गुटबाजी के शिकार हो चली जनता दल यूनाइ़टेड (JDU) की राजनीति में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार एक उम्मीद बन कर उभरे हैं, इससे इनकार तो नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ दिनों की ही बात करें तो नीतीश कुमार का विकल्प कौन पूछे जाने पर जदयू के भीतर से ही कोई पुख्ता आवाज नहीं आती दिखती थी। यह तो बीजेपी के बढ़ते दबदबे का कमाल कहें कि उसकी राजनीति को नियंत्रित करने या नीतीश कुमार की गंगा जमुनी संस्कृति को धार देने के लिए बहुत ही मेहनत के बाद निशांत कुमार का आगमन काफी किन्तु परंतु के बाद हुआ। यूं ही नहीं निशांत कुमार जदयू के भविष्य के रूप में प्रोजेक्ट किए जाने लगे। चलिए जानते हैं ऐसे कौन कौन से कारण है।
नीतीश कुमार का बेटा होना
जदयू के भविष्य के रूप में निशांत कुमार को प्रोजेक्ट किया जाना एक राजनीतिक जरूरत और राजनीतिक मजबूरी भी है। अगर निशांत कुमार को राजनीति के प्रति थोड़ी भी रुचि होती तो वे स्वतः जदयू के विकल्प के रूप में चित्रित किए जाते। पर अध्यात्म से नजदीकी और राजनीति से दूरी के कारण निशांत कुमार को समझाना पड़ा। जदयू सूत्रों के अनुसार निशांत कुमार का राजनीति में आने के पीछे का सबसे बड़ा कारण रहा कि विकास की वह ऊंचाई बिहार ने प्राप्त नहीं की, जिस ऊंचाई पर नीतीश ले जाना चाहते थे। पांच साल की सत्ता से विमुख होने के बाद खुद नीतीश कुमार ने भी कहा कि अगले पांच सालों में बिहार विकसित राज्य बन जाएगा। जब निशांत कुमार ने राजनीति में हाथ पांव मारना शुरू कर दिया था, तब उनके बोल भी यही थे कि पिता जी के अधूरे काम को पूरा करना है।
जदयू के भीतरी गुटबाजी का जवाब हैं निशांत
मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने जब बतौर राज्यसभा सदस्य दिल्ली का रुख किया तो जदयू के भीतर गुटबाजी चरम पर थी। जदयू कार्यालय में जदयू के वरीय नेताओं के विरुद काफी अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया। कार्यालय में काफी तोड़ फोड़ हुई। खाने के प्लेट, कुर्सी, टेबल तोड़ दिये गए। ऐसे में नीतीश कुमार के साथ भूंजा पार्टी के नाम पर जितने जदयू नेता थे, उनके विरुद्ध पिछड़ों की राजनीति इतनी सक्रिय हो गई कि पार्टी के भीतर लालू यादव जिंदाबाद के नारे लगने लगे। इसी बीच जदयू के भीतर पिछड़ी जाति की राजनीति बन कर जो भी नेता सामने आए, सबों ने निशांत कुमार के राजनीति में आने की पैरवी की। ‘हमारा नेता कैसा हो,निशांत कुमार जैसा हो’ जैसे नारे लगने लगे। इस बीच में जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा हों या केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह, कुछ अन्य सवर्ण नेताओं ने भी निशांत कुमार को जदयू का भविष्य बताना शुरू किया।
निशांत कुमार को लाकर जदयू में गुटबाजी थामने की कोशिश
निशांत के JDU में आने से लव-कुश समीकरण बरकरार रहने की उम्मीद
वोटों के गणित में भी फिट बैठते हैं नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार
वोटों का गणित
बिहार अभी भी जातीय तुष्टिकरण की राह पर ही है। 90 के दशक के लालू यादव के सामाजिक समीकरण के तोड़ के रूप में नीतीश कुमार के आह्नवान के साथ लव कुश समीकरण उठ खड़ा हुआ। ये वही समीकरण है जो बीजेपी के सवर्ण और वैश्य समीकरण के साथ मिल कर लालू यादव के हाथों से सत्ता छीनने का कारण बना। एनडीए के इस जिताऊ समीकरण के मूल में आज भी यही समीकरण है। और लव कुश समीकरण को राजद के विरुद्ध खड़ा करना है तो नीतीश कुमार के बाद निशांत कुमार से ही कुछ उम्मीद हो सकती हैं। उन्हें अपनी विरासत में मिले नीतीश कुमार के सुशासन, विकास और अतिपिछड़ा के उत्थान की नीतियों का लाभ भी मिलना कमोबेश तय माना जा रहा है। ऐसे में जदयू के भविष्य के रूप में निशांत कुमार का प्रक्षेपण जदयू और एनडीए की राजनीति की मांग भी थी।
नेता पुत्र और गोलबंदी
इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि आगामी राजनीति नेता पुत्र और उनकी गोलबंदी पर आधारित कमो या ज्यादा तो होगी ही। आज राजनीति के दरवाजे पर नेता पुत्रों की बात करें तो राजद सुप्रीमो की विरासत तेजस्वी यदव, रामविलास पासवान की विरासत चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की विरासत दीपक प्रकाश संभालने जा रहे हैं। वैसे में निशांत कुमार जदयू के भविष्य के रूप में प्रोजेक्ट किए जा रहे हैं तो उसके पीछे एक मात्र मकसद है कि परोक्ष या अपरोक्ष रूप से नीतीश कुमार का साया या यूं कहें कि छवि JDU से जुड़ी रहे।







