शाहपुर के बिटौली गांव की गलियों में जाएंगे तो वहां केवल मातम नहीं, बल्कि लोगों के चेहरों और हाव-भाव में सुलगता हुआ आक्रोश दिखाई देता है… आवाज सिर्फ एक आती है-“आरोपी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करना चाहिए, दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिले, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए.” ऐसे में एक आम आदमी के साथ एक पत्रकार होने के नाते हमारा नैतिक दायित्व है कि अगर यह वास्तव में एनकाउंटर था, तो फिर सवाल पूछना जरूरी है… और अगर सवालों के जवाब नहीं हैं, तो “एनकाउंटर” शब्द की आड़ में कहीं एक हत्या तो नहीं छिपाई जा रही?
सोशल मीडिया में कई वीडियो सर्कुलेट हो रहे हैं जिसमें देखा जा सकता है कि भरत तिवारी ने समाज के हित में बातें कहते हुए, और अपनी कुछ मांगों के साथ अपनी पिस्टल पुलिस के आगे फेंक दी… यानी उन्होंने आत्मसर्पण कर दिया था… और साफ मतलब यह कि भरत ने पुलिस के समक्षक सरेंडर कर दिया था… ऐसे में सबसे पहला सवाल यही है कि यदि भरत ने अपनी पिस्टल पुलिस के हवाले कर दी थी, तो फिर उस पर गोली चलाने की जरूरत क्यों पड़ी? आत्मसमर्पण कर चुके व्यक्ति से तत्काल खतरा किस बात का था? दूसरा सवाल उससे भी अधिक गंभीर है. एक नहीं, चार-चार गोलियां क्यों दागी गईं? क्या उसे जिंदा पकड़ना असंभव था? क्या कानून का उद्देश्य अपराधी को मारना है या न्यायालय तक पहुंचाना?
…और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह बताया जा रहा है कि भरत भूषण तिवारी पर पहले से कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था. यदि वास्तव में ऐसा है, तो फिर भरत को किस आधार पर ऐसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा? पुलिस एनकाउंटर का इतिहास गवाह है कि गोलियां अमूमन खूंखार अपराधियों, शार्प शूटरों या आतंकवादियों पर चलती हैं. लेकिन भरत भूषण तिवारी का रिकॉर्ड कहता है कि, शाहपुर या भोजपुर के किसी भी थाने में उस पर एक भी आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं था. जिस व्यक्ति का कोई क्रिमिनल बैकग्राउंड ही न हो, उसे पुलिस रातों-रात एक दुर्दांत अपराधी की तरह सड़कों पर कैसे ढेर कर सकती है?
कानून के जानकार बताते हैं कि भारत का कानून किसी व्यक्ति को अपराध सिद्ध होने से पहले अपराधी घोषित नहीं करता. अदालतें इसलिए हैं कि दोष तय हो, पुलिस इसलिए नहीं कि फैसला मौके पर ही सुना दे. एनकाउंटर के नाम को बदनाम करने का यह खेल इसलिए खेला गया क्योंकि व्यवस्था के पास भरत भूषण की धारदार आवाज का कोई कानूनी जवाब नहीं था. ऐसे में सवाल तो यह कि क्या यह एनकाउंटर नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली एक मजबूत आवाज को कुचलने की साजिश थी?
स्पष्ट है कि यहीं से यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं रह जाता, बल्कि एनकाउंटर की पूरी अवधारणा पर सवाल खड़ा कर देता है. वास्तविक एनकाउंटर तब होता है जब पुलिस की जान पर तत्काल खतरा हो और आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई अपरिहार्य हो. लेकिन तथ्यों में ही कई पुलिस के दावे पर कई सवाल जन्म लेते हैं. अगर भरत तिवारी ने फायरिंग नहीं की और आत्मसमर्पण कर दिया तो सरेंडर के बाद भी गोलियां चली हैं, यदि किसी के खिलाफ आपराधिक इतिहास तक नहीं है, तो फिर इसे “एनकाउंटर” कहना क्या उचित है? क्या यह “एनकाउंटर” शब्द के महत्व को भी कम कर देता है, क्योंकि ऐसी हर घटना असली पुलिस मुठभेड़ों की विश्वसनीयता को भी कमजोर करती है.
भरत भूषण तिवारी की एक और पहचान थी. इलाके के लोग कहते हैं कि वे उन विस्थापित परिवारों की आवाज बने हुए थे, जिन्हें विकास की कीमत अपने घर-आंगन छोड़कर चुकानी पड़ी. जिन लोगों के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वे आज उन्हें ‘भगवान’ जैसा दर्जा देते हैं. यह भावना उस भरोसे का प्रतीक है जो उन्होंने वंचितों के बीच अर्जित किया था. स्थानीय लोग कहते हैं कि समाजसेवा भरत के लिए शौक नहीं, जुनून थी. जिन लोगों की आवाज कहीं नहीं सुनी जाती थी, भरत उनके लिए बोलते थे. दरअसल, जब कोई युवा पूंजीपतियों और भ्रष्ट अधिकारियों की आंखों में आंखें डालकर गरीबों के हक के लिए खड़ा होने लगता है, तो वह सिस्टम की आंखों में खटकने लगता है, ऐसे में सवाल यह कि क्या भरत के साथ भी यही हुआ?
बिहार पुलिस लगातार भरत तिवारी को पागल बता रही है. लेकिन, न तो पहनावे और न ही भाषा शैली से वह दिमागी रूप से कमजोर लगता है. खास बात यह कि बिना कोई साक्ष्य के किसी को पागल घोषित करके काउंटर करने का अधिकार किसने दिया? अगर वह पागल था भी, मानसिक रूप से विक्षिप्त था भी तो उसे इलाज की जरूरत थी न कि एनकाउंटर की. बताया जाता है कि अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने अपनी हनुमानी (गले में हनुमान जी का लॉकेट) बेचकर एक पिस्टल खरीदी थी. यह भी एक विडंबना है कि जो हथियार उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए लिया, वही उनकी मौत की कहानी का सबसे बड़ा विवाद बन गया. पर सवाल यह जिंदा है कि यदि भरत ने हथियार पुलिस को सौंप दिया था तो फिर घातक बल प्रयोग (कथित तौर पर एनकाउंटर) की आवश्यकता कैसे पैदा हुई? अगर उसके पास अवैध हथियार थे भी तो इसे रखने के मामले में गिफ्तार करके कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए थी.
भरत का पारिवारिक परिवेश भी उल्लेखनीय है. उनके परिवार के लोग पुलिस सेवा में रहे हैं. भरत तिवारी के पिता बिहार पुलिस से सिपाही के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, जबकि उनकी बहन वर्तमान में बिहार पुलिस में कार्यरत हैं. स्पष्ट है कि यह बात परिवार को और आहत करती है. खास बात यह कि भरत तिवारी में राष्ट्रवाद की भावना थी और उन्होंने हिंदू राष्ट्र के समर्थन में बागेश्वर धाम की यात्रा की थी. वह 30-32 साल का नौजवान शायद जानता था कि वह जिस रास्ते पर चल रहा है उनकी आयु लंबी नहीं हो, ऐसे में उन्होंने अंतिम इच्छा व्यक्त करते हुए सार्वजनिक रूप से अपने अंगदान की घोषणा भी की थी और कहा था कि उनके अंगदान में देश के सैनिकों और सुरक्षाकर्मियों को प्राथमिकता दी जाए.
हालांकि, भरत तिवारी से जुड़ी इन बातों से किसी कानूनी विवाद का समाधान नहीं निकलता, लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि उनकी छवि केवल किसी कथित अपराधी की नहीं थी. समाज उन्हें कई अन्य पहचानों से भी जानता था. दरअसल, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां राज्य, सत्ता और पुलिस की शक्ति भी सवालों से ऊपर नहीं होती. पुलिस पर भरोसा तभी कायम रहेगा जब हर विवादित मुठभेड़ की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच होगी.
किसी भी सभ्य समाज में क्रांति खून नहीं मांगती, बल्कि न्याय मांगती है, और पुलिस की जान भी उतनी ही अनमोल है, जितनी किसी नागरिक की. यदि कार्रवाई सही थी, तो जांच उसे साबित करेगी, और यदि कहीं गलती हुई है, तो जवाबदेही भी तय होगी. यही कानून के राज की पहचान है. इसलिए जरूरत किसी एक पक्ष की जीत की नहीं, बल्कि सच की जीत की है.
भरत भूषण तिवारी की मौत का सच चाहे जो भी हो, वह सामने आना ही चाहिए. क्योंकि यदि निर्दोष मारा गया है तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, हमारी और आपकी, समाज की, शासन के विश्वास की और लोकतंत्र की भी हार है. और यदि पुलिस की कार्रवाई उचित थी, तो उसे भी तथ्यों और साक्ष्यों के साथ जनता के सामने रखा जाना चाहिए. न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए. यही संविधान का मूल सूत्र है और यही लोकतंत्र की आत्मा भी. और अंत में… क्रांति भले ही इतिहास में खून मांगती रही हो, लेकिन आज की संवेदना को ताक पर रख देने वाली पुलिस को निर्दोषों की जान लेने का लाइसेंस कतई नहीं दिया जा सकता.







