भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम भर नहीं होती, इसका एक समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र भी होता है। खासतौर से जब भाषा का परिप्रेक्ष्य शिक्षा के संदर्भ में हो तो भाषा अपने समाजशास्त्र और आर्थिकी से आगे बढ़कर राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया से भी जुड़ जाती है। पिछले दिनों देश में सीबीएसई के स्कूलों में त्रिभाषा फार्मूले को लागू करने की योजना की घोषणा को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह अलग बात है कि इस मुद्दे पर पूरे देश में एक विवाद खड़ा कर दिया गया है। यह संतोषजनक है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के निर्णय पर रोक नहीं लगाई।
भारत के प्रमुख स्कूली शिक्षा बोर्ड ‘केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड’ (सीबीएसई) ने हाल में निर्णय लिया कि अकादमिक सत्र 2026-2027 से छठी और नवीं कक्षा से त्रिभाषा सूत्र को लागू किया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र की अनुशंसा है। इसके अनुसार स्कूली स्तर पर तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी, जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होंगी। पहले भी एनईपी 1968 और एनईपी 1986 आदि में थोड़े से भिन्न रूप में त्रिभाषा फार्मूला अपनाया गया था। एकाध को छोड़कर सभी राज्यों ने त्रिभाषा सूत्र को लागू किया, लेकिन दुर्भाग्य से सीबीएसई ने त्रिभाषा फार्मूले को आंशिक रूप से ही स्वीकारा था।
सीबीएसई स्कूलों में छठी से आठवीं तक त्रिभाषा सूत्र लागू तो था, लेकिन तीसरी भाषा के तौर पर विदेशी भाषाओं की भी छूट थी, फिर नवीं और दसवीं में तो सीबीएसई ने सिर्फ द्विभाषा नीति ही अपनाई थी। उसमें भी छूट यहां तक कि स्कूल चाहें तो दोनों ही भाषाएं कोई गैर-भारतीय भाषा हो सकती थीं। इसका दुष्परिणाम हुआ कि महंगे पब्लिक स्कूलों में भारतीय भाषाओं को उपेक्षित किया जाने लगा। सीबीएसई की इन नीतियों से कई विसंगतियां पैदा हो गई थीं।
सीबीएसई एवं राज्य बोर्डों के विद्यार्थियों में भाषा शिक्षण में असंतुलन की स्थिति बन गई थी। वर्तमान योजना का उद्देश्य देशभर में स्कूली शिक्षा में समानता एवं भाषाई एकरूपता स्थापित करना है। दूसरे, नवीं और दसवीं में जब बच्चों का व्यक्तित्व आकार लेना शुरू करता है, उस समय केवल विदेशी भाषाओं तक सीमित रह जाना, बच्चों को अपनी भारतीय संस्कृति से दूर करना है। भाषा सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का भी संचार करती है। आज बच्चों में त्याग, सेवा, सहिष्णुता, सामूहिकता, परिवार-भाव, बड़ों के प्रति आदर जैसे भारतीय मूल्यों का लोप हो रहा है। एनईपी 2020 का त्रिभाषा सूत्र बच्चों में क्षीण हो रहे इन भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करेगा। सीबीएसई के बच्चों को भी बहुभाषिकता की शक्ति का लाभ मिलेगा।
साइको-लिंग्विस्टिक रिसर्च बताती हैं कि बच्चों में अनेक भाषाएं सीखने की सहज और असीम क्षमता होती है। एक से अधिक भारतीय भाषाओं का ज्ञान बच्चों में भारतीय भौगोलिक-सांस्कृतिक समझ को समृद्ध करेगा। इससे राष्ट्रीय एकता के भाव को मजबूती मिलेगी और विभाजनकारी भाषाई राजनीति कमजोर होगी। भाषा का एक अर्थशास्त्र भी होता है। भारतीय भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन से इससे जुड़े प्रकाशन उद्योग और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा लोगों को देशभर में घुलने-मिलने, रोजगार, व्यापार, शिक्षा और पर्यटन में आसानी होगी।
विरोधियों द्वारा फैलाई जा रही सूचनाएं तथ्यहीन एवं भ्रामक हैं। विरोध का एक कारण अंग्रेजी-शिक्षित आभिजात्य वर्ग की औपनिवेशिक दौर की ‘मैकाले मानसिकता’ भी है। एक अध्ययन के अनुसार तीसरी भाषा के रूप में विदेशी भाषाओं की पढ़ाई केवल एक प्रतिशत शहरी विद्यार्थी ही कर रहे हैं। भारतीय भाषाओं के अध्ययन की अनिवार्यता का विरोध इन्हीं के आभिजात्य अभिभावकों द्वारा किया जा रहा है। नए दिशानिर्देशों के विरोध में ये लोग भाषा शिक्षकों की कमी, पाठ्यपुस्तकों का अभाव, छात्रों पर अतिरिक्त बोझ और तनाव, पहले से विदेशी भाषाओं का अध्ययन कर रहे छात्रों की असुविधा आदि तर्क दे रहे हैं। ध्यान रहे कि सीबीएसई/एनसीईआरटी द्वारा कक्षा छह के लिए सभी 22 अनुसूचित भाषाओं में पाठ्यपुस्तकें लगभग तैयार हैं।
नवीं कक्षा में त्रिभाषा नीति 1 जुलाई, 2026 से लागू होगी। इसके लिए 19 अनुसूचित भाषाओं की पाठ्यपुस्तकें शीघ्र उपलब्ध कराई जाएंगी। अन्य भारतीय भाषाओं के लिए इस वर्ष एनसीईआरटी की पुस्तकों का उपयोग कर सकेंगे। शिक्षकों के लिए नए अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर आनलाइन पद्धति में अन्य स्कूलों से सहयोग कर शिक्षण कार्य असंभव नहीं। केवल एक और भारतीय भाषा की पढ़ाई को अतिरिक्त बोझ बताना, सही समझ का अभाव है। विभिन्न राज्यों में पहले से ही तीन भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं। पहले से विदेशी भाषाएं पढ़ रहे छात्रों की सुविधा के लिए वर्तमान में तीसरी भाषा का पाठ्यक्रम हल्का रखा जाएगा। तीसरी भाषा के लिए यह छूट भी है कि दसवीं में इसकी बोर्ड परीक्षा नहीं होगी। यही नहीं, कोई छात्र अंग्रेजी के अलावा कोई दूसरी विदेशी भाषा भी सीखना चाहे तो इसका भी अवसर प्राप्त होगा। बड़े सुधारों में प्रारंभ में कुछ चुनौतियां आना स्वाभाविक हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि त्रिभाषा नीति को सही रूप से लागू करना देश और बच्चों, दोनों के हित में है।







