पहले 2 बयान…
- ‘जब नीतीश कुमार ने कमान छोड़ने का फैसला किया, तो उन्होंने खुद तय किया कि सम्राट चौधरी उनके उत्तराधिकारी होंगे। वह सिर्फ भाजपा की पसंद नहीं थे, बल्कि उन्हें खुद नीतीश कुमार ने आशीर्वाद दिया था।’ -राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, JDU नेता (16 मई 2026)
- ‘हर बड़े नेता की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने बाद नेतृत्व तैयार करे, लेकिन इस मामले में नीतीश कुमार चूक गए।’ -उपेंद्र कुशवाहा, RLM अध्यक्ष (20 जून 2026)
एक इंटरव्यू में कुशवाहा ने नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी पर सवाल उठाकर NDA के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान, भविष्य की रणनीति और जातिगत नेतृत्व की लड़ाई को उजागर कर दिया है।
कुशवाहा के बयान के मायने क्या हैं, वह सम्राट चौधरी के CM बनने से असहज क्यों हैं।
उपेंद्र कुशवाहा के बयान के 3 बड़े मायने
नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भाजपा के सम्राट चौधरी की ताजपोशी कराई है। उनकी पार्टी के कई बड़े नेता कह चुके हैं कि नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी सम्राट चौधरी ही हैं। ऐसे में कुशवाहा के उत्तराधिकारी पर सवाल उठाने के 3 बड़े मायने हो सकते हैं।
1. भाजपा और सम्राट के नेतृत्व पर सवाल
उपेंद्र कुशवाहा ने यह बयान देकर सीधे तौर पर भाजपा की उस रणनीति को चुनौती दी है, जिसके तहत वे ‘पोस्ट-नीतीश’ काल में बिहार की कमान संभालना चाहते हैं।
- कुशवाहा यह जताना चाहते हैं कि सम्राट चौधरी भाजपा की सांगठनिक ताकत और केंद्रीय नेतृत्व (नरेंद्र मोदी-अमित शाह) की वजह से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं, न कि स्वतंत्र रूप से पूरे कुशवाहा समाज के वोटों को ट्रांसफर कराने की क्षमता के कारण।
- कुशवाहा एक तरह से इशारों-इशारों में कह रहे हैं कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा को नहीं देनी चाहिए थी। अपनी पार्टी के किसी नेता को देना चाहिए था।
- कुशवाहा यह संदेश दे रहे हैं कि नीतीश कुमार ने भाजपा को मुख्यमंत्री की कुर्सी देकर उसे काफी ताकतवर बना दिया है, जिससे उनकी खुद की पार्टी के साथ-साथ छोटी पार्टियों को खतरा है। यह उनकी सबसे बड़ी चूक है।
2. खुद को ‘लव-कुश’ का असली वारिस बताना
बिहार में करीब 7% आबादी वाला ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण नीतीश कुमार की राजनैतिक ताकत की रीढ़ रहा है। नीतीश कुमार के बाद कुशवाहा खुद को इस वोट बैंक के असली वारिस की लड़ाई लड़ रहे हैं।
- कुशवाहा इस बयान के जरिए कहना चाह रहे हैं कि संख्या में करीब दोगुना होने के बावजूद कुशवाहा समाज ने दशकों तक नीतीश कुमार (कुर्मी) का नेतृत्व स्वीकार किया। हमने कठिन समय में साथ दिया। अब जब नीतीश के हटने का समय आया तो इस समाज का नेतृत्व किसी कद्दावर और अनुभवी नेता को मिलना चाहिए था।
- उपेंद्र कुशवाहा खुद को समता पार्टी के दौर से नीतीश कुमार का सबसे पुराना और वैचारिक साथी बताते आए हैं। वे जताना चाहते हैं कि समाज के हितों की रक्षा सम्राट चौधरी जैसे नेताओं के हाथ में सुरक्षित नहीं है, बल्कि उनके (कुशवाहा के) हाथ में सुरक्षित है।
- उपेंद्र कुशवाहा इस बयान के जरिए अपने समाज को यह संदेश दे रहे हैं कि मैं अभी राजनीति में सक्रिय हूं, और आपके हक की लड़ाई लड़ रहा हूं।

3. भाजपा नीतीश की JDU को खत्म कर देगी
JDU कभी भी कैडर-बेस्ड पार्टी नहीं रही, यह हमेशा नीतीश कुमार के चेहरे और उनके सुशासन के ब्रांड पर टिकी रही।
कुशवाहा का यह कहना कि ‘नीतीश चूक गए’, का सीधा मतलब है कि यदि नीतीश कुमार के बाद कोई नया नेता चुना जाना था, तो वह JDU के ही भीतर का कोई कुशवाहा चेहरा होना चाहिए था, न कि भाजपा का आयातित नेता।
- सम्राट चौधरी को उत्तराधिकारी बताना कहीं न कहीं भाजपा की लंबे समय की रणनीति की स्वीकार्यता है, जिसमें भाजपा JDU के वोट बैंक को धीरे-धीरे अपने पाले में कर रही है।
- उपेंद्र कुशवाहा इसी कड़वे सच को उजागर कर रहे हैं कि नीतीश कुमार के हटते ही JDU ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी। पार्टी का अस्तित्व या तो भाजपा में विलीन हो जाएगा या पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
नीतीश ने सम्राट को उत्तराधिकारी चुना, कुशवाहा को दिक्कत क्यों
उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति का मुख्य आधार ‘कुशवाहा/कोइरी’ वोट बैंक है। भाजपा ने उसी समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना दिया है। इससे उपेंद्र कुशवाहा को सबसे बड़ा खतरा अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता खोने का है।
- अब तक कुशवाहा समाज नीतीश कुमार के विरोध में या अपने स्वतंत्र नेतृत्व के लिए उपेंद्र कुशवाहा के पीछे लामबंद होता था। लेकिन जब भाजपा ने इसी समाज के सम्राट चौधरी को सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी, तो आम कुशवाहा वोटर स्वाभाविक रूप से सत्ता और बड़ी पार्टी (भाजपा) की तरफ शिफ्ट हो जाएगा।
- एक ही जातिगत समीकरण से दो बड़े नेता NDA में नहीं चल सकते। सम्राट चौधरी के CM बनने के बाद भाजपा को उपेंद्र कुशवाहा की ‘बैसाखी’ या उनकी छोटी पार्टी (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) की वैसी जरूरत नहीं रह जाएगी, जैसी पहले थी।
- सम्राट के मुख्यमंत्री बनने का ही नतीजा है कि भाजपा ने RLM को विलय का प्रस्ताव दिया। विधानसभा चुनाव से पहले MLC सीट देने का वादा करके भाजपा पलट गई। बेटे दीपक प्रकाश को MLC नहीं बनाया। मतलब कि अब कुशवाहा को तवज्जो उतनी नहीं मिल रही, जितनी पहले मिल रही थी।

…लेकिन क्या नीतीश सही में ‘चूके’ या मजबूरी थी?
- कुशवाहा कह रहे हैं कि नीतीश चूक गए, लेकिन फैक्ट यह है कि उनकी पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं था, जिस पर आम राय बन सके। और जो नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक (लव-कुश, EBC) से आता हो।
- RCP सिंह (कुर्मी) पार्टी छोड़ चुके थे। बेटा राजनीतिक रूप से अभी मैच्योर नहीं हैं। उपेंद्र कुशवाहा खुद बार-बार JDU छोड़ते और आते रहे (2013 में अलग हुए, 2021 में आए, फिर 2023 में अलग हुए)।
- नीतीश कुमार के पास JDU के अंदर राष्ट्रीय स्तर का कोई ऐसा कद्दावर कुर्मी या कुशवाहा चेहरा बचा ही नहीं था, जिसे वे कमान सौंप पाते। इसलिए सम्राट चौधरी को आशीर्वाद देना उनकी ‘चूक’ से ज्यादा उनकी ‘राजनैतिक मजबूरी’ थी।
भाजपाई मुख्यमंत्री बनने से पार्टियों को क्या खतरा है…
बिहार की राजनीति हमेशा से ‘गठबंधन और छोटी पार्टियों’ (जैसे JDU, लोजपा, हम, रालोमो) के इर्द-गिर्द घूमती रही है, क्योंकि भाजपा या राजद अपने दम पर बहुमत नहीं ला पाते थे। लेकिन भाजपा के मुख्यमंत्री की ताजपोशी से यह संतुलन बिगड़ जाएगा।
जब केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सत्ता होगी तो JDU (नीतीश के बाद) और उपेंद्र कुशवाहा जैसी पार्टियों पर अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करने का भारी राजनैतिक दबाव रहेगा। भाजपा की रणनीति हमेशा से ‘सॉफ्ट टारगेट’ क्षेत्रीय दलों को समेटकर खुद को ‘एकमात्र विकल्प’ बनाने की रही है।
पहले नीतीश कुमार या उपेंद्र कुशवाहा जरा सी नाराजगी पर पाला बदलने (राजद के साथ जाने) की धमकी देकर भाजपा से मन मुताबिक सीटें और मंत्री पद ले लेते थे। भाजपाई मुख्यमंत्री आने के बाद छोटी पार्टियों की यह ‘सौदेबाजी की ताकत’ शून्य हो जाएगी। उन्हें भाजपा की शर्तों पर ही चुनाव लड़ना होगा।

सिर्फ कुशवाहा ही नहीं, बल्कि JDU से लेकर RJD तक, बिहार के तमाम क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व की लड़ाई शुरू हो जाएगी…
- नीतीश कुमार के रहते पार्टी जैसे-तैसे एकजुट है। लेकिन सरकार के हालिया फैसले ने यह बता दिया है कि JDU ने भाजपा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। नीतीश के पूरी तरह ओझल होते ही JDU के भीतर भारी टूट होगी, क्योंकि पार्टी के पास कोई ‘होम-ग्रोन’ (पार्टी का अपना) सर्वमान्य चेहरा नहीं बचेगा।
- राजद अब तक नीतीश कुमार और जेडीयू को कमजोर मानकर खुद को बिहार की सबसे बड़ी ताकत समझती थी। लेकिन भाजपाई मुख्यमंत्री और आक्रामक सम्राट चौधरी के आने से राजद का गैर-यादव पिछड़ा वोट बैंक बिखर सकता है। तेजस्वी यादव के लिए अब लड़ाई सिर्फ भाजपा के सवर्ण कोर वोट बैंक से नहीं, बल्कि भाजपा के नए ‘ओबीसी-ईबीसी’ गठजोड़ से होगी।
- बिहार में जीतन राम मांझी (हम) या चिराग पासवान (लोजपा) जैसी पार्टियां भी तभी तक मजबूत हैं जब तक भाजपा को बैसाखियों की जरूरत है। भाजपा का अपना मुख्यमंत्री होने के बाद ये दल हाशिए पर जा सकते हैं, क्योंकि भाजपा सीधे इन जातियों के छोटे नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराकर इन क्षेत्रीय दलों के वजूद को ही अप्रासंगिक बना देगी।







