पुलिस की नौकरी काफी जोखिम भरी होती है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान अपराधी कभी भी हथियार से हमला कर सकते हैं, इसलिए अपनी जान बचाने और असामाजिक तत्वों का मुकाबला करने के लिए ही पुलिस को सरकार द्वारा हथियार दिया जाता है।
‘एनकाउंटर’ के लिए कानून में अलग से प्रावधान नहीं है। कानून कहता है कि आत्मरक्षार्थ या किसी और की जान बचाने के लिए पुलिस वाले दूसरे की जान ले सकते हैं। किसी और की जान अर्थात सहयोगी, सहकर्मी या नागरिक की। मान लीजिए, अपराधी ने किसी व्यक्ति को पकड़कर उसके सिर पर पिस्तौल तान रखी है और पुलिस के आगे बढ़ने पर वह उस व्यक्ति को गोली मार देने की धमकी दे रहा है। उस परिस्थिति में पुलिस को अधिकार है कि वह बंधक बनाए गए व्यक्ति को बचाने के लिए उस अपराधी को गोली मार दे।
एक समय चंबल के डकैतों के साथ पुलिस की खूब मुठभेड़ होती थीं। उनको गिरफ्तार करने के लिए पुलिस की बड़ी-बड़ी टुकड़ियां जाती थीं। धर-पकड़ के क्रम में डकैतों की तरफ से फायरिंग होती थीं, तब पुलिस भी आत्मरक्षा में गोली चलाती थी। ऐसी ही स्थिति में मौत होती है। कानूनन स्थिति तो यही है। आम तौर पर सुरक्षा के लिए वैध हथियार रखे जाते हैं। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में अपनी सुरक्षा के लिए लोगों द्वारा अवैध हथियार रखने का भी चलन है। कभी-कभी आरोप लगते हैं कि पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर कर दिया है। उस समय परिस्थितियां क्या होती हैं, यह देखने के लिए मौके पर न तो मीडिया उपस्थित रहता है और न कोई अन्य स्वतंत्र पक्ष।
बिहार के भरत भूषण तिवारी मुठभेड़ को देखें, तो सभी तथ्यों का सूक्ष्म परीक्षण न्यायिक आयोग द्वारा किया जाएगा और वस्तु स्थिति सामने आ ही जाएगी। इस प्रकरण में मीडिया से जानकारी मिली है कि एनकाउंटर के एक-दो दिन पहले से यह तमाशा चल रहा था। ऐसी परिस्थिति में मामले के पटाक्षेप के लिए पर्याप्त समय था। क्या इसके लिए गांव के प्रतिष्ठित लोगों को सामने नहीं आना चाहिए था? स्थानीय जन-प्रतिनिधियों ने दखल क्यों नहीं दिया? समाज में सबकी जिम्मेदारी होती है। परिवार के लोग यदि आरोपी से पिस्तौल छीनकर पुलिस को सौंप देते, तो संभवत: यह नौबत नहीं आती। हमारे समय में शातिर अपराधी या बैंक लुटेरों द्वारा पुलिस पर गोली चलाने के क्रम में ही मुठभेड़ हुआ करती थी और अपराधी मारे जाते थे। एनकाउंटर में मृत या जख्मी व्यक्तियों की आपराधिक पृष्ठभूमि को जानना जरूरी होता है, ताकि स्पष्ट हो सके कि उससे निपटने के लिए गोली चलाना जरूरी है या नहीं।
आम तौर पर किसी भी छापे में हथियारबंद पुलिसकर्मी ही जाते हैं। बड़ी छापेमारी में एसटीएफ जैसे प्रशिक्षित बल को उतारा जाता है। 1980 के दशक में चंपारण (बिहार) में दस्यु गिरोहों के उन्मूलन के लिए ‘ब्लैक पैंथर’ अभियान चलाया गया था, जिसमें भारी संख्या में पुलिसकर्मियों को चंपारण में तैनात किया गया और डकैत गिरोहों का आतंक समाप्त किया गया। ऐसे अभियानों के दौरान परिस्थिति के मुताबिक तैयारी की जाती है। इलाके की भौगोलिक स्थिति, आने-जाने के रास्ते इत्यादि की जानकारी प्राप्त करने के पश्चात तलाशी अभियान शुरू किया जाता है। इस क्रम में यदि छिपे हुए अपराधी पुलिस पर आक्रमण करते हैं, तो उनके विरुद्ध बल प्रयोग की कार्रवाई की जाती है, जिसमें गोली भी चल सकती है।
बड़े मुठभेड़ की घटनाओं से पहले पुलिस अपने नेटवर्क और स्थानीय मुखबिरों के जरिये सटीक जानकारी जुटाती है। फिर मैपिंग, ब्लू प्रिंट के साथ घेराबंदी करते हुए विशेष दस्ते को लेकर मुठभेड़ करती है। इसमें परिस्थिति को देखते हुए सुरक्षा-कवच धारण करना होता है। इन परिस्थितियों के बीच अगर पुलिस को अपनी जान पर खतरा दिखेगा, तो वह हमलावरों पर गोली चलाने में हिचकेगी नहीं।
एनकाउंटर ‘कानून का राज’ स्थापित करने के लिए होता है। पुलिस को समाज और व्यवस्था का संरक्षक माना जाता है। यही उसकी मुख्य भूमिका है। अपराधियों से समाज को खतरा होता है। ऐसे में, पुलिस संगठित आपराधिक गिरोहों के मनोबल को तोड़कर आम जनता में कानून व सुरक्षा की भावना बहाल करने के लिए अपराधियों से मुठभेड़ करती है। अपराधियों के अंदर यह भय होना ही चाहिए कि वे अगर वर्दीवाले पर हमला करेंगे या मुकाबला करेंगे, तो उनकी जान जा सकती है। अगर वे प्रतिरोध न करें और पुलिस को देखते ही आत्म-समर्पण कर दें, तो एनकाउंटर कहां होगा? जहां अपराधी ऐसा नहीं करते हैं और सुरक्षा बलों से लड़ना शुरू करते हैं, वहीं पर जवाबी कार्रवाई की जाती है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा मुठभेड़ को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इसके आलोक में आगे की कार्रवाई की जानी चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि ऐसे मामलों में किसी नागरिक के अधिकारों का हनन नहीं हो और न ही पुलिस बल का मनोबल गिरने पाए, ताकि जो जिम्मेदारी समाज में उसे निभानी है, उसका वह निर्वहन कर सके। फर्जी मुठभेड़ों के मामले में परिस्थिति से ही स्पष्ट होता है कि उसमें दोषी कौन लोग थे और उनके विरुद्ध नियमानुसार कानूनी एवं विभागीय कार्रवाई समय-समय पर की जाती है। कुछेक मामले में मानवाधिकार आयोगों द्वारा पीड़ित पक्ष को मुआवजा भी देने का निर्देश दिया जाता है। साथ ही दोषी कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करने की भी अनुशंसा की जाती है।
प्रजातांत्रिक व्यवस्था में पुलिस का कामकाज पारदर्शी होना चाहिए, ताकि लोग उसके द्वारा की गई कार्रवाइयों को संदेह की दृष्टि से न देखें। ऐसे मामले में यदि पुलिसकर्मियों पर मुकदमा होता है, तो उसका अनुसंधान भी किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे सीआईडी या सीबीआई से होनी चाहिए। मूलत: जांच उसी जिला के पुलिसकर्मियों द्वारा नहीं की जानी चाहिए, जहां के पुलिसकर्मी मुठभेड़ में शामिल रहे हों। यदि एसटीएफ जैसी एजेंसी शामिल हो, तो सीआईडी द्वारा मामले की जांच-पड़ताल की जानी चाहिए।
अपराधी को सजा देना पुलिस का काम नहीं
बिहार की राजधानी पटना के निकट ही है भोजपुर; और भोजपुर का नया चर्चित चेहरा भरत तिवारी! कहानी की तरह जो बात हर कहीं कही और छापी जा रही है, वह कुछ यूं है कि कुछ लोग भरत को अपराधी करार दे रहे हैं, कुछ उन्हें रॉबिनहुड का अवतार बता रहे हैं, लेकिन इन सारी आवाजों और शोर के बीच जो बात उभर ही नहीं पा रही है, वह है राज्य द्वारा नागरिकों का शिकार। इसे ‘एनकाउंटर’ कहिए या ‘फेक एनकाउंटर’, सच्ची और ठोस हकीकत यह है कि एक भरत तिवारी नाम का युवक था, जो पुलिस के काबू में नहीं आ रहा था। पुलिस ने उसे गोली मारकर काबू में कर लिया। पुलिस के मुताबिक, जो अपराधी था, वह नहीं रहा, तो कहानी तमाम होती है। क्या सच में कहानी तमाम होती है?
साल 2005 का गुजरात! पूरा देश सोहराबुद्दीन शेख नाम के आतंकी के एनकाउंटर की कहानी से गूंज रहा था। तब आलम ऐसा बनाया गया था, मानो आतंकियों का कोई अंतरराष्ट्रीय गैंग है, जिसने गुजरात में अपनी तमाम ताकत झोंक दी है। वहां से पुलिस-आतंकियों के मुठभेड़ की रोज एक कहानी सामने आती थी और कमाल यह था कि हर कहानी के अंत में आतंकी मारे जाते थे, पुलिस को खरोंच तक नहीं आती थी। आज एनकाउंटर के तमाम मामले गहरे शक के घेरे में हैं। कई मामले तो ऐसे हैं, जिसमें अदालत ने कथित अपराधियों को निर्दोष बता दिया है।
आतंकी कार्रवाई का चरम था मुंबई बम ब्लास्ट! उस केस में सालों मुकदमे के बाद भी पुलिस-प्रशासन अदालत को संतुष्ट नहीं कर सका कि वह जिन्हें आतंकवादी या आतंकी पड्यंत्र में शामिल बता रहा है, उसमें सत्य व तथ्य हैं। वर्षों जेल में रहने के बाद एक-एक कर वे सभी निरीह लोग रिहा होते गए, जिनका जीवन बर्बाद हो चुका था। क्या वे सब निर्दोष थे? कौन कहे? पुलिस ने किसी को ऐसा कहने लायक नहीं छोड़ा। अलबत्ता, यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि पुलिस की भूमिका पर अदालत को गहरा संदेह है।
हैदराबाद का साल 2019 का वह मामला याद कीजिए, जब वहां की पुलिस ने चार लोगों का दिन-दहाड़े एनकाउंटर कर दिया था और कारण यह बताया था कि वे अपराधी पुलिस से उसका हथियार छीनकर, उस पर हमला करने की कोशिश में थे। पुलिस ने बड़ी वाहवाही लूटी कि उसने दुर्दांत अपराधियों का काम तमाम कर दिया। बाद में इस कहानी के दूसरे पन्ने खुले और खुलते चले गए। आखिरी पन्ना यह कहता है कि जिस तरह आरोपियों का काम तमाम किया गया, उसे पुलिसिया गुंडागर्दी कहना चाहिए। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की वह टिप्पणी पुलिस संगठन के लिए एक सबक होनी चाहिए थी।
हमारा संविधान कहता है कि आप इस तरह किसी की कहानी तमाम नहीं कर सकते! संविधान आगे कहता है, पुलिस का काम अपराध की रोकथाम करना है और जो अपराधी बेकाबू हो जाए, उसे गिरफ्तार करके न्यायालय में लाना है, ताकि न्यायालय उसे संविधान के मुताबिक सजा दे सके। अदालत ने उसे जो सजा दी, उसके साथ उस व्यक्ति को जेल तक पहुंचा देना पुलिस का काम है। संविधान इससे अधिक या इससे आगे पुलिस की किसी भूमिका को मान्य नहीं करता है। यहीं एक पेच भी है कि संविधान यह भी कहता है कि आत्मरक्षा में किसी की जान चली जाए, तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा। संविधान के इसी अनुच्छेद की आड़ में वह सारी मनमानी चलती है, जिसे हम यहां एनकाउंटर, फेक एनकाउंटर या पुलिस-अपराधी मुठभेड़ कह रहे हैं।
संविधान की एक दिक्कत यह है कि उसके शब्द और हेतु के बीच एक खाई है। शब्द व अर्थ के बीच ऐसी खाई हरेक जगह है और यह एकदम स्वाभाविक भी है, क्योंकि शब्द हमेशा बेजान होते हैं। शब्द जो कहना चाहते हैं, वह वे तभी पूरी तरह कह पाते हैं, जब कोई उन शब्दों को आचरण में उतारता है। जब आप शब्दों को आचरण से दूर कर देते हैं, तो वे बेजान व अर्थहीन हो जाते हैं। संविधान ने कहा कि पुलिस अपराधी को पकड़े और अदालत के सामने पेश करे, यही उसका काम है। न आगे, न पीछे। अब पुलिस भी जानती है और हम सब भी जानते हैं कि अपराधी हाथ बांधकर तो सामने आएगा नहीं कि पुलिस भाई, हम यहां खड़े हैं। आओ और अपनी सांविधानिक जिम्मेदारी पूरी कर लो! वह भागेगा, धोखा देगा, धमकी देगा, कभी हमला भी कर सकता है, पर पुलिस को अपनी सांविधानिक भूमिका यदि याद है, तो वह ऐसी तमाम कोशिशों को नाकाम करते हुए, बगैर उत्तेजित हुए उसे घेरती रहेगी, बांधती-साधती, निरुपाय करती रहेगी। चूहे-बिल्ली का यह खेल लंबा नहीं चल सकता है।
अपराधी या आतंकी हमेशा कमजोर पिच पर खेलता होता है। नियमतः चलने वाली पुलिस के पीछे पूरा देश, संविधान खड़ा होता है, तो अंततः वह अपराधी टूटेगा ही। इधर वह टूटा, उधर पुलिस को अपना काम पूरा करने का मौका मिला। इसमें जितना वक्त लगेगा, पुलिस को जितना धैर्य रखना पड़ेगा, वह संविधान के पालन की कीमत है। लोकतंत्र की यह कम से कम कीमत है, जिसे सबको अदा करना चाहिए। पुलिस अपनी विफलता, भ्रष्ट आचरण, अपने ऊपर के अधिकारियों के अहं की तुष्टि, यानी सत्ताधीशों के स्वार्थ को पूरा करने का औजार बन जाती है, तब एनकाउंटर वाला रास्ता खुलता है।
स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली यह हिदायत हमें याद रखनी चाहिए कि भले अपराधी छूट जाएं, पर निरपराध को सजा नहीं मिले। यह हिदायत अपराधियों को छूट देने की बात नहीं करती है, यह बताना चाहती है कि अपराधी व निर्दोष के बीच एक अत्यंत पतली लकीर होती है, जिसे कोई पार न कर जाए, इसकी सावधानी प्रशासन को, सरकार को रखनी ही चाहिए। ऐसा नहीं हुआ, तो समाज एक ऐसे जंगल में बदल जाएगा जिसमें हर शक्तिवान अपने से कम शक्तिवान का शिकार खेलेगा। हम ऐसे जंगल में रहना चाहते हैं कि समाज में? इसके जवाब में आप जो कहेंगे, उससे ही तय होगा कि आप लोकतंत्र के नागरिक हैं या किसी के पोशीदा हेतु को पूरा करने के औजार?







