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रेवड़ी संस्कृति से विषमता बढ़ती, सरकारी खजाने पर दबाव…………

UB India News by UB India News
June 2, 2026
in खास खबर, लेख
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मुफ्त की रेवड़ी मामला फिर पहुंचा सुप्रीम कोर्ट……….

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इस साल के लिए नियत लोकतंत्र का महोत्सव अब संपन्न हो चुका है। चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव के बाद नई सरकारों ने कमान भी संभाल ली है। चुनावी राज्यों में राजनीतिक दलों ने बड़े-बड़े वादे करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी और वे प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद से प्रेरित फ्रीबीज यानी रेवड़ी संस्कृति को ही पोषित करने वाले रहे। ऐसे वादों के पीछे कहीं न कहीं विषमता का एक पहलू भी जुड़ा है, क्योंकि समृद्ध लोगों और हाशिए पर मौजूद समूहों के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार लगभग 82.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं, जिनकी दैनिक आय तीन डॉलर से कम है। जबकि वैश्विक समृद्धि भी निरंतर बढ़ती जा रही है। स्पष्ट है कि अमीर और गरीब के बीच अंतर बढ़ने पर है और भारत भी इस वैश्विक रुझान से अछूता नहीं। विषमता के इस संदर्भ में वितरण और न्याय दो अहम कड़ियां हैं। इनसे मिलकर बनने वाली वितरणात्मक न्याय की संकल्पना केवल आर्थिक पुनर्वितरण नहीं, अपितु समाज के लिए अवसरों, जोखिमों और संसाधनों के आवंटन को नियंत्रित करने वाला एक नैतिक और राजनीतिक ढांचा भी है। एक स्थिर और समावेशी समाज के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

जिन समाजों में विषमता गहराई से समाई है, वहां वंचितों को लाभ पहुंचाकर मुख्यधारा से जोड़ने के लिए वितरणात्मक न्याय महत्वपूर्ण उपाय है। इस दृष्टि से कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति को राहत पहुंचाने के लिए बनाई जाने वाली योजनाओं के पीछे भारतीय राजनीतिक दृष्टिकोण नितांत न्यायसंगत है। इसमें महत्वपूर्ण यही है कि क्या ये योजनाएं सरकारी खजाने को क्षति पहुंचाए बिना ही अभीष्ट की पूर्ति का माध्यम बन पा रही हैं या नहीं? यानी सरकारी खजाने को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है और अपेक्षा के अनुरूप परिणाम की प्राप्ति होती रही है या नहीं? आंकड़ें तो यही दर्शाते हैं कि बिना किसी शर्त के होने वाले हस्तांतरणों का दायरा 2018-19 की तुलना में 2025-26 के बीच 28.8 प्रतिशत बढ़ा है। तमाम राज्यों के लिए ऐसे उपाय पसंदीदा बनते जा रहे हैं। हालांकि ऐसे हस्तांतरणों की प्रकृति को देखें तो ये विशुद्ध उपभोग वाली सब्सिडी बन जाते हैं। इनसे प्रोत्साहनों को चोट पहुंचती है। निवेश क्षमता कुंद होती है। सरकार खजाने पर दबाव बढ़ता है। अंतत: इससे वितरणात्मक न्याय के सिद्धांतों और उद्देश्यों को क्षति पहुंचती है। यह भी देखा गया है कि बहुत कुछ सहजता से प्राप्त होने की स्थिति में पुरुषार्थ का भाव घटने लगता है। वैसे भी यही श्रेयस्कर माना गया है कि किसी भूखे को भोजन कराने से बेहतर है कि उसे वे तौर-तरीके सिखाए जाएं कि उसके समक्ष कभी भुखमरी की नौबत न आए।

इस संदर्भ में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और मार्था नुसबाम ‘क्षमता दृष्टिकोण’ (कैपेबिलिटी अप्रोच) का सुझाव देते हैं। उनका तर्क है कि न्याय की दृष्टि केवल आय पर केंद्रित न होकर इस पहलू पर भी होनी चाहिए कि व्यक्तियों को कार्य करने और आगे बढ़ने के ‘वास्तविक अवसर’ मिलें। इसके अंतर्गत सुनिश्चित हो कि स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, गरिमा और काम के सार्थक अवसरों तक उनकी निर्बाध पहुंच हो। इस क्रम में नया दृष्टिकोण पूर्व-वितरण यानी प्री-डिस्ट्रीब्यूशन का है। अधिकांश अर्थशास्त्री विषमता की स्थिति निर्मित होने के बाद पुनर्वितरण की बात करते हैं, लेकिन आधुनिक सोच विषमता को रोकने के लिए समाज के पुनर्गठन और प्रभावी शासन पर ध्यान केंद्रित करता है। अमर्त्य सेन और मार्था नुसबाम के सुझाव ‘अवसर की समानता’ के इसी नए दर्शन में पूरी तरह सटीक बैठते हैं, जिसका उद्देश्य ही विषमता की स्थिति निर्मित होने से रोकना है।

वैश्विक अनुभवों की बात करें तो युद्ध के बाद एक समय दक्षिण कोरिया कई अफ्रीकी देशों से गरीब था। सरकार भारी कल्याणकारी खर्च नहीं उठा सकती थी। इसके बजाय उसने सार्वभौमिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, ग्रामीण विद्युतीकरण, भूमि सुधार और औद्योगिकीकरण के लिए सस्ते ऋण पर ध्यान केंद्रित किया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने भी व्यावसायिक शिक्षा, प्रशिक्षु प्रणाली और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित किया। वास्तव में, यह क्षमता निर्माण का कार्य था। भारत में भी रचनात्मक योजनाएं बनी हैं। हरित क्रांति, ग्रामीण विद्युतीकरण, मुफ्त शिक्षा, मध्याह्न भोजन, मुफ्त बिजली और गैस कनेक्शन और चिकित्सा सहायता को ऐसी योजनाओं में गिना जा सकता है। हालांकि मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल सहायता अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही, क्योंकि स्कूली बुनियादी ढांचे, शिक्षण गुणवत्ता और अस्पताल की सुविधाओं और प्रबंधन के मोर्चे पर निवेश पर्याप्त नहीं। निजी स्कूल और निजी अस्पतालों की स्थिति बेहतर तो है, लेकिन वे गरीबों की पहुंच के दायरे से बाहर हैं। इसमें ब्राजील का उदाहरण अनुकरणीय हो सकता है। वहां वंचित परिवारों को तभी नकदी सहायता मिलती है, जब उनके बच्चे स्कूल जाते हैं, टीकाकरण पूरा करते हैं और स्वास्थ्य जांच कराते हैं। इस तरह अगली पीढ़ियां गरीबी की गर्त में जाने से बचती हैं।

भारत के संदर्भ में विडंबना यह भी है कि तमाम राज्यों की वित्तीय स्थिति दबाव में हैं, लेकिन चुनावी जीत के लिए वे रेवड़ी योजनाओं का सहारा लेने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे वादों की पूर्ति का यही परिणाम होता है कि राज्य के पास भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए पर्याप्त संसाधन बचे ही नहीं रह जाते। स्पष्ट है कि जोर पकड़ती इस रेवड़ी संस्कृति के दौर में हमें दृष्टिकोण बदलना ही होगा। यह आम राय से ही संभव है जब सभी दल दलगत भावना से परे उठकर सोचें। मुफ्त की रेवड़ियों का उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं, बल्कि प्रभावी वितरणात्मक न्याय होना चाहिए। यदि इसे बिना किसी रिसाव के ही मूर्त रूप दे दिया जाएगा तो इससे न केवल सामाजिक व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव प्रत्यक्ष दिखेंगे, बल्कि यह चुनावी जीत का आधार भी बनेगा।

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