राष्ट्रप्रेम का प्रमाण या प्रमाण-पत्र बन सकता है?
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सवाल उठाने का अधिकार है। भाजपा को भी कांग्रेस से स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार है और कांग्रेस को अपने पक्ष में सफाई देने का अधिकार है।
लेकिन राष्ट्रभक्ति को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हथियार बना देना लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरनाक हो सकता है।
किसी नागरिक का राष्ट्रप्रेम केवल इस बात से निर्धारित नहीं किया जा सकता कि वह किसी विशेष अवसर पर किस तरीके से राष्ट्रगीत गाता है। उसी प्रकार राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सार्वजनिक सम्मान की अपेक्षा को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
दोनों बातों के बीच संतुलन आवश्यक है।
‘वंदे मातरम्’ बनाम ‘जन गण मन’ का प्रश्न
भारत के राष्ट्रीय जीवन में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ दोनों का अपना विशिष्ट स्थान है। ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत के रूप में सम्मानित है।
इस अंतर को समझना भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान लोकतांत्रिक नागरिकता का हिस्सा है, लेकिन उनके इतिहास और संवैधानिक-सांस्कृतिक स्थान को समझना भी उतना ही जरूरी है।
राजनीतिक बयानबाजी में जब इन प्रतीकों को केवल ‘हम बनाम वे’ के चश्मे से देखा जाता है, तब उनकी वास्तविक ऐतिहासिक गरिमा कहीं पीछे छूट जाती है।
संसद से लेकर पार्टी कार्यालय तक
यह विवाद ऐसे समय आया है जब संसद में भी ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को लेकर चर्चा और राजनीतिक बहस हुई। 13 अगस्त 2026 को लोकसभा में पहली बार राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरे गाए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
इसके बाद स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय की घटना ने इस विषय को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया।
यानी संसद से लेकर राजनीतिक दलों के कार्यालयों तक ‘वंदे मातरम्’ एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इस बहस को इतिहास और सम्मान की दिशा में ले जाया जाएगा या फिर यह केवल अगले राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनकर रह जाएगी?
राजनीतिक लाभ की तलाश
राजनीति में प्रतीकों का महत्व बहुत अधिक होता है। राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, संविधान और स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत—ये सभी राजनीतिक विमर्श में जनता की भावनाओं को प्रभावित करते हैं।
भाजपा के लिए कांग्रेस को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर घेरना राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है। वहीं कांग्रेस के लिए भाजपा पर राष्ट्रवाद को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगाना अपने समर्थक वर्ग को लामबंद करने का माध्यम हो सकता है।
लेकिन इस राजनीतिक रणनीति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि राष्ट्रीय प्रतीक दलगत राजनीति के घेरे में आ जाते हैं।
‘वंदे मातरम्’ किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है।
न भाजपा इसकी मालिक है, न कांग्रेस।
यह उन लाखों-करोड़ों भारतीयों की साझा विरासत है, जिन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष में अपने प्राण न्योछावर किए।
आज के युवाओं के लिए संदेश क्या है?
आज का युवा भारत स्वतंत्रता आंदोलन को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव नहीं कर सकता। उसके लिए स्वतंत्रता संग्राम इतिहास की किताबों, फिल्मों, स्मारकों और राष्ट्रीय प्रतीकों के माध्यम से जीवित है।
यदि युवा पीढ़ी को यह संदेश मिले कि ‘वंदे मातरम्’ भी राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का विषय है, तो राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा प्रभावित हो सकती है।
इसके विपरीत यदि राजनीतिक दल मिलकर यह संदेश दें कि अलग-अलग विचारधाराओं के बावजूद राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान साझा जिम्मेदारी है, तो लोकतंत्र अधिक मजबूत होगा।
राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की ताकत हैं; राष्ट्रीय प्रतीकों पर साझा सम्मान लोकतंत्र की मर्यादा।
क्या कांग्रेस को माफी मांगनी चाहिए?
भाजपा ने कांग्रेस से माफी की मांग की है। लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरे वीडियो, घटना के संदर्भ और संबंधित पक्षों के स्पष्टीकरण को देखना आवश्यक है।
केवल कुछ सेकंड के वीडियो या किसी एक राजनीतिक दल की व्याख्या के आधार पर किसी व्यक्ति की राष्ट्रभक्ति पर अंतिम फैसला सुनाना उचित नहीं होगा।
यदि वास्तव में किसी नेता ने जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान किया हो, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन यदि घटना का कारण कोई प्रशासनिक या व्यक्तिगत परिस्थिति थी, तो उसे राष्ट्रगीत के अपमान से जोड़ना भी उचित नहीं होगा।
यही लोकतांत्रिक विवेक है।
असली जरूरत: राष्ट्रवाद नहीं, राष्ट्रभाव
आज भारत को ऐसे राष्ट्रवाद की जरूरत है जो राजनीतिक नारे से आगे बढ़कर नागरिक जिम्मेदारी में दिखाई दे।
‘वंदे मातरम्’ कहने के साथ यदि हम सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें, कानून का सम्मान करें, गरीब और कमजोर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करें, भ्रष्टाचार का विरोध करें, महिलाओं का सम्मान करें और देश की एकता को मजबूत करें—तभी राष्ट्रभक्ति का वास्तविक अर्थ सामने आएगा।
राष्ट्रभक्ति केवल मंच पर खड़े होकर नारा लगाने में नहीं है। राष्ट्रभक्ति उस किसान में भी है जो खेत में मेहनत करता है, उस सैनिक में भी है जो सीमा पर खड़ा है, उस वैज्ञानिक में भी है जो देश के लिए नई तकनीक विकसित करता है, उस शिक्षक में भी है जो बच्चों को शिक्षित करता है और उस नागरिक में भी है जो अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करता है।
निष्कर्ष: ‘वंदे मातरम्’ को राजनीति से ऊपर रखने का समय
कांग्रेस और भाजपा के बीच ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी ताजा विवाद भारतीय राजनीति की उस प्रवृत्ति को सामने लाता है जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक भी राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं।
भाजपा का आरोप गंभीर है, कांग्रेस का स्पष्टीकरण भी दर्ज किया जाना चाहिए। लेकिन अंतिम रूप से यह बहस किसी दल की जीत या हार नहीं होनी चाहिए।
क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ भाजपा का नहीं है।
‘वंदे मातरम्’ कांग्रेस का भी नहीं है।
‘वंदे मातरम्’ भारत का है।
इसलिए इसकी गरिमा को चुनावी राजनीति, आरोप-प्रत्यारोप और सोशल मीडिया की तात्कालिक सनसनी से ऊपर रखना ही स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
राजनीतिक दलों के बीच मतभेद रहें, बहस हो, तीखी आलोचना हो—यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब बात राष्ट्र के प्रतीकों की हो, तो दलों को एक क्षण के लिए राजनीति से ऊपर उठकर यह याद करना चाहिए कि जिन प्रतीकों पर आज बहस हो रही है, उनके लिए कभी हजारों लोगों ने अपना जीवन दांव पर लगाया था।
‘वंदे मातरम्’ को लेकर सबसे बड़ी जीत किसी पार्टी की नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय भावना की होनी चाहिए जिसने भारत को स्वतंत्र बनाया।
और शायद आज इस गीत की सबसे बड़ी पुकार यही है—
राजनीति अलग हो सकती है, लेकिन मातृभूमि एक है।
वंदे मातरम् पर सियासी घमासान: राष्ट्रगीत से राजनीति तक
लेख
भारत की स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ का अवसर देश के लिए गौरव, स्मरण और आत्ममंथन का दिन होना चाहिए था। लेकिन इस बार स्वतंत्रता दिवस के आसपास राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। जिस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों में राष्ट्रभावना जगाई, वही गीत आज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बन गया है।
15 अगस्त 2026 को कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के गायन के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई बातचीत और इशारों का एक वीडियो सामने आने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस से देश से माफी मांगने की मांग तक कर दी। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वीडियो को गलत अर्थ में पेश किया जा रहा है और सोनिया गांधी की ओर से की गई कार्रवाई का उद्देश्य कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था कराना था।
यह विवाद केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है। इसके पीछे भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय प्रतीकों की राजनीतिक व्याख्या से जुड़े कई पुराने प्रश्न भी मौजूद हैं।
वंदे मातरम्: एक गीत से कहीं अधिक
‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना का एक शक्तिशाली माध्यम बना।
स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ‘वंदे मातरम्’ केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं था। यह मातृभूमि के प्रति समर्पण, त्याग और संघर्ष की भावना का प्रतीक था। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों में इस उद्घोष ने लोगों में साहस पैदा किया।
इसी ऐतिहासिक विरासत के कारण आज भी ‘वंदे मातरम्’ का सवाल केवल संगीत या सांस्कृतिक प्रस्तुति का सवाल नहीं रह जाता। इसके साथ करोड़ों भारतीयों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
यही कारण है कि जब राजनीतिक दल इसके सम्मान या गायन को लेकर एक-दूसरे पर सवाल उठाते हैं, तो बहस तुरंत राजनीतिक सीमाओं से बाहर निकलकर भावनात्मक और राष्ट्रीय विमर्श का रूप ले लेती है।
इस बार विवाद कैसे शुरू हुआ?
15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया गया। भाजपा ने समारोह के दौरान कांग्रेस की शीर्ष नेतृत्व-व्यवस्था से जुड़े वीडियो को आधार बनाकर आरोप लगाया कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का व्यवहार राष्ट्रगीत के प्रति उचित सम्मान वाला नहीं था। भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस से माफी की मांग की।
भाजपा का तर्क है कि जिस गीत के साथ स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया, उसके गायन के दौरान किसी भी प्रकार की बातचीत या व्यवधान उचित नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताया। कांग्रेस की ओर से कहा गया कि सोनिया गांधी किसी प्रकार से राष्ट्रगीत को रोकने का प्रयास नहीं कर रही थीं, बल्कि लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था कराने की बात कर रही थीं। कांग्रेस ने यह भी कहा कि समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरे गाए गए।
अर्थात एक ही दृश्य की दो राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ गईं—भाजपा इसे राष्ट्रगीत के प्रति कथित असम्मान के रूप में देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे सामान्य मानवीय और व्यवस्थागत परिस्थिति बता रही है।
भाजपा के लिए राष्ट्रवाद का प्रश्न
भाजपा लंबे समय से राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीकों को अपने राजनीतिक विमर्श के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ‘वंदे मातरम्’ भी इसी व्यापक राष्ट्रवादी विमर्श का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
भाजपा का हमला केवल कांग्रेस के नेताओं के व्यवहार तक सीमित नहीं है। उसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है—क्या कांग्रेस आधुनिक भारत के राष्ट्रवादी प्रतीकों के प्रति उसी भावनात्मक प्रतिबद्धता के साथ खड़ी है, जिसकी अपेक्षा आम भारतीय करता है?
यही सवाल भाजपा नेताओं के बयानों में दिखाई देता है। उनका कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ के प्रति सम्मान किसी दल की विचारधारा का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य का विषय होना चाहिए।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा के लिए यह मुद्दा कांग्रेस की राष्ट्रवादी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का अवसर भी बनता है।
कांग्रेस की चुनौती: इतिहास और वर्तमान के बीच संतुलन
कांग्रेस की स्थिति भी कम जटिल नहीं है। कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक भारत के निर्माण की अपनी ऐतिहासिक भूमिका को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत मानती है।
लेकिन आज कांग्रेस को एक ऐसी राजनीति का सामना करना पड़ रहा है जिसमें राष्ट्रवाद की भाषा का राजनीतिक महत्व पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है।
इसलिए कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर उसे अपनी ऐतिहासिक धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी पहचान को बनाए रखना है, दूसरी ओर उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि उसके किसी नेता या कार्यक्रम को राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति असम्मान के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर विरोधियों को न मिले।
‘वंदे मातरम्’ विवाद इसी चुनौती को सामने लाता है।
क्या राष्ट्रभक्ति का प्रमाण राजनीतिक दल तय करेंगे?
सबसे बड़ा सवाल शायद यही है।
क्या किसी व्यक्ति का ‘वंदे मातरम्’ गाने के दौरान कुछ कहना या किसी व्यवस्था की ओर इशारा करना उसके राष्ट्रप्रेम का प्रमाण या प्रमाण-पत्र बन सकता है?
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सवाल उठाने का अधिकार है। भाजपा को भी कांग्रेस से स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार है और कांग्रेस को अपने पक्ष में सफाई देने का अधिकार है।
लेकिन राष्ट्रभक्ति को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हथियार बना देना लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरनाक हो सकता है।
किसी नागरिक का राष्ट्रप्रेम केवल इस बात से निर्धारित नहीं किया जा सकता कि वह किसी विशेष अवसर पर किस तरीके से राष्ट्रगीत गाता है। उसी प्रकार राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सार्वजनिक सम्मान की अपेक्षा को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
दोनों बातों के बीच संतुलन आवश्यक है।
‘वंदे मातरम्’ बनाम ‘जन गण मन’ का प्रश्न
भारत के राष्ट्रीय जीवन में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ दोनों का अपना विशिष्ट स्थान है। ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत के रूप में सम्मानित है।
इस अंतर को समझना भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान लोकतांत्रिक नागरिकता का हिस्सा है, लेकिन उनके इतिहास और संवैधानिक-सांस्कृतिक स्थान को समझना भी उतना ही जरूरी है।
राजनीतिक बयानबाजी में जब इन प्रतीकों को केवल ‘हम बनाम वे’ के चश्मे से देखा जाता है, तब उनकी वास्तविक ऐतिहासिक गरिमा कहीं पीछे छूट जाती है।
संसद से लेकर पार्टी कार्यालय तक
यह विवाद ऐसे समय आया है जब संसद में भी ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को लेकर चर्चा और राजनीतिक बहस हुई। 13 अगस्त 2026 को लोकसभा में पहली बार राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरे गाए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
इसके बाद स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय की घटना ने इस विषय को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया।
यानी संसद से लेकर राजनीतिक दलों के कार्यालयों तक ‘वंदे मातरम्’ एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इस बहस को इतिहास और सम्मान की दिशा में ले जाया जाएगा या फिर यह केवल अगले राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनकर रह जाएगी?
राजनीतिक लाभ की तलाश
राजनीति में प्रतीकों का महत्व बहुत अधिक होता है। राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, संविधान और स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत—ये सभी राजनीतिक विमर्श में जनता की भावनाओं को प्रभावित करते हैं।
भाजपा के लिए कांग्रेस को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर घेरना राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है। वहीं कांग्रेस के लिए भाजपा पर राष्ट्रवाद को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगाना अपने समर्थक वर्ग को लामबंद करने का माध्यम हो सकता है।
लेकिन इस राजनीतिक रणनीति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि राष्ट्रीय प्रतीक दलगत राजनीति के घेरे में आ जाते हैं।
‘वंदे मातरम्’ किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है।
न भाजपा इसकी मालिक है, न कांग्रेस।
यह उन लाखों-करोड़ों भारतीयों की साझा विरासत है, जिन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष में अपने प्राण न्योछावर किए।
आज के युवाओं के लिए संदेश क्या है?
आज का युवा भारत स्वतंत्रता आंदोलन को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव नहीं कर सकता। उसके लिए स्वतंत्रता संग्राम इतिहास की किताबों, फिल्मों, स्मारकों और राष्ट्रीय प्रतीकों के माध्यम से जीवित है।
यदि युवा पीढ़ी को यह संदेश मिले कि ‘वंदे मातरम्’ भी राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का विषय है, तो राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा प्रभावित हो सकती है।
इसके विपरीत यदि राजनीतिक दल मिलकर यह संदेश दें कि अलग-अलग विचारधाराओं के बावजूद राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान साझा जिम्मेदारी है, तो लोकतंत्र अधिक मजबूत होगा।
राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की ताकत हैं; राष्ट्रीय प्रतीकों पर साझा सम्मान लोकतंत्र की मर्यादा।
क्या कांग्रेस को माफी मांगनी चाहिए?
भाजपा ने कांग्रेस से माफी की मांग की है। लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरे वीडियो, घटना के संदर्भ और संबंधित पक्षों के स्पष्टीकरण को देखना आवश्यक है।
केवल कुछ सेकंड के वीडियो या किसी एक राजनीतिक दल की व्याख्या के आधार पर किसी व्यक्ति की राष्ट्रभक्ति पर अंतिम फैसला सुनाना उचित नहीं होगा।
यदि वास्तव में किसी नेता ने जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान किया हो, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन यदि घटना का कारण कोई प्रशासनिक या व्यक्तिगत परिस्थिति थी, तो उसे राष्ट्रगीत के अपमान से जोड़ना भी उचित नहीं होगा।
यही लोकतांत्रिक विवेक है।
असली जरूरत: राष्ट्रवाद नहीं, राष्ट्रभाव
आज भारत को ऐसे राष्ट्रवाद की जरूरत है जो राजनीतिक नारे से आगे बढ़कर नागरिक जिम्मेदारी में दिखाई दे।
‘वंदे मातरम्’ कहने के साथ यदि हम सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें, कानून का सम्मान करें, गरीब और कमजोर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करें, भ्रष्टाचार का विरोध करें, महिलाओं का सम्मान करें और देश की एकता को मजबूत करें—तभी राष्ट्रभक्ति का वास्तविक अर्थ सामने आएगा।
राष्ट्रभक्ति केवल मंच पर खड़े होकर नारा लगाने में नहीं है। राष्ट्रभक्ति उस किसान में भी है जो खेत में मेहनत करता है, उस सैनिक में भी है जो सीमा पर खड़ा है, उस वैज्ञानिक में भी है जो देश के लिए नई तकनीक विकसित करता है, उस शिक्षक में भी है जो बच्चों को शिक्षित करता है और उस नागरिक में भी है जो अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करता है।
निष्कर्ष: ‘वंदे मातरम्’ को राजनीति से ऊपर रखने का समय
कांग्रेस और भाजपा के बीच ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी ताजा विवाद भारतीय राजनीति की उस प्रवृत्ति को सामने लाता है जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक भी राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं।
भाजपा का आरोप गंभीर है, कांग्रेस का स्पष्टीकरण भी दर्ज किया जाना चाहिए। लेकिन अंतिम रूप से यह बहस किसी दल की जीत या हार नहीं होनी चाहिए।
क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ भाजपा का नहीं है।
‘वंदे मातरम्’ कांग्रेस का भी नहीं है।
‘वंदे मातरम्’ भारत का है।
इसलिए इसकी गरिमा को चुनावी राजनीति, आरोप-प्रत्यारोप और सोशल मीडिया की तात्कालिक सनसनी से ऊपर रखना ही स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
राजनीतिक दलों के बीच मतभेद रहें, बहस हो, तीखी आलोचना हो—यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब बात राष्ट्र के प्रतीकों की हो, तो दलों को एक क्षण के लिए राजनीति से ऊपर उठकर यह याद करना चाहिए कि जिन प्रतीकों पर आज बहस हो रही है, उनके लिए कभी हजारों लोगों ने अपना जीवन दांव पर लगाया था।
‘वंदे मातरम्’ को लेकर सबसे बड़ी जीत किसी पार्टी की नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय भावना की होनी चाहिए जिसने भारत को स्वतंत्र बनाया।
और शायद आज इस गीत की सबसे बड़ी पुकार यही है—
राजनीति अलग हो सकती है, लेकिन मातृभूमि एक है।







